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लघुकथा: “चार बजे की माँ”

(लेखिका: डॉ. प्रियंका सौरभ)

सुबह के चार बजे थे।

बाहर अभी भी अंधेरा पसरा था, मगर प्रियंका की नींद खुल चुकी थी।

अलार्म बजने से पहले ही उसकी आँखें खुल गई थीं — जैसे उसकी जिम्मेदारियाँ अलार्म से भी पहले जाग जाती हों।

बिस्तर छोड़ते ही ठंडी ज़मीन पर पैर रखते हुए एक ही ख्याल —

“आज कुछ भी छूटे नहीं…”

रसोई में गई। चुपचाप गैस जलाया, दूध चढ़ाया, टिफिन के डिब्बे एक-एक करके निकालने लगी।

किचन की खामोशी में बस स्टील की हल्की खटपट थी, और प्रियंका की साँसों की रफ्तार।

4:30 बजे तक उसने पति की चाय, बेटे का दूध, अपने ऑफिस की फाइलें और कल के झूठे बर्तन — सब सँभाल लिए थे।

लेकिन मन? वो तो अब भी बिखरा हुआ था।

5 बजे नहाकर तैयार हुई। बेटे की यूनिफॉर्म प्रेस की।

हर बार घड़ी की सूइयों को देखती — जैसे वो नहीं, घड़ी उससे भाग रही हो।

5:40 —

बेटे की हलचल शुरू हुई।

थोड़ा करवट, थोड़ी कुनमुनाहट।

प्रियंका की रफ्तार और तेज़ हो गई।

अब सब्ज़ी बनानी थी।

लेकिन तभी —

टप्प… दूध उबलकर गिर गया।

पीछे से एक रोती आवाज़ —

“मम्मा…”

6 बजे तक बच्चा पूरी तरह जाग चुका था, और उसके साथ उसकी माँ के लिए छटपटाहट भी।

प्रियंका भागी कमरे की ओर।

उसे गोद में उठाना चाहा, लेकिन उसी वक्त पति ने कहा —

“तुम बस तैयार हो जाओ, मैं सम्भालता हूँ।”

बेटा बिलखता रहा — “मम्मा… मम्मा… मत जाओ ना…”

वो चुप थी, क्योंकि उसके पास कहने को कुछ नहीं था — सिवाय एक बोझिल मुस्कान के।

जल्दी में दुपट्टा ढूँढा, नहीं मिला।

जो भी कपड़ा सामने आया, पहन लिया।

टिफिन में जल्दी से रोटियाँ रखीं, और सब्ज़ी फिर भूल गई।

पति की गोद में रोता बच्चा…

उसे देखते हुए प्रियंका का दिल फट रहा था।

एक बार फिर मन बोला —

“आज रुक जाऊँ?”

पर जिम्मेदारी ने उसे चुप करा दिया।

6:30 बजे दरवाज़ा खुला।

उसने बेटे की ओर देखा —

माँ की नज़र में आँसू थे, बेटे की आँखों में सवाल।

बिना चूमे, बिना गले लगाए…

बस एक निगाह में वो सब कह गई जो शब्दों में कभी नहीं कहा जा सकता।

गली के मोड़ तक पहुँची —

तभी फिर वही टुकड़ा आवाज़ में चुभा —

“मम्मा…”

वो रुकी।

साँस रुकी।

वक़्त रुका।

लेकिन फिर उसने अपने आँसू पोंछे,

चेहरे पर एक झूठी मुस्कान सजाई,

और खुद से कहा —

“माँ हूँ मैं… टूट नहीं सकती।”

और चल दी —

चार बजे शुरू हुआ उसका दिन,

अब ड्यूटी पर पहुँचने जा रहा था।

हर रोज़ वो माँ चार बजे नहीं, खुद से दो घंटे पहले जागती थी…

ताकि एक दिन उसका बेटा यह कह सके —

“मेरी माँ… दुनिया की सबसे मज़बूत और सबसे प्यारी माँ है।”

प्रियंका सौरभ 

रिसर्च स्कॉलर इन पोलिटिकल साइंस,

कवयित्री, स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार,

उब्बा भवन, आर्यनगर, हिसार (हरियाणा)-127045

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