*(26 जून जन्मदिवस के बहाने)*

पहले कलकत्ता में कवियों कलाकारों का भी अपना एक दौर था, जो अपने इस समाज में निस्संदेह सबसे ऊपर और लोकवरेण्य माना जाता था। कलकत्ता का बंगाली समाज आज भी अपने मुकुट के रूप में इसी वर्ग को धारण करता है। बंगाल के लोग अपनी अस्मिता की पहचान आधारभूत तौर पर इसी वर्ग के मार्फत किया तब भी किया करते थे। ईश्वरचंद्र विद्यासागर, बंकिमचंद्र चटर्जी, शरतचंद्र (चटर्जी), गुरुदेव रवीन्द्रनाथ, आचार्य नंदलाल बसु, आचार्य क्षितिमोहन सेन, विद्रोही कवि नज़रुल इस्लाम या फिर आध्यात्मिक पुरुष रामकृष्ण परमहंस, उनके विश्वविख्यात शिष्य विवेकानंद, आचार्य जगदीश चंद्र बसु या बाद की विभूतियां जैसे कि सत्यजित राय, महाश्वेता देवी, मृणाल सेन, ऋत्विक घटक, उत्तमकुमार ऐसे लोग थे जो अपनी प्रतिभा की तेजस्विता और परामेधा के बल पर पूरे भारत की बौद्धिक और सांस्कृतिक विरासत की पहचान बन चुके थे। राजनीति में देशबंधु चित्तरंजन दास, नेता जी आदि तो थे ही। क्रांतिकारी पुरुषों का वह समूह –उस बंगाल और कलकत्ता की पहचान था जिसमें मातंगिनी हाजरा जैसी मातृशक्तियाँ भी अपना योगदान करती चल रही थीं। इन्हीं में से एक नाम है बंकिमचंद्र चटर्जी। इनका जन्म 26 जून, 1838 को पश्चिम बंगाल के उत्तर 24 परगना जिले के कांठलपाड़ा नामक गांव में एक समृद्ध परम्परागत बंगाली परिवार में बंकिमचन्द्र का जन्म हुआ। पिता यादव चंद्र चटर्जी और माता दुर्गा देवी के घर जन्मे बंकिमचंद्र की किताबों के प्रति बचपन से ही रुचि थी। साथ ही साथ उन्हें अपनी मातृभाषा के प्रति गहरा लगाव था। उन्होंने कोलकाता के प्रेसीडेंसी कॉलेज से आर्ट्स की डिग्री प्राप्त की थी।
अपने दौर के महान उपन्यासकार, कवि, पत्रकार और बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी कालजयी साहित्यकार बंकिमचन्द्र के गीत ‘वंदे मातरम्’ में भारत को देवी स्वरूप दर्शाया गया। यह प्रसिद्ध गीत 1882 में प्रकाशित बंकिमचन्द्र के सबसे चर्चित उपन्यास ‘आनंदमठ’ से लिया गया है। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के दौरान ‘वन्दे मातरम्’ गीत क्रांतिकारियों की प्रेरणा का स्रोत था। इस गीत ने देशवासियों में नए जोश और ऊर्जा का संचार किया। आज भी राष्ट्रवादी इस पर गर्व करते हैं। इसकी रचना बंकिमचंद्र चटर्जी ने संस्कृत भाषा में की थी जो आगे चल कर आजाद भारत का राष्ट्रगीत बना।
शिक्षा समाप्ति के तुरंत बाद अपने पिता की तरह वह अधीनस्थ कार्यकारी सेवा में शामिल हो गए और 1858 में जेसोर डिप्टी मैजिस्ट्रेट पद पर इनकी नियुक्ति हो गई। कुछ समय बंगाल सरकार के सचिव पद पर भी रहे तथा रायबहादुर और सी.आई.ई. की उपाधियां पाईं।
इनकी पहचान बंगला कवि, उपन्यासकार, लेखक और पत्रकार के रूप में है। इनकी प्रथम प्रकाशित कृति ‘राजमोहन्स वाइफ’ थी जो अंग्रेजी में थी। उनकी पहली बंगला रचना ‘दुर्गेशनंदिनी’ मार्च 1865 में छपी जबकि दूसरा उपन्यास ‘कपालकुंडला’ (1866) को इनकी सबसे अधिक रूमानी रचनाओं में से एक माना जाता है। सन् 1882 में देशभक्ति की भावना से भरपूर ‘आनंदमठ’ प्रकाशित हुआ। उनका अंतिम उपन्यास ‘सीताराम’ (1886) था जिसमें मुस्लिम सत्ता के प्रति एक हिंदू शासक का विरोध दर्शाया गया। इन्होंने लेखन के माध्यम से आत्म-बलिदान का आदर्श और देशभक्ति का जो मंत्र प्रचारित किया, वह निःसंदेह महत्वपूर्ण घटना है। सरकारी नौकरी में होने के कारण बंकिमचन्द्र किसी सार्वजनिक आंदोलन में प्रत्यक्ष भाग नहीं ले सकते थे, अतः उन्होंने साहित्य के माध्यम से स्वतंत्रता आंदोलन के लिए जागृति का संकल्प लिया।
बंकिमचंद्र ने सन् 1872 में मासिक पत्रिका ‘बंगदर्शन’ का भी प्रकाशन किया। रबीन्द्रनाथ टैगोर जैसे लेखक ‘बंगदर्शन’ में लिखकर ही साहित्य के क्षेत्र में आए जो बंकिमचंद्र को अपना गुरु भी मानते थे। बंकिमचंद्र का सबसे चर्चित उपन्यास ‘आनंदमठ’ 1882 में पहली बार बंगदर्शन में धारावाहिक रूप में ही प्रकाशित किया गया था। भारतीय राष्ट्रवाद के शुरूआती समर्थकों में से एक महान लेखक और विचारक बंकिमचंद्र चटर्जी का निधन 08 अप्रैल, 1894 को हो गया।
– डॉ. मनोज कुमार
लेखक – जिला सूचना एवं जनसंपर्क अधिकारी हैं।
