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दिल्ली धमाका से दहशत में  लोग

राजनीतिक सफरनामा

दिल्ली धमाका से दहशत में  लोग :   कुशलेन्द्र श्रीवास्तव

दिल्ली धमाके ने दहशत का माहौल बना दिया । विगत अनेक वर्शो से दिल्ली ऐसे धमाकों से दूर थी । इससे भी ज्यादा हैरान करने वाला आतंकवादियों को वह माड्यूल है जिसमें पढ़े-लिखे डाक्टर शामिल हैं । पूरी गैंग डाक्टरों की ही है । भारत की जिस भूमि में उन्होने जन्म लिया, अपनी पढ़ाई की और डाक्टर जैसे पेशा अपनाया वो भी आतंकवाद की ऐसी घिनौनी हरकतों में शालि हो सकते हैं आश्चर्य की बात तो है ही । हमारी संस्कृति में तो जन्म भूमि का ऋण चुकाने के लिए अपने बलिदान की बात की गई है , दूसरों का जीवनलेने की बात तो सोची भी नहीं जा सकती पर ये वो दरिंदे साबित हुए जो अपनी मातृ भूमि के प्रति भी दुश्ट रवैया अपनाते हैं । इनके खिलाफ तो और भी ज्यादा कठोर कार्यवाही की ही जानी चाहिए । सीमा पार बैठे आतंकवादियों के सरगनोंने पढ़े लिखों को भी बहका लिया ?  10 नवम्बर को दिल्ली के लाल किले  के बाहर हुए आतंक विस्फोट के बार जांच एजेंसियों ने जो तसीस की उसमें हरियाणा के फरीदाबाद स्थित अल-फलाह मेडिकल यूनिवर्सिटी भी जांच के दारें में आ गई । इसी यूनिवर्सिटी में पढ़ने वाले या कार्य करने वाले डाक्टरों का एक बड़ा समूह देश में आतंकवादी साजिशें रचने का षडयंत्र कर रहा था । इस यूनिवर्सिटी के पास स्थित एक घर से ही 29 क्विंटल विस्फोटक बरामद किया गया जिसे यूनिवर्सिटी में कार्य रहे डाक्टरों के समूह ने ही इकट्ठा किया था । अब यह यूनिवर्सिटी भी जांच के दायरे में है । बताया जाता है कि इस यूनिवर्सिटी को 2015 में मान्यता मिली थी । हम सभी जानते हैं कि मान्यता इतनी आसान से तो मिलती नहीं है निश्चित ही किसी न किसी की सिफारिस पर ही मिली होगी तो अब उसका भी पता लगाया जाना चाहिए । बताया जाता है कि यूनिवर्सिटी के मालिकों पर फर्जीवाड़ा के आरोप भी लगे हैं एक फर्जी व्यक्ति कैसे इतनी बड़ी यूनिवर्सिटी बना सकता है तो क्या इस के उपर किसी राजनीतिकों का संरक्षण भी है । पिछले दस वर्शों से चल रही इस यूनिवर्सिटी के डाक्टर जैश-ए-मोहम्मद जैसे आतंकी संगठनों के संपर्क में थे यह तो और भी घातक है । जिस संस्था का काम शिक्षा को बढ़ावा देना होना चाहिए वह संस्था आतंक की फैक्टी के रूप में काम कर रही है ?  डाक्टरों के समूह ने जाने किस तरह यह सोच लिया कि वे पवित्र पेशे की आड़ में आतंकवाद का काम करते रहेगें और भारत की सुरक्षा एजेंन्सियों को पता भी नहीं चलेगा ? उनकी यह भूल ही उनके पतन का कारण भी बनी और भारत के लोग उनके नापाक मंसूबों की चपेट में आने से भी बच गए । 29 क्विंटल का विस्फोटक जखीरा निश्चित ही बहुत बड़ी घटना को अंजाम देता पर सुरक्षा एजेन्सियां उनसे ज्यादा सतर्क और अनुशासित थीं तो उन्होने घटना के पहले ही सारे षडयंत्र को खोल दिया । दिल्ली वाली घटना भी उनकी हड़बड़ाहट के कारण हो गई वरना जिस डाक्टर ने इसे अंजाम दिया है वह भी सलाखों के पीछे ही होता । घटना के कुछ ही देर बाद सुरक्षा एजेंसियों न सारा कुछ पता कर लिया और परत दर परत सारी साजिश को नाकाम कर दिया । एक के बाद एक गिरफ्तारियां तो अभी भी चल रहीं हैं अब शायद ही कोई बचेगा । सीमार पार का आतंकवाद हर बार ठोकरें खाता है और हर बार नये सिरे से खड़ा हो जाता है । भारत ने कई बार उसके मंसूबें पर पानी फेरा है और आपरेशन सिंदूर में तो उनके अड्डों को ही तबाह कर दिया था इसके बाद भी पढ़े लिखे लोग उसके झांसे में आ जाते हैं यह चिन्तनीय है ।  बिहार चुनाव में भी वोटों का धमाका हुआ । एनडीए ने फिर सरकार बना ली । विपक्ष के सारे षडयंत्र विफल हो गए । विपक्ष लगातार वहां आरोपों से घेकर राज्य सत्ता में बदलाव की कल्पना कर रहा था पर इस बार भी ऐसा नहीं हुआ । विपक्ष ने चुनाव को जिस तेजी से उठाया था, चुनाव की घोशणा होने के बाद उनकी वह तेजी कम होती चली गई । राहुल गांधी ने वोटर अधिकार यात्रा निकाली तो लगा उनके पक्ष में तेजी से माहौल बनता जा रहा है पर यात्रा के बाद वे खामोश हो गए तो उनका प्रभाव भी कम होता चला गया, वे यदि प्रचार में बिहार की गलियों में घूमते रहते तो शायद उन्हें कुछ बेहतर फायदा हो जाता । तेजस्वी यादव तो पछिले छै माह से बिहार में प्रचार करते दिख रहे हैं पर उनके पास अनुभव कम है वे केवल विरासत के उत्तराधिकारी बन कर ही प्रचार करते रहे जिसे शायद मतदाताओं ने पसंद नहीं किया । हालांकि ये वे ही तेजस्वी यादव है जो पिछले विधानसभा चुनाव में सत्ता के करीब तो आ गए थे पर कुछ हजार वोटों और कुछ सीटों से सत्ता पर काबिज नहीं हो पाए थे । उन्हें उम्मीद थी कि वे इस बार उस कमी को पूरा कर सत्ता पर काबिज हो ही जयेगें पर बेचारे फिर उससे दूर हो गए । अबकी बार की दूरी आश्चर्यजनक और हताशा से भरी हुई है । बिहार के मुख्यमंत्री लगातार लग रहे आरोपों के बाद भी बिहार की जनता की पहली पसंद बने हुए हैं यह भी आश्चर्यजनक है । उनके बारे में तो यह प्रचारित किया गया कि वे अस्वस्थ्य हैं फिर भी वे बिहार की जनता को पसंद हैं ? भाजपा हर एक चुनाव को पूरी गंभीरता से लड़ती है, उसके पास चुनाव जीतने का एक पूरा कार्यक्रम भी होता है और नेताओं की फौज भी होती है । योजनाबद्ध ढंग से वह चुनाव लड़ती है और अपनी पूरी फौज को काम पर लगा देती है । चुनाव के ऐन पहले जिस तरह से महिलाओं को रिझाने के लिए योजनएं र्ला गई, आनन-फानन में उन्हें लागू भी किया गया उसने महिलाओं को उनकी आरे आकर्शित किया । मतदान करने वाली महिलाओं की फौज भाजपा की जीत का कारण बनी । मतदान प्रतिशत भी बहुत बढ़ा । इसे लेकर भी कयास लगाये जाते रहे कि यह बढ़ा हुआ मतदान किसको फायदा पहुंचाने वाला है । आमतौर पर इसे सत्ता के विरूद्ध ही मान लिया जाता है पर पिछले कुछ चुनावों से ऐसा हुआ नहीं है । बढ़ा हुआ मतदान प्रतिशत सत्तारूढ़ दल को सत्ता के और करीब लेकर आता दिखाई दे रहा है । जिस तरह से एसआईआर कराया गया और सह बताया गया कि इससे फर्जी वोटरों की संख्या कम हुई है और उसक के कारण ही वोटों का प्रतिशत बढ़ा है ऐसा भी कहा जा रहा है । बहरहाल वोटों के प्रतिशत बढ़ने का फायदा एनडीए गठबंधन को ही हुआ अब यह स्पश्ट हो गया है । बिहार चुनाव में एनडीए के अंदर शामिल पार्टियों के नेता तो अपनी ही सीटों पर प्रचार करते रहे पर भाजपा ने इस चुनाव में अपनी पूरी ताकत झोंक दी । प्रधान मंत्री से लेंकर अमितशाह तक बिहार के चुनाव को लेकर लगातार सक्रिय रहे उनके साथ उनकी पूरी केबिनेट भी सक्रिय रही । भाजपा शासित राज्यों कु मुख्यमंत्री भी बिहार की गलियों में घुम-घुम कर भाजपा के लिए वोट मांगते दिखाई दिए । उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी जी ने की मांग सबसे अधिक रही तो उन्होने भी ढेरों सभाएं की और रैली भी की । बिहार का एक क्षेत्र उत्तर प्रदेश की सीमा से लगता भी है तो वहां योगी जी के प्रचार का असर भी दिखाई दिया । बुलडोजर के साथ उनका स्वागत हुआ और उनकी अपनी चिरपरिचित शैली है ही । भाजपा ने जहां जिस की जरूरत है वहां उसको उस क्षेत्र की कमान सौंप दी गई । निश्ठावान कार्यकर्ता और उत्साहित कार्यकर्ता चुनाव में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है । भाजपा के पास ऐसे कार्यकर्ताओं की पूरी फौज है जिसका उपयोग वे करते हैं । विपक्ष के पास ऐसी फौज की कमी देखी जाती है । लगातार सत्ता से देर रहने के कारण उसके पास कार्यकर्ताओं की कमी भी है और धनबल की भी । तेजस्वी यादव तो सक्रिय रहे पर कांगेस के बड़े नेता सुविधाभोगी राजनीति ही करते रहे । कांग्रेस के आगे न उठ पाने का कारण भी यह ही है । कांग्रेस के राहुल गांधी सहित बड़े नेताओं को सुविधाभोगी राजनीति को छोड़ना पड़ेगा और आम कार्यकर्ता से मेलजोल बढ़ाना पड़ेगा । राहुल गांधी अपनी यात्रा के दौरान जिस सहजता से आम लोगों से मिलते हैं उतनी सहजता उनके पास बाद में नहीं होती । कांग्रेस के बड़े-बड़े नेता तक यह आरोप लगाते रहे हैं कि कांग्रेस के बड़े नेता दिल्ली दरबार में उनसे मिलते ही नहीं हैं । कांग्रेस छोड़कर गए अधिकांश नेता इस पीड़ा से गुजरे हैं और यह ही उनके कांग्रेस छोड़कर जाने का कारण भी रहा है । ऐसा नहीं है कि भाजपा में अमितशाह जैसे बड़े नेता आम कार्यकर्ताओं से बड़ी सहजता से मिलते हों पर फिर भी उनके पास एक कैडर है जो कार्यकर्ताओं को प्रसन्न रखने में कामयाब हो जाता है । बिहार में पिछले पाचं सालों से धरातल पर मेहनत कर रहे प्रशांत किशोर को भी निराशा ही हाथ लगी । वे कुछ ज्यादा परिवर्तन नहीं ला पाए जबकि वे गांव-गांव और द्वार-द्वार घूमते रहे हैं । प्रशांत किशोर की जनसुराज पार्टी को उम्मीद थी कि वे इतनी सीटें तो पा ही लेगें कि वे सत्ता में सौदेबाजी कर सके पर ऐसा नहीं हुआ । लगभग यही हाल एआईएमआई का भी हुआ ओबेसी ढेरा डालकर बैठे रहे और गलियों में घुमकर मुस्लिम मतदाताओं को अपनी ओर आकर्शित करने का प्रयास करते रहे । उनका तो एक ही अजंडा है ‘‘अब्दुला मुख्यमंत्री बनेगा’’ । पर मुस्लिम मतदाता ज्यादा उनकी बातों में नहीं आया ऐसा लगने लगा है । मुसलिम मतदाता की समस्या भाजपा है और वह जानता है कि यदि मुस्लिम वोटें बंटेगीं तो इसका फायदा भाजपा को ही होगा संभवतः इसके चलते ही वो आबोसी की अच्दी बातों को भी नजरअंदाज कर गया । बिहार चुनाव में यह तो साफ हो गया है कि आमतौर पर किसी तीसरी पार्टी के प्रति मतदाताओं का रूझान देखने को मिलता नहीं है । क्षेत्रीय दल भी लगभग 90 के दशक में पनप गए वे ही आज मतदताओं के बीच लोकप्रिय हैं वरना नए क्षेत्रियदल अब मतदाताओं को रिझा भी नहीं पा रहे हैं । प्रशांतकिशारे ने जिस तरह से मेहनत कर पार्टी को खड़ा किया और पार्टी में अच्छे लोगों को आश्रय दिया, उम्मीदवार भी बहुत बेहतर खड़े किए पर इसके बावजूद भी उनका परफामेंश उम्मीद से कहीं कम ही रहा । गठबंधनों में शामिल छोटे-छोटे दल भी बहुत बेहतर प्रदर्शन नहीं कर पाए । भविश्य की राजनीति के लिए ह संकेत है कि अब मतदाता केवल दो पार्टियों के बीच ही अपना भविश्य तलाशेगा ।

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