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यूजीसी के कानून के खिलाफ एकजुटता

राजनीतिक सफरनामा : कुशलेन्द्र श्रीवास्तव
एक ओर बड़ी दुर्घटना ने एक राजनीतिक की जान ले ली । हम जितने यांत्रिक होते जा रहे हैं उतना ही हमारा जीवन असुरक्षित होता जा रहा है । हमने ऐसे ही हादसे में सीडीएस विपिन रावत को भी खोया था और पूर्व मुख्यमंत्री रेड्डी को भी । हादसा अब हमें सबक नहीं दे रहा है, हम खुद ही इसमें उलझते जा रहे हैं । महाराष्ट्र के उप मुख्यमंत्री श्री अजीत पवार को जागने के पहले नहीं मालूम था कि यह उनके जीवन के आखिरी पल हैं,यह सूरज की किरणें उनके लिए आखिरी साबित होने वाली हैं । ढेर सारी संभावनाओं को समेटे, भविष्य की कल्पनाओं को लेकर वे विमान में सवार हुए थे । उन्हें बारामती जाना था और वहां के विभिन्न क्षेत्रों में आमसभा करना था । पंचायत चुनाव जो होने वाले है । नगरीय चुनावों में उनकी पार्टी और उनके गठबंधन ने बेहतरीन विजय हासिल की थी अब ग्रामीण क्षेत्रों में भी वैसी ही विजय प्राप्त करने की उम्मीद लेकर वे विमान में सवार हुए पर गंतव्य तक नहीं पहुंच पाए । बहुत दुखद…… महाराष्ट्र की राजनीति उनकें आसपास ही घूम रही थी । अपने पितातुल्य चाचा शरद पवार से विद्रोह कर उन्होने सत्त की राजनीति चुनी और सफलता पूर्वक इसकी अग्नि परीक्षा को पास भी किया । विगत एक दशक से महाराष्ट्र की राजनीति शरद पवार की बजाए अजीत पवार के इर्दगिर्द घूमती दिखाई देने लगी थी । नगरीय चुनावों के दौरान उनके तेवर कठोर थे । वे अपने ही गठबंधन के खिलाफ भी बोलने से नहीं चूक रहे थे । उनका एक वक्तव्य बहुत चर्चित रहा ‘‘मुझ पर जिन्होने भ्रष्टाचार के आरोप लगाए थे अब वे मेरे साथ उठते-बैठते हैं’’ लगभग ऐसे ही…..जाहिर है कि प्रधानमंत्री जी ने अजीत पवार पर ऐसे आरोप भोपाल की आमसभा में लगाए थे और बाद में उनके साथ सत्ता में सहभागी बने । अजीत पवार के ऐसे वक्तव्यों के कारण ही वे चर्चा में रहे । महाराष्ट्र की राजनीति में उनकी उपस्थिति आम से खास होती चली गई । यूं तो उन्हें शरद पवार का उत्त्राधिकारी माना जाता रहा पर जब उन्होने उनसे ही विद्रोह किया तो उनकी स्वतंत्र दवि सभी के सामने आई जो उनके अंतिम संस्कार में भी दिखी लोगों के आंसू बहे और गहरी सिसकियां भी निकलीं । जमीनी नेता के प्रति जैसा मोह जनता में होता है वैसा मोह अजीत पवार के निधन के बाद दिखाई दिया, यह उनके बढ़ चुके राजनीतिक कद का ही प्रमाण है । अब जब उनके साथ दुर्घटना हुई तो हादसे की जांच की संभावनाओं के चर्चे भी होने लगे । विमान लैडिंग करते समय हादसे का शिकार हुआ । हादसा तो हादसा होता है जो यह कतई नहीं देखता कि हादसे में जान किसकी जा रही है । यूं भी पिछले कुछ महिनों में हमारे देश में लगातार हादसे हो रहे हैं, गुजरात के पूर्व मुख्यमंत्री विजय रूपाणी का निधन भी ऐसे ही विमान हादसे में हुआ था । अजीत पवार के न रहने के बाद महाराष्ट्र की राजनीति की दिशा और दशा क्या होगी चिन्त इस पर भी होने लगा है । महाराष्ट्र में शरद पवार और अीजत पवार की अलग-अलग पार्टियां हैं तो क्या अब दोनों एक हो जायेगीं  ? अजीत पवार वाली पार्टी में अजीत के बाद कौन ? इस प्रश्न पर कभी चिन्तन हुआ ही नहीं क्योंकि किसी को भी ऐसे हादसे की उम्मीद थी ही नहीं । मतलब साफ है कि अजीत के बाद कौन ? इस प्रश्न का उत्तर फिलहाल नहीं है पर संभावानाओं के दृष्टिकोण से ऐसा माना जा सकता है कि शरद पवार उसकी कमान अपने हाथों में ले सकते हैं । यदि ऐसा हुआ तो महाराष्ट्र की राजनीति नए ढंग से संचालित होने लगेगी । शरद पवार अभी महाअघाड़ी के मजबूत स्तंभ हैं जिसमें उद्धव ठाकरे से लेकर कांग्रेस भी सहभागी है  । वैसे तो शरद पवार भी उम्र दारज हो चुके हैं और स्वास्थ्य के हिसाब से भी भागदौड़ कर पाने की स्थिति में नहीं है……फिर…..अब इसी प्रश्न का उत्त्र खोजा जाना है । देश की राजनीति में इस समय शंकराचार्य और यूजीसी के नियम भी हलचल मचाए हैं । यूजीसी जो उच्च शिक्षा संस्थानों की देखभाल करती है उसने एक नया नियम बना दिये जिसने भारत में हलचल मचा दी है । ऐसा कभी पूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह के कार्यकाल में मंडल कमीशन को लेकर भी हल्ल मचा था । यूजीसी का नया नियम छात्र हित की बात करते हुए सर्वणों को कठघरे में खड़ा करने का नियम है ऐसा आरोप लगाया जा रहा है । दरअसल यूजीसी ने एक सर्कुलर जारी कर सभी विश्वविद्यालय और महाविद्यालयों को निर्देशित किया है कि वे जाति आधारित भेदभाव को दूर करने के लिए समता संबंर्धन से संबंधित विनिमय कमेटी  ‘एक समान अवर केन्द्र’ स्थापित करना अनिवार्य है जो भेदभाव से संबंधित शिकायतो का निपटारा करेगा और कालेजों में वंचित समूहों के लिए समावेशन और समर्थन की दिशा में काम करेगा । नियम का उद्देश्य है कि अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और पिछड़ा वर्ग के खिलाफ होने वाले भेदभावों को रोका जाए । तय यह भी किया गया है कि यदि कोई संस्थान नियम का पालन नहीं करता तो यूजीसी उसकी मान्यता को भी रद्द कर सकता है, मतलब साफ है कि हर एक उच्च शिक्षा देने वाले संस्थानों को ऐसी कमेटी का गठन करना ही होगा । विरोध के दो बिन्दु हें एक यह कि यह नियम सवर्ण छात्रों को संभावित अपराधी बता रहा है, क्योंकि अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और पिछड़ा वर्ग के अलावा केवल सामानरू वर्ग ही शेष रह जाता है तो अपराधी तो वह ही होगा ? दूसरे कमेटी और नियम में सर्वण वर्ग को कोई स्थान नहीं दिया गया है । ऐसे में उनका पक्ष कौन रखेगा ? तीसरे भेदभाव सहित अन्य वाक्यों को परिभाषित नहीं किया गया है, मसलन भेदभाव किसे माना जाएगा  ? एक बात तो साफ है की कमेटी के पास सर्वणों की शिकयत जायेगी और उस शिकयत पर विमर्श वह कमेटी करेगी जिसमें सर्वण का कोई प्रतिनिधि नहीं होगा, मतलब शिकायत एक तरफा रह सकती हे और सजा भी एक तरफा हो सकती है । इस एक बिन्दु ने पूरे देश में हलचल मचा दी है । सर्वण वर्ग अब अपने आपको असहाय मानने लगा है सभी उसकी अनदेखी कर रहे हैं ऐसा आरोप अब आम हो चुका है । शायद इस कारण से भी आक्रोश बढ़ता जा रहा है वहीं मानव संसाधन विकास मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान ऐसी किसी संभावनाओं से इंकार करते हुए नियमों को बेहतर बता रहे हैं । धमेंन्द्र प्रधान ने नीट परीक्षा के दौरान हुए पपेर आउट के मामले में भी गोलमोल ही कार्यवाही की थी ऐसा लोग मानते हैं इस कारण से भी वे मंत्री जी के आश्वासन पर एतबार नहीं कर पा रहे हैं । जिस तरह से पूरे देश में आक्रोश बढ़ रहा है वह चिन्तनीय है । सर्वण अपने आपको बेसहारा मानने लगे हैं और यही कराण है कि अब वे एकजुट हो रहे हैं । यदि नियम वापिस नहीं लिए गए तो आन्दोलन बड़ा रूप भी ले सकता है । भारत ने मंडल कमीशन की सिफारशें लागू करने के बाद हुए आन्दोलनों को देखा है…….तो अब कोई नहीं चाहेगा कि भारत की युवा पीढ़ी सड़कों पर उतरे और अपना कीमती समय में बरबाद करे । शंकराचार्य अवमुक्तेश्वरा नंद जी महाराज के साथ प्रयागराज मेले में किए गए व्यवहार ने भी हिन्दुओं को आक्रोशित किया हुआ है । भारत में शंकराचार्य को सनातनियों का सबसे बड़ा दजा्र प्राप्त है उन्हें रूछावतार का दर्जा दिया जाता है, उनका अपना सम्मान भी है । प्रयागराज मेले में जो हुआ वह गलत हुआ । एक अधिकारी द्वारा जस तरह से उनसे उनके शंकराचार्य होने के प्रमाण प्रस्तुत करने को बोला गया वो निंदनीय है । यूं भी साधु-संतों की गरिमा का ध्यान रखा जाना चाहिए फिर वे तो शंकराचार्य हैं ही, उनके नद को और उनके सम्मान को चैलेज करना गलत है । सच यह भी है कि भारत के हही हिन्दु संत दो भागों में बंअ चुके हें, जो गेरूआ वस्त्र पहनकर शंकराचार्य को चुनौती देते दिखाई दे रहे हैं, दूसरे वे संत भी हैं जो ख्ुल कर शंकराचार्य जी का समर्थन कर रहे हैं ।  कुछ बीच की स्थिति में भी हैं जो मौन हैं । सनातनियों के लिए यह भी दुर्भाग्यपूर्ण है । चार पीठ के चार शंकराचार्यों का इतिहास है जो धर्मशास्त्रों में भी उल्लेखित है पर अब तो बहुत सारे शंकराचार्य सामने आ चुके हैं और नई-नई पीठ बनाकर वे शंकराचार्य बने हुए हैं । विडम्बना की बात तो यह है कि ये सभी शंकराचार्य भी एकजुट होकर अवमुक्तेश्वरानंद जी के समर्थन में सामने नहीं आए हैं । शंकराचार्य पीठ को विवादास्वद बनाना भी गलत हे इससे कोई लाभ हासिल नहीं हो सकता पर ज्ञानी साधु संत इससे परे शंकराचार्य के विरोध में समाने आ रहे हैं । दुखद यह भी है कि जिस ढंग से हिन्ुद समाज को एकजुट हो जाना चाहिए था वैसा होता हुआ भी नहीं दिखा । बहरहाल यह विवाद कहां तक जाएगा कहा नहीं जा सकता परंतु जो कुछ हुआ वह दुखद ही हुआ । 

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