राजनीतिक सफरनामा
आइये हम अपनी स्वतंत्रता की एक और वर्षगांठ गर्वोन्मुख मस्तक के साथ मनाएं । हमारा राष्ट, हमारा ध्वज और हमारा राष्टगान हमारी धरोहर है और हर भारतीय इस पर गर्व करता है । ‘‘जनगण मन अधिनायक’’ की मधुर स्वरलहरियां हमारे तन और मन में जोश भर रहीं हैं । हम नतमस्तक हैं अपने तिरंगे के सामने और हवा में शान से लहराता तिरंगा हमें हमारे ‘विश्व गुरू’’ हो जाने का संकेत दे भी रहा है । 78 साल आजादी के, अंग्रेजों की गुलामी से मुक्ति के, नापाक इरादा रखने वालों पर प्राप्त विजय के । अमृत तुल्य तो है यह । हम आजाद हैं और गर्वोन्मुक्त हैं । चेहरे पर दमक, मन में उत्साह और ओंठों से निकलते देशभक्ति गीत । आईये हम अपने प्यारे भारत देश की स्वतंत्रता की 78 वीं वर्षगांठ मना लें । ‘‘जनगणमन अधिनायक जय है’’ के गूंजते स्वर और ‘‘सुजलां सुफलां शस्य श्यामला मातरम्’’ की अनुगूंज के बीच हम हाथ उठाकर सलामी दें अपने राष्ट्रीय ध्वज को । ‘‘लहर-लहर लहराये तिरंगा’’ को देख लें नजर भर कर । यही तो हमारी आन,बान और शान का प्रतीक है । देशभक्ति कब किसी को सिखाई जाती है वह तो हमारे खून में स्वतः परिलक्षित होती है । हम गाते हैं तो सीना अपने आप फूल जाता है और आखों के सामने अपनी भारत माता की तस्वीर उभर आती है । कानों में सुनाई देने लगते हैं स्वतत्रंता संग्राम सेनानियों के द्वारा गाए वो गीत जो उनमें भर देता था उत्साह और वे अपना घर-द्वार छोड़कर कूद पड़ते थे आन्दोलनों में ताकि अंग्रेजों को कहा जा सके ‘देख लो हमारी ताकत…तुम एक को मारोगे तो हम हजार आगे आ जायेगें’’ । सेनानियों की कमी नहीं थी, उनके पास जज्बातों की कमी नहीं थी । पत्नी अपने पति को रोकती नहीं थी, मॉ अपने बेटे को आंचल का वास्ता देकर उनके बढ़े हुए कदमों पर अवरोध नहीं डालती थी और पिता तो गर्व से सीना चौड़कर विदा करता था अपने बेटे को ताकि वह भी भारत की स्वतंत्रता के आन्दोलनों का हिस्सा बन सके । लाशों के ढेर लग जाते थे पर चेहरे की दमक कम नहीं होती थी । अंग्रेज सरकार गोलियों के तूफान से भी नहीं रोक पाते थे इनके कदम । सीने में गोली खाया सैनिक ‘‘वंदेमारम्’’ बोलते हुए तज देता था अपना नश्वर शरीर । खून से लथ-पथ इनके निर्जीव शरीर पर दहाड़ मारकर कोई नहीं रोता था बल्कि गर्व से सम्मान के साथ सजा दी जाती थी अर्थी । जाने कितने ऐसे भी लोग रहे हैं जिन्हें तो अर्थी भी नहीं मिली और चिता भी । परिवार के लोग उनके अंतिम दर्शन तक नहीं कर पाए । अंग्रेजों द्वारा हमारे स्वतत्रंता संग्राम सेनानियों को दी गई क्रूर यातनाओं के किस्से आज भी रोंगटे खड़े कर देते हैं । ओह कितना भंयानक मंजर होगा तब, हम तो कहानियों में ही सुनते हैं यह सब और किवदंती के रूप में याद कर लेते हैं उस मंजर को । इस जज्बात ने ही तो हमें आजादी दिला दी । हम आजाद हो गये । पन्द्रह अगस्त 1947 का सूर्य हमारे लिए नई आशाभरी किरणों के साथ उदित हुआ । इस आजाद भारत में हमने बहुत सारे स्वप्न बुने और अपना सफर तय करना प्रारंभ किया । हम याद कर लेते हैं उन वीर शहीदों की जिनके बलिदान ने हमें पराधीनता के वातावरण से मुक्त कर स्वतंत्रता का वातावरण प्रदान किया । लाखों, हजारों, सैंकड़ों बलिदानियों के संकल्प को कोई भी भारतवासी विस्मृत कर भी कैसे सकता है । सर पर कफन बांधकर सीना चौड़ा कर ‘‘शायद ही घर लौट पाऊं’’ के भावों को अंगीकार कर निकलने वाले पराधीन भारत के युवाओं के सपनों का भारत । अपने पिता, अपने बेटा और अपने पति को माथे पर तिलक लगाकर इस भयावह मार्ग पर भेजने वाली इस देश की महान महिलाओं के सपनों का भारत । देश के लगभग हर घर से निकलने वाले क्रांतिकारियों का समूह अंग्रेजों के अत्याचार को सहन करते हुए ‘‘वंदे मातरम्’’ को गाते हुए ‘‘जननी जन्म भूमि स्वर्ग से महान है’’ को आत्मसात कर मुस्कुराते हुए चिढ़ाते थे अंग्रेज हुकुमत को ‘‘तुम्हारे कोड़े, तुम्हारी बंदूकें, तुम्हारी क्रूरता’’ हमें विचलित नहीं कर सकती । महिलायें सिर पीटकर रोती नहीं थीं अपनों का शव देखकर बल्कि वे गर्व और अभिमान से मुस्कुरा पड़ती थीं ‘‘काश और बेटे होते हमारे वे भी इस महान युद्ध के साक्षी बन जाते’’ के मनोभावों के साथ आदर करतीं थीं, सलामी देती थीं अपने परिजनों के रक्तरंजित शवों को । यही तो हमारी संस्कृति है, यही तो हमारे संस्कार हैं, यही तो हमारी परंपरा है ‘‘देश के लिए न्यौछावर हो जाना’’ । जेलों में बंद, भूखे-प्यासे अत्याचार झेलते इन स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों को तो पता भी नहीं था कि हम कब आजाद होंगे हम, पर वे इतना महसूस अवश्य करते थे कि उनका बलिदान कभी व्यर्थ नहीं जायेगा और हमारे प्यारे देश को एक न एक दिन अंग्रेजी शासन से मुक्ति अवश्य मिलेगी । इतिहास के पन्ने गवाह हैं अंग्रेजों की चालाकी और क्रूरता के, इतिहास के पन्ने गवाह हैं कि इस कू्ररता के आगे समर्पण न करने वाले हमारे बलिदानियों की मुस्कान के । आजादी के गीत गाते-गाते फांसी के फंदे पर झूल जाने वाले क्रांतिकारियों के हौंसलों के । इतिहास के पन्ने बदले नहीं जा सकते, जो गुजर कर अतीत बन गया है उसे झुठलाया नहीं जा सकता और न ही आज विशलेषित किया जा सकता कि ऐसा क्यों किया गया याकि ऐसा किया जाता तो बेहतर होता । उस समय की परिस्थितियां आज हमारी कल्पनाओं से भी अधिक भयावह थीं, रोंगटे खड़े कर देने वाली कहावत की जीवंत तस्वीर थीं । देश 1947 को स्वतंत्र हुआ और इसका एक संविधान बनाया गया जिसे प्रेमबिहारी नारायण रायजादा सक्सेना ने अपनी डेस्क पर छैः महिने तक 395 अनच्छेद, 8 अनुसूचियां और अंग्रेजी हिन्दी दोनों में एक प्रस्तावना हस्तलिखित की । जिसकी तीन प्रतियां बनाई गई थी । इन दस्तावेजों में संरक्षित इतिहास हमारा जिसे नई पीढ़ी को बताया जाना चाहिए । हम तो हर वर्ष मनाते हैं अपनी आजादी का उत्सव, हम गाते हें गीत अपनी आजादी की बलिवेदी पर शहीद हो चुके महान स्वतंत्रता संग्रामा सेनानियों के ताकि हम महसूस करते रहें कि आजादी बहुत रहलता से, बहुत सहजता से हमें नहीं मिल गई है । जाने कितने बलिदानों की शौर्य गाथायें जुड़ी हैं इस आजादी के संग्राम में, जाने कितनी बेटियों के सुहाग उजड़े हैं और जाने कितनी माताओं की गोद सूनी हुई है । वे सीना तानकर खड़े हो जाते थे अंग्रेजी फौज के सामने और जोर से नारा लगाते थे ‘‘वंदे मातरम्’’ । यह जोश था उनमें जिनको मालूम ही नहीं था कि हम मुक्त होगें इस दासता से पर इतना भरोसा अवश्य था कि उनका बलिदान व्यर्थ नहीं जाएगा । रोते-बिलखते बच्चे और सिर पर कफन बांधे आजादी के दीवाने । इस गाथा को तो हमेशा याद रखना होगा और नत्रई पीढ़ी को भी तो बताना होगा । तो क्या अब समय नहीं आ गया है कि हम आजादी का उत्सव मनाते हुए इस नए भारत की नींव को भी मजबूत करते चलें । कौन करेगा, हमारी नई पीढ़ी जिसके कांधों पर है भविष्य देश का । इस नई पीढ़ी के कांधों को मजबूत बनाना होगा, फौलादी बनाना होगा । इस कारण से ही तो हम सुनाते हैं अपने वीर शहीदों की गाथा ताकि उनकी भी भुजाऐं फड़क जाएं । हमारी नई पीढ़ी को देश के इतिहास, हमारी संस्कृति और मूल्यों को सबताना होगा ताकि वे अपने मूल से जुढ़ सकें । आज भारत इस बात को महसूस कर रहा है कि हमारी संस्कृति हमारी परंपराएं पाश्चात्य संस्कृति का पहनावा ओढ़ने लगी हें । यह वह संस्कृति है जिसने हमारी युवा पीढ़ी को अपने जाल में उलझा रखा है । आजादी का मतलब स्वच्छंदता नहीं होता इस बात को समझाना बहुत आवश्यक है । अंग्रेजों की दस्तां की लम्बी कहानी है और इस दासता के अन्याय, अत्याचार, हैवानियत की खौफनाक कहानियां हें जो रोगटे भर देती हें । हमें युवा पीढ़ी तक इस कहानियों को पहुंचाना आवश्यक है
। युवा पीढ़ी को मानसिक और शारीरिक रूप् से तैयार करना होगा । ऑपरेशन सिंदूर की गाथा भी उन्हें पढ़ाना होगी ताकि वे महससू कर सकें कि भारत विश्व गुरू बन चुका है, न तो हमारे जाबांज सैनिक और न ही कोई भारतीय भी श्रातीय देश की ओर गलत इरादे से उठने वाली ताकितों के सामने समर्पण करता है और न ही पराजित होता है । हमने कारगिल में भी दुश्मनों को पस्त किया था और अब एक बार फिर आफपरेश््रान सिंदूर के माध्यम से पाकिस्तान के घर के अंदर घुसकर उसे पराजित किया है । हमारी सेना सम्पूर्ण विश्व में पराक्रमी सेना के नाम से पहचानी जाती है । हमारा कोई भी सैनिक सौ सैनिकों के बराबर ताकत रखता है । हम 15 अगस्त को अपने महान ध्वज को नीचे से रस्सी द्वारा खींचकर उपर ले जाते हैं फिर खोलकर फहराते हैं इसे ही तो ध्वजारोहण कहा जाता है । 15 अगस्त 1947 का वह ऐतिहासिक दिन को सम्मान देने के लिए किया जाता है । जबकि गणतंत्र दिवस पर घ्वज को उपर ही बांधा जाता है जिसे खोलकर फहरा जाता है इसे झंड़ा फहराना कहा जाता है । घ्वज फहराने के इस अंतर को भी समझाना चाहिए अमूमन इस पर गल्तियां होती हें । राष्टीय पर्व भले ही कए दिवस को हो पर हमारी नसों में दौड़ने वाला रक्त हर दिन राष्टभक्ति की भावना से ओतप्रोत होता रहता है । आइये हम अपने तरंगे को सलाम करें, आईये हम राष्टवंदना करें और हर एक भारतवासी एक दूसरे के गले लगकर कहे ‘‘स्वतंत्रता दिवस अमर रहे’’ ।
