(राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 (एनईपी) के पांच साल)
स्कूल समाजीकरण के प्राथमिक माध्यम के रूप में नागरिकों के निर्माण में पहला और सबसे महत्वपूर्ण घटक है। इवान इलिच ने अपनी पुस्तक ‘डिस्कूलिंग सोसाइटी’ (1971) में तर्क प्रस्तुत किया है कि “शिक्षा का संस्थागतकरण एक अति-संस्थागत समाज के निर्माण को गति प्रदान करता है। शिक्षा प्रणाली एक ऐसी जगह है जहाँ शक्ति का प्रयोग और पुनरुत्पादन होता है। शैक्षिक नीतियाँ प्रभुत्वशाली विचारधाराओं को प्रतिबिंबित करने और उन पर प्रभुत्व स्थापित करने के लिए प्रयुक्त उपकरण हैं।”
राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 (एनईपी) इससे अलग होने का प्रयास नहीं करती, बल्कि, इसे स्थापित करने का जोरदार समर्थन करती नजर आती है।राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 (एनईपी) ने हाल ही में अपनी पाँचवीं वर्षगांठ मनाई है। हालांकि किसी नीति की प्रभावशीलता का मूल्यांकन करने के लिए यह बहुत कम समय है, विशेष रूप से ऐसी शैक्षिक नीति जिसके लिए 12 वर्षों की स्कूली शिक्षा के एक पूर्ण चक्र को पूरा करने में कम से कम 17 वर्ष लगते हैं। एक इसकी वर्षगांठ को लेकर होने वाले हंगामा और उन्माद ने मुझे इसका आकलन और मूल्यांकन करने के लिए प्रेरित किया और दूसरा शिक्षण संस्थानों में दाखिले के घटते रुझान ने।
किसी भी नीति के अध्ययन के विमर्श में एक कहावत है कि सभी नीतियाँ अच्छी होती हैं; उसका कार्यान्वयन मायने रखता है। नीति-निर्माता अपनी नीतियों के समर्थन में इसी रुख का इस्तेमाल करते हैं; ‘कार्यान्वयन का अंतराल’, कार्यान्वयन नीति की गरिमा को बचाने के लिए बलि का बकरा बन जाता है।
शैक्षणिक नीतियों के मामले में, शिक्षक को ही बलि का बकरा बनाया जाता है। तर्क यह है कि नीति बहुत अच्छी और नेकनीयत थी, लेकिन कक्षा में एक हितधारक के रूप में शिक्षक ही इसे क्रियान्वित करने में विफल कर देता है। कुछ समर्थक तो यहाँ तर्क प्रस्तुत करते हैं कि नीति बहुत अच्छी थी लेकिन हमारा वर्तमान समाज अभी तक इसको अपनाने के लिए विकसित ही नहीं हुआ है और यह नीति की नहीं, बल्कि समाज की विफलता है। हालाँकि, वे यह समझने में विफल रहते हैं कि बुनियादी खामियों वाली खराब तरीके से बनाई गई नीति को प्रभावी ढंग से ‘कार्यान्वित’ नहीं किया जा सकता है। अतीत में अनेक नीतियाँ हैं जिनकी विफलताओं का अलग से मूल्यांकन किया जा सकता है।
यदि नीति में आवश्यकताओं, संसाधनों, उद्देश्यों, प्रक्रियाओं और नीति-निर्माण की प्रक्रियाओं के ‘विवरणों’ पर गहराई से विचार नहीं किया गया है, तो यह अपने ही भार से डूब जाएगी; या फिर यदि इसे जैसे-तैसे लागू कर दिया गया हो, तो भी यह देर-सबेर दम तोड़ देगी। यदि इसे कड़ाई से लागू किया गया, तो यह ‘अति-संस्थागतीकरण’ को जन्म देगा, जोकि और अधिक बोझिल होगा। कार्यान्वयन की विफलता अक्सर इस बात का संकेत होती है कि ‘सभी पहलुओं’ पर ठीक से विचार नहीं किया गया था, जिसका अर्थ है कि नीति स्वयं ही सही ढंग से तैयार या डिज़ाइन करने में कुछ खामियां रह गई थी।
इस लेख में, नीति की मूलभूत खामियों – साहित्यिक चोरी, अतिरेक, राजनीतिकरण, एजेंडा-संचालित निर्णयों- पर चर्चा नहीं की गई है। यह मेरा उद्देश्य भी नहीं है मेरा ध्यान मुख्य रूप से ‘कार्यान्वयन’ पर है कि क्या वास्तव में ‘अपनी बात पर अमल’ करने और उसे ईमानदारी से लागू करने के प्रयास किए गए थे। इसके लिए कुछ महत्वपूर्ण बिंदु हैं, जिनका अवलोकन करना अनिवार्य है, वे निम्नलिखित हैं और किसी भी नीति के सफल कार्यान्वयन के अति आवश्यक बिंदु हैं :-
*बजटीय आवंटन* :-कोठारी आयोग की शिक्षा पर सकल घरेलू उत्पाद का छह प्रतिशत खर्च करने की एक पुरानी सिफारिश है। जिस वर्ष राष्ट्रीय शिक्षा नीति लागू हुई, उस वर्ष शिक्षा के लिए बजटीय आवंटन 93,847 करोड़ रुपये था, जो उस वर्ष के सकल घरेलू उत्पाद का 3.37 प्रतिशत था, जबकि राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 में छह प्रतिशत आवंटन की मांग दोहराई गई है। 2024-25 में, शिक्षा के लिए 1,20,627 करोड़ रुपये आवंटित किए गए, जो कि वित्तीय वर्ष के बजट का 2.53 प्रतिशत है। वार्षिक मुद्रास्फीति के हिसाब से समायोजित करने पर यह ऋणात्मक वृद्धि की ओर संकेत करता है।
*विश्वविद्यालयों, कॉलेजों और स्कूलों में नामांकन प्रक्रिया* :- नई नीति के साथ, स्कूलों और विश्वविद्यालयों में नामांकन बढ़ने की उम्मीद थी। हालांकि, सरकार द्वारा जारी यूडीआईएसई (शिक्षा के लिए एकीकृत जिला सूचना प्रणाली) के आँकड़े कुछ और ही कहानी बयां करते हैं। नई शिक्षा नीति से एक साल पहले, सरकारी स्कूलों में 13,09,31,634 छात्र थे, जो 2023-24 में घटकर 12,74,90,199 रह गए, जो 2.62 प्रतिशत की कमी को दर्शाता है। इसी प्रकार, निजी स्कूलों में 2019-20 में 9,82,09,302 छात्र नामांकित थे और 2023-24 में 8.32 प्रतिशत की गिरावट आई, और केवल 9,00,36,939 छात्र ही नामांकित हुए। नोटबंदी, जीएसटी और कोरोना महामारी के कारण हुए पलायन और बेरोजगारी से निजी स्कूलों से सरकारी स्कूलों की ओर बढ़ते मामूली रुझान को देखा जा सकता है, लेकिन आँकड़े अभी भी उच्च ड्रॉपआउट दर की ओर संकेत करते हैं। उच्च शिक्षा संस्थानों (HEI) में 2019-20 में 3,85,36,359 छात्रों ने दाखिला लिया। 2022-23 में यह संख्या बढ़कर 4,20,62,073 हो गई, जो 9.14 प्रतिशत की उल्लेखनीय वृद्धि दर्शाती है। हालाँकि, उत्तीर्ण प्रतिशत की तुलना इस प्रकार है: 2019-20 में, 94,01,910 छात्र उत्तीर्ण हुए; 2022-23 में, 1,05,94,226 छात्रों ने उपाधियां अर्जित कीं, जो 24.39 प्रतिशत से 25.18 प्रतिशत की मामूली वृद्धि को दर्शाती है।
यदि हम हरियाणा की बात करें, चूंकि मैं इसी प्रांत से आता हूं, तो हरियाणा उच्चतर शिक्षा विभाग ने चालू शैक्षणिक सत्र 2025-26 के लिए मिशन एडमिशन की शुरुआत करते हुए राज्यभर के सरकारी और सहायता प्राप्त कॉलेजों में खाली सीटों को भरने के लिए कमरकसी हुई है। वर्तमान में कुल 2,25,771 सीटों में से 1,21,954 सीटें अब भी खाली हैं। छात्रों को प्रवेश का अवसर देने के लिए ऑनलाइन दाखिला पोर्टल 28 अगस्त, 2025 तक पुनः खोला गया है। पिछले शैक्षणिक सत्र 2024-25 में भी प्रदेशभर के कॉलेजों में लगभग 42 फीसदी सीटें खाली रह गई थी। इस बार उच्चतर शिक्षा विभाग ने सभी सीटों को भरने का लक्ष्य तय किया है। अधिकतम दाखिले सुनिश्चित करने के लिए मिशन मोड में काम शुरू कर दिया है। कॉलेजों में खाली सीटों को भरने के लिए प्रचार-प्रसार तेज किया गया है। डिजिटल और ऑफलाइन दोनों माध्यमों से अभ्यर्थियों को प्रेरित किया जा रहा है। साथ ही कॉलेजों को भी स्थानीय स्तर पर संपर्क अभियान चलाने के निर्देश दिए गए हैं। उच्चतर शिक्षा विभाग ने विद्यार्थियों और अभिभावकों से अपील भी की है कि वे समय रहते दाखिला सुनिश्चित करें ताकि शिक्षा सत्र की पढ़ाई समय पर शुरू हो कॉलेजों में 77,992, राजकीय कॉलेजों में 1,06,082 और सेल्फ फाइनेंस कॉलेजों में 41,697 कुल 2,25,771 सीटें हैं। इसी प्रकार व्यावसायिक शिक्षण संस्थानों आईटीआई में भी काफी मात्रा में सीटें खाली हैं और यह सिलसिला कई सालों से जारी है। मुझे याद है जब लगभग दो दशक पहले मैं एमए हिंदी करने के लिए गांव से सरकारी कॉलेज में आया था तो हमारी पूरी क्लास भरी रहती थी, बच्चे लाइन में लगे होते थे कि किसी-ना-किसी स्ट्रीम में दाखिला हो जाए। आज देखता हूँ कि शिक्षकों को कोर्स चलने के लिए जैसे-तैसे बच्चों को बहलाना-फुसलना पड़ता है। पार्ट-टाइम और गेस्ट टीचरों पर इसका दबाव बखूबी देखा जा सकता है।
*विद्यालयों और विश्वविद्यालयों में शिक्षकों की भर्ती प्रक्रिया* :- आंकड़े बताते है कि नई शिक्षा नीति- 2020 से पहले, सरकारी स्कूलों में 49,38,868 शिक्षक थे; उसके बाद के वर्षों में, यह संख्या 2 प्रतिशत बढ़कर 50,37,667 हो गई है। इस बीच, निजी स्कूलों ने 3.53 प्रतिशत अधिक शिक्षकों की भर्ती की, जिससे उनकी संख्या 36,02,625 से बढ़कर 37,30,047 हो गई। विश्वविद्यालयों में, शिक्षकों की संख्या 2019-20 से 2024-25 तक 6 प्रतिशत की वृद्धि दर्शाती है। हालाँकि, शिक्षकों की कमी अभी भी बहुत बड़ी है। हाल ही में लोकसभा में एक प्रश्न के उत्तर में, सरकार ने बताया कि अकेले केंद्रीय उच्च शिक्षा संस्थानों में 14,600 संकाय पद रिक्त हैं; इसी प्रकार, पूरे भारत के स्कूलों में 8.4 लाख रिक्तियां हैं।
इस नीति का उद्देश्य अंतःविषय, बहु-प्रवेश और निर्गम, दोहरी डिग्री, चार वर्षीय स्नातक कार्यक्रम हैं। इसमें कई अन्य उच्च, किन्तु जटिल विचार भी हैं जो अन्य देशों की शिक्षा प्रणाली से प्रचुर मात्रा में कॉपी किए गए हैं। इसमें विदेशी संस्थानों का स्वागत करने के साथ-साथ भारतीय ज्ञान प्रणालियों को पढ़ाने और छात्रों में वैश्विक ज्ञान को आत्मसात करने का भी इरादा भी झलकता है। इस नीति में भारतीय मूल्यों और लोकाचार के तत्व भी प्रचुर मात्रा में निहित हैं। वैश्विक प्रतिस्पर्धा और भारतीय मूल्यों में निहित परस्पर विरोधी आकांक्षाओं के बीच सामंजस्य बिठाने का यह प्रयास एक भिन्न दृष्टि का निर्माण करता है, जो आकांक्षापूर्ण तो प्रतीत होती है, लेकिन क्रियान्वयन में सुसंगतता का अभाव भी प्रकट करता है। यह काव्यात्मक अभिव्यक्ति वादे निभाने सरीखी भावना को उद्घाटित करती है, अन्यथा शिक्षक और अभिभावक इसकी विफलता के लिए इसे ही जिम्मेदार ठहराएंगे, क्योंकि नीति अमूक है वह अपना हाल कैसे बयां करेगी। इसलिए, राष्ट्रीय शिक्षा नीति की पाँचवीं वर्षगांठ केवल उत्सव या आत्म-प्रशंसा का क्षण नहीं है; यह इस बात का आकलन करने के लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ भी है कि क्या नीति वास्तव में शिक्षा के लोकतंत्रीकरण की ओर बढ़ रही है या अनजाने में मौजूदा दरारों को और चौड़ा कर रही है। देरी से पहले इसके मूल्यांकन और समुचित समाधानों की अत्यंत आवश्यकता है।
इसके काव्यात्मक वादों को अब जाति, वर्ग, क्षेत्रीय और लैंगिक असमानताओं की नीरस वास्तविकताओं से जूझना होगा। समानता, न्याय और सार्वजनिक निवेश के प्रति ईमानदार प्रतिबद्धता के बिना, यह नीति एक ओर, नौकरशाही कलाकृति बनने का जोखिम उठाती दिखाई देती है। वहीं दूसरी ओर, किसी भी नीति की ताकत केवल उसकी दूरदर्शी अभिव्यक्ति में ही निहित नहीं होती, बल्कि इसके इरादे को समावेशी और न्यायसंगत संरचनाओं में परिवर्तित करने की क्षमता का होना भी उतना ही जरूरी है। नीति वही सही है जो सामाजिक विविधता के सभी क्षेत्रों में सुलभ हो और क्रियान्वित किए जाने में सरल हो। तभी उसके सकारात्मक परिणाम भी दिखाई देते हैं। स्कूल कॉलेजों में कम नामांकन और दाखिले लेने दर में आई कमी निराशा की ओर संकेत करती है। लोगों में ज्ञान का दीप जलाने की ललक पैदा दिखाई नहीं दे रही है। इस पर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है और इसे रोजगारपरक बनाया जाना बेहद जरूरी है। अन्यथा स्टडी वीजा के नाम पर हमारा धन और ब्रेन, ड्रेन होता रहेगा। देश की तरक्की के लिए इन दोनों को रोका जान बेहद जरूरी है।
– *डॉ. मनोज कुमार*
– *लेखक- जिला सूचना एवं जनसंपर्क अधिकारी हैं।
