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वोटर लिस्ट पर बवाल

राजनीतिक सफरनामा

कुशलेन्द्र श्रीवास्तव

वैसे तो बिहार विधानसभा के होने वाले चुनाव में अभी समय है पर उसको लेकर बिगुल बज चुका है । विपक्ष फिलहाल भाजपा से नहीं चुनाव आयोग से लड़ रहा है और इसमें भाजपा पर भी निशाना साध रहा है । दरअसल चुनाव आयोग ने वोटर लिस्ट का पुनरीक्षण कराने का कार्य प्रारंभ किया है और विपक्ष को लगता है कि चुनाव आयोग इसके बहाने से उनके वोटरों के नाम लिस्ट से अलग कर देगा । विपक्ष की यह आशंका इस बात से भी है कि चुनाव आयोग ने पहली बार वोटरों की पहचान करने के लिए कुछ मापदंड निर्धारित किए हैं याने आप यहां के निवासी हैं पहले इसे सिद्ध करना होगा तब ही किसी का नाम वोटर लिस्ट में जोड़ा जा सकेगा । इसमें मजे की बात यह है कि आधार कार्ड को पहचान के लिए मान्यता नहीं दी गई है । वैसे तो जब से भारत में आधार कार्ड अस्तित्व में आया है तब से ही यह माना जाता रहा है कि आधार कार्ड ही अब आम व्यक्तियों की पहचान है । इस आधार कार्ड को  आम व्यक्तियों के उपयोग में आने वाले हर एक दस्तावेज से जोड़ भी दिया गया है बावजूद इसके चुनाव आयोग ने बिहार में इसे वोटर होने की पहचान करने वाले दस्तावेज में शामिल नहीं किया है । विपक्ष इस कारण से भी चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को संदेह की दृष्टि से देख रहा है । आम मतदाता को अपनी पहचान साबित करने के लिए जो 11 दस्तावेजों में से किसी एक को प्रस्तुत करना है वे कर पाएंगे इसमें विपक्ष को संदेह है इसके कारण ही वे हल्ला मचा रहे हैं । चुनाव आयोग का मानना है कि आम मतदाता उत्साह पूर्वक दस्तावेज जमा कर रहा है फिर विपक्ष बेकार में ही शोर मचा रहा है । इसमें यह भी ध्यान देने वाली बात है कि बिहार के लाखों लोग अन्यत्र रोजगार के लिए चले जाते हैं और लम्बे समय तक बाहर ही रहते हैं ऐसे में वे कैसे सीमित समयावधि में दस्तावेज प्रस्तुत कर अपना नाम वोटर लिस्ट में जुड़वा पायेंगे । इस तर्क के जबाव में चुनाव आयोग ने साफ कर दिया है कि जो लोग लम्बे समय से बाहर रहते हैं और जहां रहते हैं उनको अपना नाम वहां की वोटर लिस्ट में जुड़वा लेना चाहिए । चुनाव आयोग और विपक्ष की यह लड़ाई सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गई और सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग के काम में दखल देने से साफ मना कर दिया। यह सुक्षाव जरूर चुनाव आयोग को दिया कि वो वोटर की पहचान के दस्तावेज में आधार कार्ड को भी सम्मिलित कर ले हालांकि यह केवल सुक्षाव ही है आदेश नहीं । सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद चुनाव आयोग के हौसले बुलंद हो गए हैं वहीं विपक्ष हल्ला मचाने के नए रास्ते खोज रहा है । वैसे इस पूरे घटनाक्रम में विपक्षी दलों को एक फायदा अवश्य हुआ कि उसने बिहार में संदेह को जन्म दे दिया है । चुनाव आयोग की अंतिम सूची आने के बाद एक बार फिर हल्ला होगा क्योंकि यह तो तय है कि पुरानी सूची की तुलना में कुछ नाम कम हो ही जायेंगे ऐसे में विपक्ष इसे जानबूझकर ऐसा किया है कह कर कठघरे में खड़ा करेगा।  यदि विपक्ष चुनाव में अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाता तो भी वह इस पर ही अपनी हार का ठीकरा फोड़ेगा । बिहार का चुनाव भाजपा और एनडीए गठबंधन के लिए महत्वपूर्ण होता जा रहा है यही कारण है कि भाजपा ने बहुत पहले से ही इसकी तैयारी शुरू कर दी थी और प्रतिदिन फीडबैक भी ले रही है । यह साफ कर दिया गया है कि चुनाव वर्तमान मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के नेतृत्व में ही लड़ा जाएगा हालांकि बहुत सारे लोगों को इस पर भी संदेह है । इस संदेह का कारण है केन्द्रीय मंत्री चिराग पासवान की यह घोषणा कि वो स्वयं विधानसभा चुनाव लड़ेंगे । चिराग पासवान अपने बलबूते पर यह घोषणा कर अपना ही भविष्य दांव पर नहीं लगा सकते। उनकी यह घोषणा किसी सोची समझी रणनीति का अंग लग रही है । वैसे पिछले विधानसभा चुनाव में चिराग पासवान ने नीतीश कुमार का खुल कर विरोध किया था पर तब वे मंत्री नहीं थे उनके चाचा ने उन्हें पार्टी से अलग कर खुद को मंत्री बनवा लिया था पर अब स्थिति बदल चुकी है अब उनके चाचा परिदृश्य से बाहर हैं और चिराग पासवान राजयोग का उपभोग कर रहे हैं । वैसे चिराग पासवान पहले भी अपने आपको मोदी जी का सेवक कहते रहे हैं और अभी भी कहते हैं ऐसे में उनका और उनकी पार्टी का विधान सभा चुनाव लड़ना वो भी पूरी विधानसभा सीटों पर यह बात कुछ संदेश देती दिखाई दे रही है । बिहार में नीतीश कुमार की पकड़ पहले जैसी नहीं रही पिछले चुनाव में उनको कम सीटें मिली थीं पर लोकसभा चुनाव में वे सफल रहे थे । इस बार का विधान सभा चुनाव उनके भविष्य को तय करेगा । बिहार के मुख्य विपक्षी दल के नेता तेजस्वी यादव उन्हें बीमार मुख्यमंत्री कह कर संबोधित करते हैं । हाल ही में बिहार में जिस तरह से हत्यायें हुई वो अपराधियों के हौसले बुलंद होने का संकेत ही है और अपराधियों के हौसले तब ही बुलंद होते हैं जब सरकार पर पकड़ ढीली हो । एक समय नीतीश कुमार को सुशासन के लिए पहचाना जाता था पर अब बिहार की स्थिति को देखते हुए कमजोर मुख्यमंत्री के रुप में पहचाना जाने लगा है । कांग्रेस, आरजेडी सहित कुछ पार्टियां चुनाव को लेकर आशान्वित हैं । विगत चुनाव में यह गठबंधन सत्ता के बहुत करीब पहुंच गया था कुछ सीटें ही कम थी जिनके जुगाड़ के प्रयास किए गए थे, उस समय लालू यादव झारखंड की जेल में सजा काट रहे थे वे जेल में रहते हुए प्रयास कर रहे थे जिसके आडियो लीक भी हुए थे पर वे सत्ता की कुर्सी तक नहीं पहुंच पाए । इस बार सभी को उम्मीद है कि बिहार के कुशासन का लाभ उन्हें मिल सकता है । पर भाजपा जिस तरह हारी हुई बाजी को जीतने में माहिर हैं उसे देखते हुए राजनीतिक विश्लेषक कोई भविष्यवाणी नहीं कर पा रहे हैं । हरियाणा और महाराष्ट्र का चुनाव जहां भाजपा या गठबंधन के जीतने की कोई उम्मीद ये नहीं थी वहां भाजपा अच्छी खासी लीड बना कर सत्ता में बैठ चुकी है ऐसे में बिहार में एनडीए गठबंधन नहीं जीत पाएगा इसकी संभावना कम ही है । हिन्दी को लेकर दक्षिण भारत के बाद अब महाराष्ट्र में भी विवाद गहराता जा रहा है । अपनी क्षेत्रीय भाषाओं को सम्मान देना ठीक है पर दूसरी भाषा का अपमान करना तो सही नहीं माना जा सकता । हिन्दी भारत में संपर्क भाषा के रुप में उपयोग की जाती है याने मराठी भाषा बोलने वाले जब महाराष्ट्र से बाहर अन्य कहीं जायेंगे तो उनको बता करने के लिए हिन्दी या अंग्रेजी ही प्रयोग करना होगी और ऐसा वे तब ही कर पायेंगे जब वो हिन्दी सीख लेंगे तो फिर विरोध क्यों ? अपनी स्थानीय भाषा को प्राथमिकता दो पर हिन्दी को बिल्कुल भी स्वीकार न करो यह गलत है और नई पीढ़ी के भविष्य के साथ खिलवाड़ भी । महाराष्ट्र वह प्रांत है जहां का हिन्दी सिनेमा पूरे विश्व में अपनी पहचान बनाए हुए हैं ‌। हिन्दी सिनेमा देखने के लिए विश्व के अनेक देशों के नागरिक हिंदी सीखते हैं  और वे गर्व भी करते हैं । किसी भी देश में भाषा विवाद वहां के विकास में अवरोध पैदा कर देता है । एक और जब हम विश्व गुरु बनने की चाह पाले हैं तब भाषा विवाद हमारे सपनों को ध्वस्त ही करेगा । 14 सितंबर को हम हिन्दी दिवस मनाते हैं ताकि हिंदी का प्रचार प्रसार हो और बहुसंख्यक व्यक्ति हिन्दी भाषा से जुड़े तो क्या हिन्दी दिवस मनाने के कोई मायने नहीं है । विश्व की तीसरी बड़ी भाषा का गौरव हासिल कर चुकी हिन्दी अपने ही देश में विवादों में उलझ जाए ? कौन कौन सी भाषा पढ़ेगा या बोलेगा इसका निर्णय उसी को करने दिया जाए यह ही बेहतर होगा । नई शिक्षा नीति में इसकी सुविधा दी भी गई है । हमारे बच्चे कौन सी भाषा सीखना चाहते हैं इसका निर्णय उनको ही करने दिया जाए । वैसे भी हिन्दी राजभाषा के रूप में स्वीकार की गई है तो उसकी गरिमा बनाए रखने की जिम्मेदारी हमारी ही है । अपने स्वार्थ में मसगूल तथाकथित नेताओं द्वारा हिन्दी का विरोध किया जाना उचित तो नहीं माना जा सकता । सरकार को भी राजभाषा के अपमान को बर्दाश्त नहीं करना चाहिए । यदि सरकार ऐसे विरोध पर मौन रहती है तो हर भाषा की लड़ाई शुरू हो जाएगी फिर उसे सम्हाल पाना कठिन हो जाएगा । विरोध करने वाले अपने आपको हिन्दुत्व से जोड़ते हैं उनको मालूम होना चाहिए कि उसी हिन्दुत्व की पहचान हिन्दी है और हिन्दुओं के धर्म ग्रंथ संस्कृत या हिंदी में ही लिखे गए हैं । हिन्दी को तो राष्ट्र भाषा घोषित हो जाना चाहिए था पर ऐसी ही राजनीति के चलते नहीं हो पा रही है । हिन्दी का विरोध करने वालों को बहुसंख्यक व्यक्तियों की भावना का ध्यान रखना चाहिए। क्षेत्रीय भाषाओं की अपनी सीमा होती है पर हिन्दी की कोई सीमा नहीं है इसलिए भी इसे सीखना और पढ़ना आवश्यक है । पिछले महीने अहमदाबाद में एक विमान दुर्घटना का शिकार हो गया था जिसकी जांच रिपोर्ट सामने आ गई है जाहिर है कि रिपोर्ट में दुर्घटना का कारण फ्यूल बंद होना ही बताएगा है जिसको लेकर पहले से ही संभावना व्यक्त की जा रही थी ‌। फ्यूल बंद होने से इंजन बंद हो गए और इतना समय भी पायलट को नहीं मिला कि वो इमरजेंसी इंजन चालू कर पाता । रिपोर्ट भले ही प्रारंभिक हो पर उससे जो संकेत मिल रहे हैं वो एयर इंडिया की लापरवाही की ओर ही इंगित कर रहे हैं । विमान उड़ान भरे इसके पूर्व पूरे सिस्टम की जांच की जाती है जो शायद नहीं की गई वरना विमान के उड़ान भरने के चंद सैकेण्डों में ही ऐसी दिक्कत नहीं आती । विमान के दोनों पायलट अनुभवी थे मतलब उनकी लापरवाही की संभावना तो है ही नहीं फिर एक ही बात समझ में आती है कि विमान की जांच नहीं की गई और इस लापरवाही ने 272 व्यक्तियों की जान ले ली । इस घटना के बाद अब बाकी विमान कंपनियां इतनी भयभीत हैं कि प्रतिदिन कोई न कोई विमान की उड़ान रद्द हो रही है । किसी भी विमान की उड़ान रद्द होना यात्रियों के लिए परेशानी का कारण तो बनता ही है साथ ही आर्थिक नुकसान भी देता है । उड्डयन मंत्रालय को इस दिशा में भी काम करना चाहिए ‌।

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