पंकज सीबी मिश्रा, राजनीतिक विश्लेषक एवं पत्रकार जौनपुर यूपी
बीते वर्ष 2025 में कई चीजे रही जो भूलने के बाद भी याद आती रहेंगी जिनमें कुछ सामाजिक और राजनैतिक अवसाद और संवैधानिक अपवाद रहें। बिहार चुनाव में विपक्ष की हार हो या सोने चांदी के कीमतों की मार ! स्मृति मंधना की शादी टूटने की खबर से विराट के बल्ले से रन कूटने तक की कई खबरें। महिला क्रिकेट टीम का पहली बार वर्ल्ड कप उठाने से लेकर राहुल गाँधी को लांच करने की कई नकाम कोशिशे ! कथित नए साल 2026 के सनातनी राक्षकों द्वारा सोशल मिडिया पर मौखिक विरोध से पते की एक बात यह पता चली कि यह वर्ष हमें स्वीकार नहीं वाली कविता फिर एक बार ट्रेंड कर रही। कविता दिनकर ने लिखी थी यह अफवाह उड़ाकर लोगो नें प्रेमी – प्रेमिकाओं के मन में विक्षोभ पैदा किया । हालांकि दिनकर साहित्य में यह कविता अभी तक ढूंढे न मिली। कुछ तो ऐसे है जो खुद के पंक्तियों को ग़ालिब के लिए दान कर देते है। जरूर गालिब नें ऐसी पंक्तिया मरने के बाद ही लिखी होगी। गालिब के तो कई दीवानें उनके मरने के बाद ही वजूद में आए। अगर ग़ालिब और दिनकर स्वर्ग से इन्हें अपनी रचना मानने से इंकार करें तो जंतर मंतर पर जाकर विरोध पर बैठु । आखिर भक्तों और चमचों को भावनात्मक श्रद्धांजलि देना भी तो कोई चीज होती है। अब जैसे अमिताभ बच्चन लाख कहते रहे कि उनकी अपनी टेस्ट अच्छी है पर कोई नहीं मानने वाला। उधर भारत ने 2026 के गणतंत्र दिवस समारोह के लिए बड़ा कूटनीतिक दांव चला है। यूरोपियन कमीशन की प्रेसिडेंट उर्सुला वॉन डेर लेन और यूरोपियन काउंसिल के प्रेसिडेंट एंटोनियो कोस्टा 26 जनवरी को चीफ गेस्ट होंगे। यह सिर्फ एक सेरेमनी नहीं है बल्कि इसके पीछे भारत और यूरोपियन यूनियन के बीच फ्री ट्रेड एग्रीमेंट को फाइनल करने का बड़ा मकसद है। दोनों पक्ष 27 जनवरी को होने वाले भारत-ईयू समिट में इस ऐतिहासिक डील पर मुहर लगा सकते हैं। पीयूष गोयल और ईयू के अधिकारी रात-दिन एक कर रहे हैं ताकि दशकों से लटके इस समझौते को अंजाम तक पहुंचाया जा सके।
हाँ तो बात करते है इस अंग्रेजी साल 2026 में है ही क्या खूबी ? क्यों हम आंग्ल नव वर्ष बनाएं तो माना कि हम जन्मतिथि संवत के हिसाब से न बताकर अंग्रेजी सन के हिसाब से बताते हैं पर विरोध हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है। माना कि परीक्षाएँ अंग्रेजी महीनों के हिसाब से लेते और देते हैं। माना कि वेतन भी इन्हीं महीनों के हिसाब से लेते-देते हैं पर विरोध तो हम करेंगे। माना कि लोकतांत्रिक पर्व, चुनाव भी अंग्रेजी कलेंडर के हिसाब से होने पर हमें कोई गुरेज़ नहीं है। लोगो की नाराजगी तो बस ‘ट्रेलर’ है, मेन फिल्म तो चाणक्य नीति की है ! चाणक्य ने कहा था: जब जड़ गहरी हो, तो पेड़ मत काटो तेजाब डालो, धीरे-धीरे सूखने दो। राजनीति में भी वाजपेयी जी ने कुल्हाड़ी नहीं चलाई, बल्कि ‘महानता’ का ‘खाद-पानी’ डाला पर सोनिया का पेड़ तो परिवारवाद से हरा-भरा हो गया। पर चाय वाला और गायवाला ? इनका क्या ! ये दोनों है अब पूरी राजनीति का नया साल हर वर्ष मना रहें। ये चाणक्य के ‘असली शागिर्द’ निकलें ! दोनों कुल्हाड़ी नहीं, तेजाब की बोतल लिए घूम रहा है। और तेजाब वो है जो गोपनीयता, प्रोटोकॉल, कानून की बराबरी, और सबसे बड़ा धर्मांतरण पर ब्रेक ! हम चाहे तो बिना अंग्रेजी साल का विरोध किए ही, हिंदू नव वर्ष को अपना मान सकते हैं। पर नहीं, यह तो प्रेम का सरलीकरण है। बिना किसी विरोध के हासिल प्रेम भी कोई प्रेम है क्या ! हम प्रेम को आसान नहीं बनाएंगे। हिंदू संस्कृति के प्रति प्रेम दर्शाने के लिए पहले हमें लाठी-डंडों के साथ गली, चौराहों और पार्कों में निकलकर देखना होगा कि कहीं कोई पाश्चात्य तरीकों से तो प्रेम को अभिव्यक्ति नहीं दे रहा है, अगर दे रहा है, तो तत्काल उसके पश्च भाग को लाल कर दिया जाय। श्रमपूर्वक दौड़ा-दौड़ाकर मारने से जहां इससे अपनी संस्कृति के प्रति प्रेम बढ़ता है, वहीं दूसरी तरफ इसमें त्याग और श्रम की गरिमा के प्रति हमारी सनातन प्रतिबद्धता भी दिखती है योगाभ्यास होता है। नववर्ष मनाने के लिए कोई चिरौरी करे, न करे, हमें विरोध बरकरार रखना है। शत्रु के परम्परा और वारिस को कमजोर मत करो अपितु उसे निर्जीव करो । पहले अखिलेश – राहुल बोस्टन में पकड़े जाते तो वाजपेयी जी बुश को फोन: “छोड़ दो, हमारा प्रिंस है पर अब ट्रम्प बोलता है छोड़ने की शर्त होगी, अब कौन समझाये की इन दोनों की कीमत भारत में जीरो हो रही ? मिडिया का चाय वाला फोन तक नहीं उठाता। कानून सबके लिए बराबर ! क्रिश्चियन और इश्लामिक इवैंजेलिस्ट पर ब्रेक चाणक्य: शत्रु की विचारधारा की जड़ पर प्रहार करो। तीन दशक से सोनिया के ‘आशीर्वाद’ से चर्च को उत्तर-पूर्व में और इश्लाम को दक्षिण भारत में ‘फ्री रन’ था। ‘किंगडम ऑफ क्राइस्ट’ का सपना धरा रह गया और इश्लाम एसआईआर की भेंट चढ़ रहा । चाय वाले ने धर्मांतरण कानून पर सख्ती, और एसआईआर से इश्लाम की जड़ पर तेजाब डाला है । पोप और मौलाना साहब रो रहे हैं, सोनिया चिल्ला रही हैं, ये मेरी धार्मिक भावनाओं का अपमान है ! जड़ का पांचवां हिस्सा सूखा ईसाई मिशनरी का ‘अनाधिकृत साम्राज्य’ ढह रहा ! लेकिन 22026 तक पेड़ काटा क्यों नहीं ? गुजरात का चाणक्य बोला भारत में भावनाएं जल्दी आहत होती हैं। पेड़ काटोगे तो ‘प्रकृति प्रेमी’ लिपट जाएंगे कहेंगे अरे, बेचारा ! भले पेड़ ने 10 साल लूटा हो, छांव ‘हराम की’ हो। चाय वाला चालाक है तेजाब डाल रहा है, धीरे-धीरे। पत्ते गिर रहे हैं, जड़ सुख रही है और ‘प्रकृति प्रेमी’ सो रहे हैं। अंतिम चाय वाला खुद बनाएंगे 2029 में ! चाणक्य का अंतिम सूत्र शत्रु की जड़ तब तक न सूखे, जब तक तुम स्वयं मजबूत न बनो। गाय वाला रोज ‘चाय’ पी रहा है लेकिन वो चाय नहीं, सपा की जड़ का तेजाब है ! अखिलेश जी, नाराज मत होइए ये तो चाणक्य का खेल है और खेल अभी बाकी है।
मेरी अपनी लिखी इन पंक्तियों से आप सभी को नव आंग्ल वर्ष 2026 की हार्दिक शुभकामनायें…….
वर्ष नया आ रहा ये बताता चलू ,
मै कोई एक नवगीत गाता चलू…!
बे-घरों को ठिकाना बताता चलू ,
मै कोई एक नवगीत गाता चलू..!!
तुमने पहचानी ना मर्जीयां मन की ये,
सोचता हूँ तुम्हे दिल दिखाता चलू..!
मै कोई एक नवगीत गाता चलू…!!
