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हालात की सौग़ात : आरती परीख

बिमल खिड़की के पास बैठा बाहर झाँक रहा था। हवा धीरे-धीरे परदों से खेल रही थी। आसमान पर बिखरे बादल धूप को ढक रहे थे, जैसे कोई अनकही चुप्पी घर पर फैल गई हो। लेकिन बिमल का मन इस चुप्पी से ज़्यादा भारी था— कल रात से भीतर उमड़ा तूफ़ान अब भी थमा नहीं था।

कल रात पत्नी आरती से उसका झगड़ा हुआ था। बात छोटी सी थी— बेटियों के विवाह को लेकर। आरती चाहती थी कि, ज़माने के साथ कदम मिलाकर बेटियां ख़ुद अपनी पसंद का लड़का ढूँढे और दूसरी तरफ़ बिमल को लगता था की उनके समाज में यह ठीक नहीं रहेगा। बातों-बातों में स्वर ऊँचे हुए, तकरार बढ़ी और फिर आरोप-प्रत्यारोप की चिंगारी ने आग का रूप ले लिया। देर रात तक दोनों सो नहीं पाए। और सुबह… वही ठंडापन, वही दूरी।

बिमल अक्सर ऐसा ही करता— जब भी कोई बात बिगड़ती, वह उसे सुधारने की पूरी कोशिश करता। शब्दों से, तर्क से, बहस से। वह सोचता कि, अगर वह बात समझा देगा, सब कुछ सुलझ जाएगा। लेकिन हर बार उलझन और गहरी हो जाती।

आज सुबह भी उसने सोचा कि, वह आरती  को दोबारा समझाएगा। लेकिन आज वो कुछ बोलना शुरू करे उससे पहले उसे अपने बाबा की आवाज़ याद आ गई..

*“बिगड़ी बात को हालात मान लो बेटा, नहीं तो दिमाग बिगड़ जाएगा।”*

ये शब्द उसके भीतर गूँज गए। बाबा कहा करते थे कि —  *हर गाँठ खोलने लायक़ नहीं होती। कुछ गाँठें समय के साथ ढीली होती हैं, और कुछ वैसे ही रह जाती हैं। उन्हें जबरदस्ती खोलो तो धागा ही टूट जाता है।*

बिमल ने गहरी साँस ली।

“क्या वाक़ई हर उलझन सुलझाना ज़रूरी है?” उसने सोचा।

“या कभी-कभी चुप रहना, मान लेना ही असली समाधान है?”

उसके सामने कल की रात का दृश्य कौंध गया। आरती की आँखों में ग़ुस्से से ज़्यादा थकान थी। शायद वह भी चाहती थी कि बहस ख़त्म हो, लेकिन बिमल ने उसे बढ़ा दिया।

उसे याद आया, कई बार ज़िंदगी में ऐसा हुआ है कि — ऑफिस में, दोस्तों के बीच, यहाँ तक कि बच्चों के साथ भी। जब वह हर तर्क को जीतना चाहता था, तो रिश्ते हार जाते थे।

खिड़की से बाहर देखते हुए बिमल ने सोचा,

*“कभी-कभी ठहराव भी मंज़िल होता है। हर रास्ता चलना ज़रूरी नहीं होता।”*

वह धीरे-धीरे उठकर रसोई की ओर बढ़ा। आरती चाय बना रही थी। उसके चेहरे पर वही चुप्पी, वही दूरी थी। बिमल ने बिना कुछ कहे, उसके हाथ से कप ले लिया। आरती ने हल्की-सी नज़र उठाई— और फिर उसकी आँखों में एक अजीब-सी कोमलता उतर आई।

उस क्षण बिमल को लगा, जैसे सारी कड़वाहट चाय की भाप में उड़ गई हो।

*कभी-कभी शब्द बोझ बन जाते हैं, और ख़ामोशी ही सबसे गहरी भाषा होती है।*

चाय की चुस्कियों के बीच बिमल अपने अतीत में लौट गया। उसे याद आया— बाबा का वह वाक्य बचपन से जो सुनता आया है।

एक बार स्कूल में उसका प्रोजेक्ट बिगड़ गया था। वह रो रहा था, काग़ज़ फट गए थे। बाबा ने समझाया था—

*“बेटा, हर बिगड़ी चीज़ को ठीक करना ज़रूरी नहीं। कभी-कभी उसे वैसे ही छोड़ देना ही बेहतर होता है। नया पन्ना लो, फिर से लिखना शुरू करो।”*

तब वह नहीं समझ पाया था। उसे लगता था कि हर ग़लती सुधारनी चाहिए। लेकिन उम्र के साथ उसने देखा — *कुछ रिश्ते अधूरे रहकर भी खूबसूरत होते हैं। कुछ बातें हवा में छोड़ देने से ही शांति आती है। और कुछ घाव दवा से नहीं, वक़्त की चुप्पी से भरते हैं।*

आज वही सीख आरती के साथ सामने थी। क्या सचमुच बेटियों को अपनी पसंद का जीवनसाथी ख़ुद ढूँढने की आज़ादी देनी चाहिए? आपसी समझ और भरोसे के साथ बच्चों को मार्गदर्शन देते हुए समाज़ में बदलाव लाने की कोशिश करनी चाहिए?

दिन ढलने लगा। बिमल ने तय किया कि वह अब बार-बार वही बहस नहीं छेड़ेगा।

उसने बेटियों को बुलाया और पूछा—

“तुझे क्या पसंद है?”

बेटियों ने झिझकते हुए कहा—

“पापा, फ़िलहाल तो अपनी करियर की ओर ध्यान देना है। इस दौरान अगर कोई लड़का पसंद आता है तो क्या आप उसे मिलना चाहेंगे?”

बिमल ने पहली बार महसूस किया कि आरती सही कहती है – “अपनी बेटियां दूसरों के मुक़ाबले बहुत समझदार हैं।वो कोई ग़लत कदम नहीं उठाएगी।”

उसने बेटियों के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा— “ठीक है, अगर कोई लड़का पसंद आता है तो सबसे पहले मुझे बताना, मैं तुम्हारे साथ हूँ।”

आरती ने यह सुना तो उसकी आँखों में नमी उतर आई। वह कुछ कह नहीं पाई, लेकिन बिमल समझ गया— यही ख़ामोशी उसका सबसे बड़ा उत्तर है।

रात को दोनों बालकनी में बैठे थे। हवा हल्की थी, आसमान में सितारे टिमटिमा रहे थे। बिमल ने धीरे से कहा—

“जानती हो, मैं सोचता था कि हर बात सुधारना ज़रूरी है। लेकिन आज समझ आया कि, *हालात को समझना ज़्यादा ज़रूरी है। कभी-कभी उन्हें वैसे ही मान लेना ही असली जीत है।”*

आरती मुस्कराई—

“बुड्ढे हुए तब जाकर तुम्हें बाबा की बात समझ आई।”

बिमल हँस पड़ा, “बुढ्ढा होगा तेरा बाप। हाँ… *बिगड़ी बात को हालात मान लीजिए, वरना दिमाग बिगड़ जाएगा।”*

दोनों की हँसी रात की ख़ामोशी में घुल गई।

— आरती परीख

खोबर, सऊदी अरब

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