पंकज सीबी मिश्रा / राजनीतिक विश्लेषक़ एवं पत्रकार जौनपुर, यूपी
रामचरित मानस में बाबा तुलसीदास कहते है कि पूजहि विप्र सकल गुण हीना । शुद्र न पूजहु वेद प्रवीणा ।। औऱ वही मनु स्मृति कहती है कि-
अष्टापाद्यं तु शूद्रस्य स्तेये भवति किल्बिषम्।
षोडशैव तु वैश्यस्य द्वात्रिंशत्क्षत्रियस्य च॥
ब्राह्मणस्य चतुःषष्टिः पूर्णं वापि शतं भवेत्।
द्विगुणा वा चतुःषष्टिस्तद्दोषगुणविद्धि सः॥ (अध्याय 8, श्लोक संख्या 337/338) अगर शुद्र चोरी करे तो उसको अर्थदंड का 8 गुना लेकिन अगर ब्राह्मण चोरी करता है तो उसे 100 गुना दंड दिया जाए। मनु स्मृति ने ब्राह्मणों को मांस खाने से भी मना किया। जीव हत्या पाप है। मांस खाने वालों को पता होगा कि उनको चाहे जितना अच्छा खाना दे दो अगर मांस नहीं खाया तो उनकी दावत ही पूरी नहीं होती लेकिन सोचो ब्राह्मण कितने साल तक अपनी जिहवा पर नियंत्रण रख, वाह्य भोजन त्याग स्वाद मारकर आचार विचार से रहे । देश, समाज औऱ संस्कृति को इन्हीं देव तुल्य ब्राह्मणो नें बचाया। ब्राह्मणों ने ही देश को भाषा दिया। ब्राह्मणों ने ही गणित को शून्य दिया। ब्राह्मणों ने ही हिसाब को दशमलव दिया। ब्राह्मणों ने ही ब्रह्माण्ड को खगोल शास्त्र दिया। ब्राह्मणों ने ही देववाणी को व्याकरण दिया। ब्राह्मणों ने ही चिकित्सा को आयुर्वेद दिया। ब्राह्मणों नें ही मेडिकल साइंस में सबसे पहले सर्जरी की। खुद आश्रम में रहे कोई धन संचय नहीं किया। अपने लिए भीक्षाटन का प्रावधान किया किन्तु मौर्यवंशी को सम्राट बनवा दिया। ब्राह्मणों ने संस्कृति दी जिसके कारण आज असम से लेकर केरल तक हम लोगों की एक जैसी मान्यताएं हैं। सभी तिलक लगाते है। सभी आरती करते है। आदि से अन्त तक औऱ अन्त से आदिकाल तक ना जाने कितने कारण है जिससे देश एक है नहीं तो देश पता नहीं कब तक टूट गया होता। फिर किसी राजनैतिक दल को ब्राह्मणों से इतनी नफरत क्यो ? कहा गया है –
बिप्र धेनु सुर संत हित लीन्ह मनुज अवतार!
निज इच्छा निर्मित तनु माया गुन गो पार!!
अगर ब्राह्मण जातिवादी होता तो उसका पूज्य राम नहीं रावण होता । ब्राह्मण यदि धन लोलुप होता तो महाराज बलि इतना बड़ा दानवीर नहीं कहलाते। पहचान छुपा कर किया गया सत्कर्म पाप से भी ज्यादा पापमय होता है। प्रभुत्ववादी औऱ वर्चस्ववादी नहीं है हम ब्राह्मण , हमें अन्याय औऱ दुर्भाव देखने की आदत नहीं इसलिए हम सर्व समाज के लिए चिंतित रहते है। उत्तर प्रदेश के कम से कम दो दर्जन कथावाचकों को जानता हूँ जो ब्राह्मण नहीं हैं। ये सारे कथावाचक अच्छे खासे प्रसिद्ध हैं, इनकी कथा में भीड़ भी होती है और इन्हें खूब सम्मान भी मिलता रहा है। चलिये कुछ नाम बता देते हैं- आचार्या मनोरमा सिंह यादव शास्त्री! ये श्रीमद्भागवतमहापुराण की कथा कहती हैं, रामकथा कहती हैं। उत्तर प्रदेश ही नहीं, देश विदेश में भी कथा कहती रही हैं। आयु कम ही है, पर इनको सुनने वालों, पसन्द करने वालों की बहुत बड़ी संख्या है। यूट्यूब पर लाखों सब्सक्राइबर हैं, वीडियोज पर मिलियन व्यू भी आते हैं। एक रील किंग हेमराज यादव हैं। आप सब ने कभी कभी उनका कोई वायरल रील जरूर ही देखा होगा। कथा के बीच में कपिल शर्मा टाइप कॉमेडी भी करते हैं। उनकी कथा के वीडियो भी मिलियन्स व्यू पाते हैं। इनकी कथा में भी भरपूर भीड़ भी होती है। एक बिरहा गायिका नीलम यादव शास्त्री हैं। उनकी कथा, उनके भजन खूब सुने जा रहे हैं। उनकी कथा में स्त्रियों की खूब भीड़ होती है। और भी अनेक नाम हैं, जो कथा प्रवचन करते हैं। उनके भक्तों श्रोताओं की बहुत बड़ी संख्या है। गीताप्रेस से छपने वाली रामचरितमानस जिन हनुमान प्रसाद पोद्दार जी की टीका के साथ छपती है, वे भी जाति से गैर ब्राह्मण थे। आज संसार में सबसे अधिक उन्ही की ब्याख्या पढ़ी जाती है। कथा कहने वाले भी वही पोथी लेकर जाते हैं। कथा कहने को लेकर भारतीय समाज में यह धारणा कभी नहीं रही कि गैर ब्राह्मण कथा नहीं कह सकता। पहले भी गैर ब्राह्मण कथा कहते, गाते रहे हैं और आज भी कहते हैं उदाहरण आसाराम, अड़गढ़ानन्द महाराज, राम रहीम, जय गुरदेव, साध्वी प्रज्ञा, साक्षी महाराज इत्यादि । ग्रामीण क्षेत्र में, जहाँ के लोगों पर अधिक ब्राह्मणवादी होने का आरोप थोपा जाता है, वहाँ के दो तिहाई मंदिरों के पुजारी, साधू गैर ब्राह्मण हैं। एक सच तो यह भी है कि पुरोहित कर्म करने वाले ब्राह्मण लगातार कम होते जा रहे हैं। ग्रामीण क्षेत्र के असंख्य मंदिरों में कोई नियमित पुजारी नहीं है। जहॉं हैं, वहाँ भी सुबह शाम भोग लगाने के लिए आते हैं, शेष समय मन्दिर खाली रहता है। आप ब्राह्मण हों या हरिजन, यदि धर्म में आस्था है, पूजा अर्चना में मन लगता है तो आपको गाँव के आसपास ही किसी मन्दिर में पुजारी का काम मिल सकता है। आपको शुद्ध दो श्लोक भी कंठस्थ न हो, तब भी कोई नहीं रोकता टोकता, बल्कि लोग तो ढूंढ रहे हैं। तो कम से कम नेताओं की राजनीति के कुचक्र में फंस कर ब्राह्मणो को मत कोसिये। यह तो न ही कहिये कि कथा कहने के लिए जाति की बाध्यता है और गैर ब्राह्मणों को कथा कहने से रोका जाता है। डेढ़ सौ करोड़ की जनसंख्या वाले देश में किसी एक असभ्य घटना के कारण पूरी परम्परा को दोषी नहीं ठहराया जा सकता है। बाकी मुकुट मणि अग्निहोत्री के नाम से श्रीमद्भागवत कथा कहने वाले जिस मुकुट मणि जाटव जी महाराज के लिए हल्ला हो रहा है, वे तीन चार साल पहले तक बौद्धकथा कहते थे और हिन्दू संस्कारों और देवी देवताओं के लिए अभद्र बातें कहते फिरते थे। वे बौद्ध हैं भाई साहब! उधर मलाई नहीं मिली तो इधर कूद पड़े थे। गगन यादव जैसा गुंडा मौके के ताक में था इसलिए यादवों को ब्राह्मणों के खिलाफ भड़का गया। बाकी कानून अपने हाथ में लेने वाले जेल पहुँच चुके हैं। कानून अपना काम कर चुका है।
