सात साल पहले रामदीन के लड़के ने विजातीय लड़की से शादी क्या कर ली रमाकांत ने पूरा गाँव सिर पर उठा लिया था। भरी पंचायत में रामदीन के परिवार की इज्ज़त को तार तार कर के रख दिया था। रमाकांत गांव के रसूखदार व्यक्ति थे, समाज के साथ साथ सारा गांव उनकी इज्ज़त करता था अत: बहुमत को अपने पक्ष में करने में उन्हें अधिक परिश्रम नहीं करना पड़ा था। रामदीन ने कितनी ही सफाई दी लेकिन रमाकांत के आगे उसकी एक भी नहीं चली थी।
“ये हमारे समाज और गांव को क्या संस्कार दे रहे हैं…” रामदीन की ओर हाथ से इशारा करते हुए रमाकांत ने गुस्से से तमतमाते हुए कहा “…आज स्वयं को सही साबित कर आने वाली पीढ़ी को क्या संदेश देना चाहते हैं?”
गाँव के कुछ लोगों ने उनकी हां में हां मिलाते हुए रामदीन को भला बुरा कहना जारी रखा। रमाकांत के प्रभाव में जो लोग रामदीन के शुभ चिंतक थे, वे भी अब उसकी आलोचना करने पीछे नहीं रहे।
“हुज़ूर आजकल ज़माना बदल गया है। आजकल बच्चे मां बाप की कहां सुनते हैं। कहते हैं, जीवन हमें बिताना है, जीवन साथी हम ही चुनेंगे…” विवश रामदीन ने सारा दोष वर्तमान पीढ़ी के सिर पर डालने का प्रयास किया किन्तु रमाकांत ने बात बीच में ही काट कर उसे झिड़कते हुए कहा
“बच्चे नहीं सुनते… ये क्या बात हुई, ऐसा कहकर तुम अपनी जिम्मेदारियों से बच नहीं सकते हो। जब अच्छी शिक्षा नहीं दे सकते तो बच्चे पैदा ही क्यों करते हो?” रमाकांत गुस्से में न जाने और भी क्या क्या कह गए।
रामदीन साधारण परिवार का संवेदनशील स्वाभिमानी व्यक्ति था। गांव में उसकी भी पूछ थी। समाज में उसका अपना स्थान था। उसके दो बेटे थे, दोनों पढ़ने में होशियार थे। छोटा अभी बारहवीं में था जबकि बड़ा बेटा पुणे की किसी मल्टी नेशनल कंपनी में सॉफ्टवेयर इंजीनियर था।
किसी व्यक्ति की सफलता और उन्नति कई बार लोगों की ईर्ष्या का कारण बन जाती हैं। लोग उस व्यक्ति को नीचा दिखाने का अवसर ढूंढ़ने लगते हैं। कुछ ऐसा ही रामदीन के साथ हुआ। रामदीन के बड़े बेटे की शादी की बात गांव में फैलते देर न लगी। उसने अपनी सहकर्मी लड़की से शादी कर ली थी जिसका सम्बन्ध किसी दूसरी जाति से था और यही बात रमाकांत के लिए नागवार थी। वे अपने धर्म और जातिवाद के कट्टर समर्थक थे। आनन फानन में समस्त बिरादरी वालों की आपात बैठक बुलाई गई जिसमें छोटे बड़े सभी तबके के लोग शामिल हुए।
कुछ लोगों ने नई हवा के रुख को पहचाना और रामदीन के समर्थन में खड़े हुए। लड़की भले ही जाति की नहीं है लेकिन होनहार है। रूप और गुण में किसी से कम नहीं है। कमाती भी अच्छा है और जब रामदीन के परिवार को कोई आपत्ति नहीं है तो भला क्यों किसी के सीने पर सांप लोट रहा है। हालांकि रामदीन भी इस शादी से खुश नहीं थे किन्तु बच्चों के तर्क और जिद के आगे उन्हें अनुमति देनी ही पड़ी थी।
कितने ही व्यस्त रहें रमाकांत समाज की भलाई के लिए अपना समय अवश्य निकाल लेते थे। इस बार भी वे न केवल बैठक में आए बल्कि बढ़ चढ़ कर रामदीन और उसके परिवार की बखिया उधेड़ते रहे। प्रेम विवाह और विजातीय विवाह की जमकर आलोचना करते हुए उसे नई पीढ़ी के बच्चों पर बुरा प्रभाव पड़ने और मानसिक पतन का कारण बताने लगे थे।
उनकी तार्किक शक्ति के आगे किसी की न चली। बैठक में सदस्यों द्वारा बहुमत से रामदीन को सपरिवार समाज से बहिष्कृत करने का निर्णय सुना दिया गया था।
लोगों ने समाज से बहिष्कृत रामदीन का गांव में रहना दूभर कर दिया। बात बात में उन्हें अपमानित किया जाने लगा था। अंततः परेशान होकर रामदीन गांव छोड़कर शहर चले गए।
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आज रमाकांत के घर बड़ा सा शामियाना लगा हुआ था। उनकी इकलौती बेटी रश्मि के विवाह का भोज चल रहा था। समाज की अनेक प्रतिष्ठित विभूतियों सहित गांव के सभी लोग निमंत्रित थे। चारों ओर स्वादिष्ट पकवान की महक भरी हुई थी। लोग सामर्थ्यानुसार उपहार लेकर आ रहे थे। शहर से भी गणमान्य अतिथियों का जमावड़ा लगा हुआ था।
एक विशेष बात जो देखने में आई थी वह यह कि इस आयोजन में सात वर्ष पूर्व समाज से निष्कासित रामदीन को भी बुलाया गया था। रामदीन को देख लोगों में खुसुर फुसुर शुरू हो गई।
“अरे गणेश, वो देखो, रामदीन ही है न?”
“हां…हां वही तो है।”
“इसे तो समाज से बाहर कर दिया गया था, ये यहां कैसे आ गया?”
“रमाकांत जी ने ही बुलाया होगा, वरना कैसे आता।”
“अरे भाई, रमाकांत जी ने ही तो उसे बहिष्कृत किया था, वो भला क्यों बुलाने लगे।”
जुगल बीच में बोल पड़ा –
“तुम्हें कुछ नहीं मालूम?”
“क्या?” दोनों के मुंह से निकला।
“यही कि जिस वज़ह से रमाकांत ने रामदीन का बहिष्कार किया था, वो खुद आज उसी स्थिति में हैं।”
“क्या मतलब?” बिसेसर ने पूछा।
जुगल ने चारों ओर सतर्क दृष्टि घुमाई फिर आश्वस्त होता हुआ धीरे धीरे कहने लगा –
“रमाकांत की बेटी कॉलेज की पढ़ाई करने शहर गई थी। वहीं उसे एक असिस्टेंट प्रोफेसर से प्रेम हो गया। उसने उसी के साथ विवाह करने की जिद पकड़ ली। रमाकांत ने उसे खूब समझाया, साम, दाम, दंड, भेद सबका सहारा लिया। वह इनकी जाति का नहीं है, लोग क्या कहेंगे… आदि आदि…” एक बार फिर जुगल ने आस पास सावधानी से देखा, फिर आगे झुककर कहना शुरू किया
“इंसान कितना भी तुर्रमखान क्यों न हो, भले दुनिया को जीत ले किंतु अपनी औलाद से नहीं जीत सकता है। बेटी की जिद के आगे उसने भी घुटने टेक दिए।”
अचानक बिसेसर के मुंह से निकल पड़ा
“तभी मैं कहूं इनका हृदय परिवर्तन कैसे हो गया।”
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अजय कुमार पाण्डेय
सी 402, वालफोर्ट सफायर
रायपुर (छ. ग.)
