कुशलेन्द्र श्रीवास्तव
एक और पड़ोसी देश युवाओं के आक्रोश का केन्द्र बिन्दु बन गया । श्रीलंका के बाद बंगलादेश और अब नेपाल में युवाओं ने हिसंक आन्दोलन कर सत्ताधीशों को कुर्सी से उतार दिया । नेपाल में लोकतंत्र ज्यादा पुराना नहीं है, इसके पूर्व राजशाही थी और नेपाल का एक बड़ा वर्ग मानता रहा है कि राजशाही लोकतंत्र से ज्यादा बेहतर थी । नेपाल मूलतः हिन्दु राष्ट्र है इसके कारण यह भारत से स्वाभाविक रूप् से जुड़ा हुआ महसूस होता है । राजशाही जब तक रही वह भारत के साथ बेहतर संबंध बनाए रखी पर लोकतंत्र में ऐसा नहीं हो पाया । सत्ता में जो बैठा उसने अपने हिसाब से अपनी मित्रता को चुना । वर्तमान लोकतंत्र के प्रहरी प्रधानमंत्री के. पी. शर्मा ने चीन के साथ नजदीकीयां बढ़ाई, वो भी तब जब भारत और चीन के संबधों में खटास थी । चीन के साथ नजदीकियां नेपालवासियों को पसंद नहीं आ रहीं थीं वे भारत के साथ ही अपने संबंधों को मजबूत किए जाने के पक्षधर थे । सत्ता में जो बैठता है वह मदहोश हो जाता है । उसे लगने लगता है कि वह अब जो करेगा वह ही सही होगा और वो वो सब करने लगता है जो उसके पतन का कारण बनता है । नेपाल की सत्ता में बैठे सत्ताधीश अहंकार के साथ शासन कर रहे थे, उनके लिए जनता का हित गैर जरूरी हो गया था । नेपाल बहुत समृद्ध देश नहीं है, वहां की अधिकांश जनता गरीब है पर सत्ताधारी अमीर हैं, सत्ता में बैठते ही उनके पास रूप्यों का पहाड़ खड़ा हो जाता है और वे इसका प्रदर्शन करने से भी नहीं हिचक रहे थे । आलीशानी कोठी और महंगी गाड़ियां, औलादें विदेशों में खर्चीले स्कूलों के स्टूडेन्ट, जनता सब देख रही थी, टैकस उनका, पैसा उनका और कब्जा कुछ सत्ताधारियों का । राजशाही में जनतास के टेक्स से ऐशो आराम का जीवन जीने वाला केवल एक परिवार होता था पर लोकतंत्र के नाम कई-कई नेता जनता के टैक्स का दुरूप्योग करते दिखाई देने लगे । ऐसे में नेपाल की जनता को एक बार फिर राजशाही का याद सताने लगी । वैसे भी ऐसा माना जाता है कि नेपाल की जनता अपने राजा को ईश्वरीय प्रतिनिधि मानकर पूजती रही है और जब तब राजशाही रही राजा ने भी जनता के साथ हमदर्दी रखी । लोकतंत्र के बावजूद भी लोग राजा को पूजते रहे । नेपाल में जब भ्रष्टाचार बढ़ गया, बेरोजगारी चरम पर पहुंच गई और महंगाई ने आम आदमी को दो वक्त की रोटी से भी वंचित कर दिया तो युवाओं का आक्रोश फूट पड़ा । इसके पूर्व भी नेपाल में राजशाही वापिस लाओं के नारों के साथ आन्दोलन हो चुका था । इस आन्दोलन से सत्ताधारियों को सतर्क हो जाना चाहिए था पर उन्हें इस बात का घमंड था कि उन्हें सत्ता से कोई बेदखल नहीं कर सकता । युवाओं के आक्रोश््रा को विस्फोटक रूप् लेना ही था । जिन-जिन देशों में युवाओं ने आन्दोलन कर सत्ताधारियों को पद से हटाया वहां भी अमूमन यही स्थिति थी, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और नेताओं की आम जनता के प्रति गैर जिम्मेदाराना व्यवहार । नेपाल छोटा देश है आबादी कम है, पर इस कम आबादी में युवाओं की संख्या अधिक है जिनके सामने अपना भविष्य है । सोशल मीडिया पर बैन लगाया गया और इस बैन के खिलाफ आक्रोश फूटा । आक्रोश का बहाना भले ही सोशल मीडिया पर बैन रहा होगा पर वास्तविकता यह है कि आक्रोश वहां के सत्तधारी और पूर्व में सत्ता में रहे नेताओं के खिलाफ अधिक था । एक जनसैलाब उमड़ा काठमांडू की सड़कों पर इस जनसैलाब ने सारा कुछ अस्त-व्यस्त कर दिया । संसद को जलाया, नेताओं के घर जलाए और ऐसे लोगों पर भी गुस्सा फूटा जिन्हें वे भ्रष्टाचार से जोड़ कर देखते थ, जेल पर भी धावा बोला गया और कैदियों को भाग जाने का अवसर मिला । े । नेताओं को दौड़ा-दौड़ा कर मारा, घरों में घुसकर मारा जिसके वीडियों अब सोशल साइड पर वायरल हो रहे हैं । नेताओं के आलीशान घरों को तहस-नहस कर दिया,सरकारी संपति को जलाया यहां तक कि सुप्रीमकोर्टमें भी आग लगा दी । यह ऐसा गुस्सा था जिसकी चपेट में जो आया वह बरबाद हुआ । कुछ घरों को और नेताओं को टारगेट बनाकर मारा पीटा गया मानो इसकी तैयारी पूर्व से कर ली गई हो, वहां के वित्त मंत्री को जनता से पिटते हुए दिखाते वीडियों भी मसामने आ रहे हें, वहीं विदेश मंत्री के साथ माररपीट के वीडियों भी पूरे विश्व में देखे जा रहे हैं । पूरा काठमांडू अस्त-वयस्त हो गया, नेपाल के अन्य शहरों में भी आन्दोलन हुए हिंसा हुई और रकारी तंत्र को तहस-नहस कर दिया गया । यह ऐसा आन्दोलन था जिसके निशान वर्षो तक नहीं मिटाए जा सकते । प्रधान मंत्री ने स्तीफा दिया और भाग गए, मंत्रियों ने स्तीफा दिया और भाग गए, राष्ट्रपति ने स्तीफा दिया पर वो काम करते रहे । मिलेट्री ने सत्ता को हाथ में ले लिया और नेपाल में शांति व्यवस्था बनाने में योगदान दिया । अराजकता का माहौल था, यदि सेना सत्ता हाथ में नहीं लेती तो यह अराजकता का माहौल लम्बे समय तक चलता । पर सेना ने निर्भीकता और साहस के साथ स्थितियों का मुकाबला किया और नेपाल को ज्यादा अराजकता फैलने से बचा लिया । पर अब क्या नई सरकार बन जायगी, कोई नया प्रधानमंत्री बन जायेगा और उम्मीद की जाएगी कि वह नेपाल को इस खराब स्थिति से बाहर निकाले । नेपाल में हुए आन्दोलन ने इसके पूर्व अन्य देशों में हुए आन्दोलन को भी याद कराया और विश्व के अन्य देशों को सतर्क कर दिया । फां्रस में भी सत्ता के खिलाफ आन्दोलन हुए जो फिलहाल तो थम गए हैं, उम्मीद की जा सकती है कि सत्ता आन्दोलनकारियों को शांत कर ही देगी । पाकिस्तान सबसे अधिक भयभीत है । पाकिस्तान में यूं भी अराजकता का माहौल बना ही रहता है । वहां लगभग सेना ही सत्ता में रहती है, सत्तारूढ़ कोई हो । पाकिस्तान के आर्मी चीफ के खिलाफ वैसे भी पाकिस्तान में गहरा आक्रोश है, तो उनका भयभीत होना लाजमी भी है । पाकिस्तान में सत्त में बैठे नेताओं को अमूमन या तो बीच कार्यकाल में बेदखल कर दिया जाता है या उसे जेल में डाल दिया जाता है । नवाज शरीफ जैसे नेता वर्षों से निर्वासित जीवन जी रहे हैं । पाकिस्तान को भयभीत होना ही चाहिए । हाल ही में वहां पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान को जेल से छुड़ाने के लिए आन्दोलन हो चुके हैं । भारत मे ऐसा हो सकता है ऐसा प्रश्न ही बेमानी है । कुछ लोग जो भारत के साथ ईष्या रखते हें वे भारत में भी ऐसे आन्दोलन की चेतावनी दे रहे हेंं पर भारत का लोकतंत्र इतना मजबूत और गहरा है कि यहां सत्ता को केवल वोटों से ही पराजित किया जा सकता है । जनसंख्या की दृष्टि से, भौगोलिक दृष्टि से और संवैधानिक दृष्टि से यहां बलात सत्ता परिवर्तन नहीं हो सकता इस बात का ध्यान असामाजिक तत्वों को रखना होगा । सत्ता जब भी बदली है, वह आम जनता के फैसले से बदली है हिंसा से नहीं । महात्मा गांधी ने अहिंसा का जो पाठ पढ़ाया था भारतवासी अभी उसको विस्मृत नहीं कर पाए हैं । तो भारत तो जैसा है, वैसा ही रहेगा परेशानी पाकिस्तान को है और वहां ऐसा आक्रोश भड़कना आवश्यक भी है । पाकिस्तान आर्थिक रूप से कंगाल है, राजनीतिक रूप से अव्यवस्थित है और विश्व पटल पर अकेला है । आक्रोश वहां जन्म ले चुका है । तो हो सकता है कि अगली बार हम पाकिस्तान के इन हालातों को देखें । भारत में प्रकृति का कहर जारी है । ऐसा कहर जिसे इसके पूर्व कभी नहीं देखा गया । इस बार तो पंजाब को भी बाढ़ ने डुबा दिया । चारों ओर केवल पानी ही पानी, फसलें बरबाद हो गई, लोगों के आशियाने बरबाद हो गए और जन हानि भी हुई । हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर, उत्तराखंड, राजस्थान जैसे राज्य बाढ़ की विपदा से जूझते रहे । पहाड़ों के खिसकने का दौर जारी रहा और बादलों के फटने से भी बरबादी हुई । इस बार न केवल बरसात अधिक हुई बल्कि भूस्खलन की घटनाएं भी अधिक हुई । प्रकृति के आक्रोश का कोई उपाय नहीं है । भारत विपदाओं से जूझना जानता है तो वह इससे भी उबर ही जाएगा । प्रधानमंत्री ने हमेशा की तरह सक्रिय भूमिका निभाकर राहत राशि भी दी और राज्यों को नुकसान से उबरने के लिए हौसला भी दिया । प्रकृति का यह प्रकोप अभी थमने का नाम नहीं ले रहा है ।
