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श्रीगणेश

           कुन्दन अपने माँ बाप का इकलौता बेटा था । दुबला पतला साँवला सा पर नाक -नक्श सुन्दर था ।उसका मन हमेशा खेल में ही लगा रहता पढ़ाई तो उसे बोझ ही लगती थी । हमेशा अपने पिता से डाँट खाता रहता था पर उसमें जरा भी सुधार नहीं हुआ ।आखिर किसी तरह खींच खाँचकर दसवीं में पहुँच ही गया ।

   “अबकी दसवीं का पेपर है ,बोर्ड से परीक्षा होगी ,जरा मन लगाकर पढ़ ले ।”कुन्दन के पिता जी ने उसे समझाते हुए कहा ।

   “जी पिताजी, आप चिन्ता न करें मैं जरूर पास होकर दिखाऊँगा ।”कुन्दन ने पूरे विश्वास के साथ कहा ।

          यही क्रम प्रायः चलता रहता पिता उसे पढ़ने के लिए प्रेरित करते और वह भी समर्थन में अपना सिर हिला देता था । कुन्दन की माँ भी उसका विशेष ख्याल रखतीं,उसको समयसमय

पर फल ,दूध ,खाना सब कुछ अपने हाथों से खिलातीं । कुन्दन  पिता के सामने तो पढ़ने में लगा रहता पर अपनी माँ के भोलेपन काफायदा

 उठाकर खेलने निकल जाता और रात में पिता के सामने फिर से किताबें उठाकर बैठ जाता ।

  “कुन्दन पढ़ता है ना ठीक से ।”पिता ने पूछा

“हाँ,हाँ दिनभर बैठा पढ़ता ही तो रहता है ।”माँ

ने कुन्दन की कमियों पर पर्दा डालते हुए कहा।

    पिता सन्तुष्ट हो जाते की शायद अब लड़का

समझदार हो गया है । वे प्रायः सभी से कहा

करते थे कि ,“कुन्दन पढ़ लिखकर कछ बन जाये तो उनकी भी जिन्दगी सुधर जाये।कुन्दन के पिता दस बजे रात तक कपड़े की दुकान पर रहते और साढे़ दस या ग्यारह बजे के बाद ही घर पहुँच पाते।फिर खा-पीकर सुबह करीब आठ नौ बजे तक सोते रहते। उसके बाद उठकर नहाकर पूजापाठ करके दुकान पर चले जाते। वे इसी मजबूरी से बच्चों को पूरा समय नहीं दे पाते थे ।

     आखिर परीक्षा का समय आ गया ।पिता ने कुन्दन के लिए परीक्षा में जाने के लिए नयीं ड्रेस तक सिलवायी ।कुन्दनने परीक्षा दी और दो माह बाद रिजल्ट आ गया और जैसी मेहनत वैसा ही फल मिलना था । परीक्षा परिणाम की सूची में उसका कही रोल नम्बर नहीं था अर्थात वह फेल हो गया था । अब वह डर गया, अपने एक दोस्त के यहाँ छिपकर बैठ गया । पिता रिजल्ट देखकर गुस्से से आगबबूला हो उठे और उसके दोस्त का पता करके उसे वहाँ से घर लाये और बेंत से खूब धुनाई की । और जब गुस्सा थोड़ा शान्त हुआ तो उसको समझाकर बगल के कपड़े की दुकान पर काम दिलवा दिया ।

          कुन्दन बेशक पढ़ने में अच्छा नहीं था किंतु

बुद्धि में कोई कमी नहीं थी । उसने कुछ समय में ही इतना अच्छा कार्य किया कि उसके पिता ने उसे एक नयी दुकान खरीद कर दे दी। धीरे-धीरे कुन्दन की दुकान बाजार में सबसे अच्छी चलने लगी। कुछ ही सालों में उसने अपना एक नया मकान भी बना लिया। उसके पिता की खुशी का तो ठिकाना ही न रहा। माँ के भी पहनावे और रहन-सहन में भी अब अन्तर आ गया।अब उसके पिता को उसके कम पढ़े-लिखे होने का कोई मलाल नहीं था। वे सभी से अपने बेटे की तारीफ करते न थकते थे ।और कुछ और सालों बाद जब वह  तेइस चौबीस का हो गया,उसकी शादी भी एक अच्छी, गुणवान और पढ़ी-लिखी लड़की से हो गयी।यह उसके जीवन का सुन्दर श्रीगणेश था ।

डॉ.सरला सिंह, “स्निग्धा” दिल्ली 

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