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चीनी, मजबूरी या जरूरी

देश-दुनिया में जिस हिसाब से मधुमेह (शुगर) के रोगियों की तादात बढ़ती जा रही है, उसने यह सोचने के लिए विवश कर दिया है कि चीनी मजबूरी है या जरूरी है। यह तो बात हुई एक खाद्य पदार्थ की और दूसरा मसला है पड़ोसी देश चीन का, उसके उत्पादों और आदमदियों को भी हम चीनी ही कह कर पुकारते हैं। खाद्य पदार्थ चीनी की वही बात इस दूसरे वाले चीनी पर भी लागू होती है। क्या यह चीनी भी अब हमारे लिए मजबूरी है या जरूरी है। 30 अगस्त को जब यह आलेख लिख रहा हूं तो हमारे प्रधानमंत्री चीन की यात्रा पर हैं। वे 31 अगस्त से शुरू हो रहे दो दिवसीय शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) के वार्षिक शिखर सम्मेलन में भाग लेने गए हैं। लगभग दो सप्ताह पहले चीनी विदेश मंत्री वांग यी ने भी भारत की यात्रा की थी। इस यात्रा में आर्थिक संबंधों को मजबूती देने और पुराने रिश्तों की तल्खियों को दूर करने के उपायों पर विचार-विमर्श की संभावना है। उनकी सुखद और सफल यात्रा की कामना करते हुए आशा करता हूं कि सब शुभ हो, सब के लिए मंगलकारी हो।

ऑपरेशन सिंदूर के बाद और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप की लगातार बयानबाजी के बाद काफी कुछ बदला है। यह बात भी जगजाहिर है ऑपरेशन सिंदूर के दौरान चीन ने खुल कर पाकिस्तान का साथ दिया था। अमरीका की बात करें तो हमने नमस्ते ट्रंप भी किया, अब की बार ट्रंप सरकार के नारे भी लगाए, उनकी जीत के लिए भारतीयों ने यज्ञ-हवन तक किये थे। लेकिन लगता है अब कुछ जाया गया। अमरीक की ट्रंप सरकार ने भारत पर पचास फीसदी टैरिफ बढ़ा दिए। विशेषज्ञ बताते हैं कि इससे भारत और भारतीयों को बहुत नुकसान होने वाला है। कई उद्योगों जैसे हीरा कारोबार आदि पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं। इसका जल्द ही कोई हल निकलना होगा। शायद इसका हल निकलने के लिए ही सरकार ने चीन की ओर हाथ बढ़ाया हो, इस बात की संभावना है।

भारत-चीन के 1962 के युद्ध को 62 साल हो चले हैं लेकिन चीनियों ने जो विश्वासघात किया था वह भुलाया नहीं जा सकता। खैर, बीत गई सो बात गई, 21 वीं सदी में अलग तरीके के अंतराष्ट्रीय संबंध उभर रहे हैं। कौन कब दुश्मन है और कब दोस्त कुछ कहा नहीं जा सकता। सब कुछ, कुछ विश्वास और कुछ संभावनाओं और बहुत कुछ आर्थिक हितों के ऊपर निर्भर करता है। कौन किसके लिए कितना और कब तक लाभकारी है। यदि गौर से देखा जाए तो लोगों के  अधिकतर व्यक्तिगत संबंधों की बुनियाद भी इसी प्रकार की नीति है।

दोनों चीनी, एक चीनी सामान जिसका सोशल मीडिया और कई बार मुख्यधारा की मीडिया पर जब-तब विरोध देखा जाता है। खासकर त्योहारों पर यह चलन बढ़ जाता है। लेकिन चीनी माल हर बार आता है और बाजारों में खूब बिकता है। चीनी हर बार मुनाफा कमाते हैं और हम केवल हर बार चिल्लाते और बस चिल्लाते हैं। क्या हमारे देश में चीनी माल के मुकाबले का सामान बनाने का कोई कारखान है? यह सोचने वाली बात है, केवल विरोध के लिए विरोध करना है ये अलग बात है। भौगोलिक स्थिति के चलते चीनी सामान हमारी मजबूरी है और हमारे देश में इतना सस्ता कोई और विकल्प ना होने के कारण जरूरी भी है।

इसी प्रकार दूसरी चीनी यानी खाने वाली चीनी का विकल्प मौजूद है गुड और शक्कर। लेकिन वे सीजनल (मुख्य रूप से सर्दियों में बनते हैं) होने के कारण और स्टोर करने की दिक्कत के कारण यह वाली चीनी भी शायद जरूरी भी है और मजबूरी भी है। मैं व्यक्तिगत तौर पर पूरी कोशिश कर रहा हूं कि इस वाली चीनी को छोड़ा जाए, चीनी चाय पीना लगभग छोड़ दिया है, चीनी वाली मिठाई भी धीरे-धीरे कम की जा रही है। शौकिया तौर पर केवल ब्लैक कॉफी पीता हूं। और दूसरा चीनी उत्पाद से छुटकारा थोड़ा मुश्किल है क्योंकि जिस मोबाइल पर यह आलेख टाइप किया है। वह मोबाइल चीन से ही बन कर निकल है और आंकड़े बताते हैं कि भारत में यूज किए जाने वाले अधिकतर मोबाइल और अन्य डिवाइस चीन की ही देन है। अधिकतर भारतीय तो शायद यह भी नहीं जानते कि जब सोशल मीडिया आदि पर जिस डिवास से वे चीनी उत्पादों का विरोध दर्ज कर रहे हैं वह डिवास हो चीनी है। यह ठीक वैसी ही बात है जब दीवारों पर लिखकर सचेत किया जाता है कि ‘दीवार पर लिखना मना है’। बहराल, जब इतने लेन-देन हैं तो आप समझ ही सकते हैं कि चीनी, मजबूरी है या जरूरी है।

डॉ. मनोज कुमार

लेखक – जिला सूचना एवं जनसंपर्क अधिकारी हैं।

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