तेजी से पटरियों के बीचों-बीच दौड़ती हुई एक लड़की, ट्रेन के किनारे-किनारे पटरियों पर पड़े पानी के खाली बोतल उठा-उठा कर अपने बोरे में भर रही थी। कई बार वह गिर पड़ती, फिर से उठती संँभलती और फिर आगे बढ़ जाती। उसकी उम्र भी बमुश्किल कोई सात-आठ साल की रही होगी। नाम मिनी और फिर मीनू। सोनू को अपनी तरफ पड़े हुए खाली बोतलों को उठाते देखकर वह चिल्ला पड़ी,
“सोनू तू इधर मत आ, इधर की बोतलें मैं उठा
रही हूँ।”
“तो मैं क्या करूंँ? मैं भी तो वही काम कर रहा हूँ।” सोनू भी झल्ला उठा।
उसके साथ ही कुछ और भी बच्चे भी लगे हुए थे, वे भी पानी की बोतलों को बीनने में लगे हुए थे। सोनू,रीना,मोनू सभी बच्चे अधिक से अधिक बोतल पाना चाहते थे ।
बच्चों को देखकर यही लगता है कि क्या बड़े-बड़े मंत्रियों को,सरकार को इन बच्चों के बारे में कोई भी जानकारी नहीं कि इनके रहने और पढ़ाई की व्यवस्था कर सकें ।
बच्चे खाली पड़े पानी के बोतलों को बड़े
ही जतन से उठाते और उसे अपने-अपने बोरों में
भर लेते थे। मीनू सबसे आगे भागती और फिर वह उतना ही गिरती भी थी । फिर वे इन्हे बीना आंँटी के पास पहुँचाते थे। बीना आंँटी एक ऐसी महिला
थी जो बच्चों से ट्रेन के किनारे पटरियों पर गिरे हुए
पानी के बोतल बिनवाकर मंँगाती, उसके बदले में वह बच्चों को कुछ पैसे दे देती थी। फिर उन्हीं सब
बोतलों में जो सही होते साधारण पानी भरकर
मिनरल वाटर कहकर बिकवा देती। इस काम के लिए भी उसके पास कुछ बच्चे थे।
बीना आंँटी एक एक बच्चे को उसका काम बाँट कर रखती थी। मीनू उन बच्चों में सबमें सबसे छोटी थी अतः उससे थोड़ा कम कड़ाई करती थी।
“अरी मीनू आज तो तेरे बोतल कम हैं।”
हाँ आंँटी, कम हैं,पर कल मैं और ज्यादा बोतलें लाऊँगी, आप देख लेना। आंटी आज के पैसे आप मत काटना, मेरी माँ की तबियत ठीक नहीं है, मुझे उनकी दवा भी लानी है।” मीनू एक बार में ही कह गयी ।
बीना आंटी ने भी उसे पूरे पैसे तो दे दिये पर इस चेतावनी के साथ कि कल के हिसाब से वह पैसे काट लेगी ।
मीनू सात साल की उम्र में ही मानों कितनी
बड़ी हो गयी थी।
डॉ.सरला सिंह ‘स्निग्धा’
दिल्ली
