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शोषक भी हम – शोषण भी हमारा, फिर न्याय के लिए भटकना कैसा..!

पंकज सीबी मिश्रा  / राजनीतिक विश्लेषक़ एवं पत्रकार जौनपुर यूपी

 स्टार्टअप से बात शुरू हुई औऱ जज के घर करोड़ों के अधजले नोट मिले, मुद्रा लोन को बढ़ावा दिया जाना था औऱ अडानी को अरबों का लोन मिला, स्वरोजगार की बात चली औऱ सरकारी नौकरियों को कम कर दिया गया। रोजगार देने वाले 70% से अधिक उद्योग बंद हो चुके हैं, या बीमार हैं इसके बावजूद  भारत आर्थिक असमानता की अंधेरी गुफा से बाहर आ चुका है। भारत में गरीबी का कोई स्थाई  समाधान नहीं है। अब भारत विश्व की नम्बर एक अर्थव्यवस्था भले ही बन जाये, तो भी मुफ्त अनाज बंटता रहेगा। नीति निर्माता जानते हैं कि हम आप सरकारें अर्थव्यवस्था, शिक्षा, स्वास्थ्य पर नहीं चुनते हैं । अपनी जाति औऱ कट्टर व्यक्ति भले वो लुटेरा हो, हमारी पहली चॉइस होती है। इसके बावजूद भारत विश्व की चौथी अर्थव्यवस्था बन गया। लेकिन आम आदमी के जीवन में वह परिवर्तन नहीं हुआ जो होना चाहिये था। इसको वर्तमान में चल रहे टैरिफ युद्ध से सरलता से समझ सकते हैं। हर देश अपने उद्योगों, उत्पादों के संरक्षण के लिये टैरिफ लगाते हैं। जिससे आयात इतना सस्ता न हो जाय कि स्वदेशी उत्पादन पर विपरीत असर पड़े। जो देश विकसित हैं उनके पास तकनीक है। वह अपने किसानों, उद्योगपति को सब्सिडी देते हैं। इससे वह किसी भी देश में अपने देश का सामान डंप कर सकते हैं। टैरिफ का उद्देश्य इसी को रोकना है। यही सिद्धांत देश के अंदर भी लागू होता है। लेकिन इसको रोकने के लिये न कोई कानून है न ही कोई टैरिफ है। बड़े बड़े उद्योगपति जिनके पास अकूत संपत्ति है उनके कुकर्मो को क़ानून से भी संरक्षण मिलता है , उन्होंने छोटे व्यापारियों, लघु उद्योगों को खत्म कर दिया। जिसमें आम जनमानस स्वरोजगार करता था। इस राष्ट्र कि संस्कृति में आम लोगो को ही अपने अधिकारों का प्रयोग पर कठोर दंड का प्राविधान है ।

                मनुष्य के सूक्ष्म व्यवहार से लेकर देवताओं को भी इसके अंतर्गत रखा गया था। हमारे समाज में आज व्यवहार में क्यों न हो लेकिन यह प्रचलित है कि जब श्रेष्ठ लोग बात कर रहें हो तो छोटो को नहीं बोलना चाहिये। वैदिक युग में सबसे पूज्य देवता और सभी यज्ञों के प्रमुख अतिथि इंद्र को अपने अधिकारों के दुरुपयोग के लिये दंडित किया गया। उन्हें सभी पूज्नीय अनुष्ठानों से वंचित कर दिया गया। इन सबके अमूल्यन का कारण हमारी मानसिक गुलामी से उपजी हीनता है। शोषक – शोषित से बनी बुद्धिजीवी अवधारणा को ही हमनें सुधार का आधार बना दिया। हमारी शिक्षा ने हमारे संघर्ष को गुलामी का घोषित कर दिया। यधपि अब्राहम लिंकन का कथन है कि जो समाज संघर्ष और प्रतिरोध कर रहा हो उसे गुलाम नहीं कह सकते हैं। तो भारतीय इतिहास का वह कौन सा पन्ना है जिसमें तलवारें न उठी हो, यह धरा रक्तरंजित न हुई हो। यह मात्र सुप्रीम कोर्ट और राष्ट्रपति या कार्यपालिका न्यायपालिका का संघर्ष नहीं है। यह भारत के हर क्षेत्र में है। अंतर बस इतना है कि रिक्शेवान कि कार वाले से घृणा दिख नहीं रही है। यहां तो साहित्यकार एक दूसरे से घृणा करते हैं। चारो तरफ लोग ईष्र्या, घृणा में जी रहें हैं। एक दूसरे को अपमानित करने और उसके अधिकारों में हस्तक्षेप कर रहें हैं। बड़ी बड़ी कम्पनियों ने रणनीति के तरह भारत में समानांतर सत्ता बना लिया। सबसे पहले उन्होंने अपने उत्पाद को सस्ता करके छोटे बिजनेस करने वालों को बंद कर दिया। फिर बाजार पर एकाधिकार कर लिया। भारत का जो विकास 15 वर्षों में हुआ है। उसमें 62% विकास उद्योगपतियों का हुआ है। उनकी आय 1.2 ट्रिलियन अरब डॉलर बढ़ गई है।

अधिकांश भारतीय युवा सेल्समैन, विभिन्न प्रकार के मैनेजर में बदल गया है। जिनका नाम एरिया मैनेजर है, उनकी सैलरी औसतन पंद्रह हजार रुपये है। देखते देखते हम सभी इन उद्योगपतियों के मजदूर बन गये। जो बचें हैं वह भी बन जायेंगे। छोटे मझोले उद्योगों और स्वरोजगार करने वालों का विनाश करके हम चौथी अर्थव्यवस्था बने हैं।फिर भी हम इस असत्य अवधारणा को स्वीकार कर लिये, हम गुलाम थे , शोषित थे आदि! यह हमारी पूर्वाग्रहों से ग्रसित शिक्षा कि उपलब्धि है। इसी मानसिक गुलामी से हीनता पैदा हुई। हीनता का अपना मनोविज्ञान है। जो घृणा, ईष्र्या, दम्भ का स्रोत है।  जब व्यक्ति इसी हीनता के साथ किसी पद पर पहुँचता है, तो उसके अवचेतन में छिपे यह भाव नग्न होकर व्यक्त होने लगते है। एक अराजक स्थिति पैदा होती है।

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