पंकज सीबी मिश्रा / राजनीतिक विश्लेषक एवं पत्रकार जौनपुर यूपी
यह सितंबर माह शिक्षक दिवस के लिए जाना जाता है। किन्तु वर्तमान शिक्षा व्यवस्था का जो हाल है वह बेहद दयनीय और चिंताजनक है। पहले तो उन सभी शिक्षकों के प्रति आभार प्रकट करता हूँ जो आज भी स्वयं सरकारी मास्टर है, अस्सी हजार के ऊपर वेतन ले रहे और उसी पैसे से अपने बच्चे को महंगे निजी स्कूल में पढ़वा रहे। शिक्षक हमारे जीवन में ज्ञान और मार्गदर्शन देकर हमारे भविष्य का निर्माण करते हैं पर आधुनिक शिक्षक गुट चलाते है, जातिवादी मानसिकता की ओर झुके है और पढ़ाने से दूर भागते है । शिक्षक और छात्र में एक अद्वितीय संबंध होता है। शिक्षक हमारे जीवन में केवल शैक्षिक ज्ञान ही नहीं देते, बल्कि वे हमें नैतिकता, अनुशासन और समाज में सही ढंग से जीने की कला भी सिखाते हैं। शिक्षक केवल पढ़ाने का कार्य नहीं करते हैं, बल्कि वे समाज में बदलाव लाने वाले महत्वपूर्ण व्यक्तित्व होते हैं। भारत में शिक्षक दिवस प्रतिवर्ष 5 सितंबर को मनाया जाता है, जो डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन की जयंती का दिन है। शिक्षा के प्रति उनका समर्पण के कारण यह दिवस उनके जन्मदिवस पर मनाया जाता है। डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन एक महान शिक्षाविद, दार्शनिक और भारत के दूसरे राष्ट्रपति थे।
येषां न विद्या न तपो न दानम्,
ज्ञानम् न शीलं न गुणो न धर्मः।
ते मर्त्यलोके भुवि भारभूता।
मनुष्यरूपेण मृगाश्चरन्ति॥”
अर्थात् जिसके पास विद्या, तप, दान, ज्ञान, चरित्र जैसे गुण और धर्म नहीं हैं, वह पृथ्वी पर भार स्वरूप है और मनुष्य के रूप में पशु की भाँति विचरण करता है। शिक्षा में मूल्यों की आवश्यकता के इतने स्पष्ट दृष्टिकोण के पश्चात् भी वर्तमान शिक्षा प्रणाली में मूल्यगत शिक्षा की आवश्यकता नहीं समझी जा रही है। वह शिक्षा, जो आत्म–विकास एवं जीवन और समाज में सन्तुलन बनाए रखने में उपयोगी है, उसे ही पाठ्यक्रम में सम्मिलित नहीं किया गया है।मध्यम और निम्न मध्यम वर्ग के परिवारों की लाचारी मन को द्रवित कर देती है। 2-3 संतानों को पढ़ाना, दो समय की रोटी की व्यवस्था में लगे माता-पिता के लिए बहुत बड़ी चुनौती है, एक बच्चे की फीस लाखों में कहाँ से लाये । प्रतिस्पर्धा की दौड़ में शैक्षिक गुणवत्ता की चर्चा व्यर्थ है। जिस गति से फीस में बढ़ोतरी हुई है, उससे अधिक गति से शैक्षिक बेरोजगारी बढ़ी है। शिक्षा के गिरते मूल्यगत स्तर से यहाँ एक आशय यह भी है कि आज हमारी शिक्षा केवल सैद्धान्तिक है, व्यावहारिक नहीं। आज शिक्षा एक छात्र को केवल डिग्री प्रदान करती है, उसे सम्मानजनक रूप से आजीविका कमाने के लिए उसका कोई मार्गदर्शन नहीं करती है। अर्थात् उसके लिए उसकी शिक्षा का कोई मूल्य नहीं होता। शिक्षा के इसी मूल्यगत स्तर के कारण आज देश में बेरोजगारी और अपराधों को प्रवृत्ति दिनोंदिन बढ़ती जा रही है। शिक्षा के गिरते स्तर के लिए न सिर्फ़ शिक्षक ज़िम्मेदार हैं, न सिर्फ़ विद्यार्थी ज़िम्मेदार हैं, न सिर्फ़ समाज ज़िम्मेदार है, न सिर्फ़ शिक्षा पद्धति ज़िम्मेदार है और न सिर्फ़ सरकारें ज़िम्मेदार हैं, बल्कि ये सब इसके लिए ज़िम्मेदार हैं। और इनके अलावा मोबाइल, नशा, अपराध, क़ानून व्यवस्था, ख़ासतौर पर शिक्षा के लिए बनी क़ानून व्यवस्था भी ज़िम्मेदार हैं। लेकिन फिर भी अगर यह तय किया जाए कि शिक्षा के गिरते स्तर के लिए सबसे बड़ा ज़िम्मेदार कौन है? तो इसमें पाँच बड़े ज़िम्मेदार नज़र आएँगे। पहले नंबर पर सरकारें, दूसरे नंबर पर शिक्षा व्यवस्था और शिक्षा के लिए बना क़ानून, तीसरे नंबर पर शिक्षक, चौथे नंबर पर पैरेंट्स आते है और पांचवे नंबर पर निजी स्कूल। शिक्षा में गिरते मूल्यगत स्तर के दुष्परिणाम–शिक्षा में गिरते मूल्यगत स्तर के दुष्परिणाम आज समाज में चहुँ ओर देखे जा रहे हैं। देशभर में फैले भ्रष्टाचार, लूटमार, आगजनी, राहजनी, बलात्कार एवं अन्य अपराध गिरते मूल्यगत स्तर के ही परिणाम हैं। वर्तमान में जीवन–मूल्यों की बात करनेवाले उपहास का पात्र बनते हैं। हमारी वर्तमान पीढ़ी शिक्षित होते हुए भी जिस अनैतिक मार्ग पर बढ़ रही है, उसे देखते हुए भावी पीढ़ियों के स्वरूप की कल्पना हम सहज ही कर सकते हैं। शिक्षा का स्तर गिरने की एक वजह यह भी है कि जो अच्छे-अच्छे बच्चे होते हैं निजी स्कूलों में चले जाते हैं। जिन बच्चों के माता-पिता निजी स्कूलों में नहीं पढ़ा पाते वे बच्चे सरकारी स्कूलों में प्रवेश ले लेते हैं। जो बच्चे निजी स्कूलों में नहीं चल पाते हैं उनके माता-पिता भी उनको सरकारी स्कूल में दाखिल करवा देते हैं। सरकारी स्कूलों में पढ़ाई के अतिरिक्त दूसरे जितने कार्य होते हैं उतने शायद निजी स्कूलों में नहीं होते। चुनावों की चिंता उनको नहीं है। वोट बनाना, छात्रवृत्ति का कार्य, दोपहर का भोजन, जनगणना, अन्य गतिविधियां, उनकी तैयारी करवाना, फोटो खींचना, अपलोड करना, जिस कार्य के प्रभारी हैं उसकी सारी जिम्मेदारी निभाना। जबकि निजी स्कूलों में अध्यापकों का फोकस सिर्फ पढ़ाई पर ही होता है। सरकारी स्कूलों में अध्यापकों की कभी पांच दिन की ट्रेनिंग, कभी दस दिन की ट्रेनिंग शिक्षा का स्तर तो गिरेगा ही। और भी बहुत सी खामियां हैं जिनके कारण शिक्षा के स्तर व बच्चों की संख्या में कमी होती जा रही है। जिसकी वजह उचित सुविधाओं का न होना भी है। मेरा मानना है कि सरकार को अब चाहिए कि वह सरकारी स्कूलों के पढ़े बच्चों को ही सरकारी नौकरी दे, निजी स्कूल के बच्चे अब निजी और प्राइवेट सेक्टर के जॉब ढूढ़े तब यह न्याय होगा।
