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व्यंग्य : साहेब ! इतना लादीए, जामे कुटुंब समाए…!

पंकज सीबी मिश्रा / राजनीतिक विश्लेषक एवं पत्रकार जौनपुर यूपी 

यूजीसी पर मचे घमासान के बीच अब सोशल मिडिया पर लोग पूछ रहे कि आरक्षण की कोई सीमा है भी या जन्म जन्मांतर के लिए लागू हों चुका है  ? भारत के जिस जातिवाद पर सुप्रीमकोर्ट ने भी चिंता जताई है उसकी जड़ ही आरक्षण है, खत्म कीजिये इस  विसंगति को तभी समानता मिलेगी । भारत का संविधान बनाते समय 10 वर्ष के लिए 17.5% आरक्षण देकर कोई गलती नहीं की गई थी । गलती हुई 10 वर्ष बाद उसे फिर 10 वर्ष के लिए आगे बढ़ाकर और फिर हर 10 वर्ष बाद बार बार आगे बढ़ा बढ़ाकर । 1989 में बागी कांग्रेसी वीपी सिंह द्वारा लाए गए मंडल ने तो सारा ढांचा बिगाड़ा  । तब  सुप्रीमकोर्ट को आदेश देना पड़ा कि आरक्षण कभी भी 50% से ज्यादा नहीं होगा । लेकिन तमिलनाडु जैसी सरकारों ने तो अपनी मनमानी करते हुए आरक्षण को 69% तक बढ़ा दिया है । आपको भी आरक्षण चाहिए ? मिल जाएगा ? महीना दो महीना सड़कों पर आइए और बस  यूजीसी जैसी एक और बड़ी गलती सरकार क्रीमी लेयर को लेकर कर चुकी है । आपको याद होगा कि सुप्रीम कोर्ट ने आरक्षित लोगों के बीच से क्रीमी लेयर का चयनकर उनकी आरक्षण सुविधा बन्द करने का स्पष्ट आदेश दिया था । इस पर प्रदर्शन हुए तो मोदी सरकार आदेश के खिलाफ अध्यादेश ले आई और सुप्रीमकोर्ट का आदेश रद्द हो गया । आरक्षण से क्रीमी लेयर को मुक्त कर दें तो आरक्षण का उद्देश्य कुछ हद तक सिद्ध किया जा सकता है । बताइए अरबों की मालकिन मायावती को आरक्षण की क्या जरूरत है ? चिराग पासवान , स्वामीप्रसाद मौर्य , उदित राज , मीरा कुमार आदि के परिवारों को आरक्षण क्यों दिया जाए । बड़े बड़े ब्यूरोक्रेट्स , डीएम , एसएसपी आदि पदों पर रहने वाले आरक्षित अधिकारियों की अगली या उससे अगली पीढ़ियों को आरक्षण की बाध्यता क्यों है ? बाबा साहेब के उस निर्णय के हम 100% समर्थक हैं जिसके आधार पर एससीएसटी समूह को 17.5% आरक्षण 10 वर्षों के लिए दिया गया था । आज समाज की सूरत बदल जाने के बावजूद यदि 79 साल बाद भी आरक्षण जारी है तो यह आश्चर्यजनक है । हमारा पूरा यकीन है कि आज बाबा साहेब अंबेडकर जीवित होते तो काफी पहले ही क्रीमी लेयर को बाहर कर चुके होते । आरक्षण व्यवस्था देश को बीमार बना रही है । 

                          उधर आजकल पंडत खूब चर्चा में है । मैं भी पंडत ही हूँ पर मेरे चर्चा में पेट्रोल खर्चा होने के कारण मै राजनीति का युवा हूँ और जब किसी युवक को गुलाब लिए घूमते देखता हूँ तो पंडित चच्चा नेहरू याद आ जाते है । अहा ! क्या मनोज वाजपेयी टाईप वाले पंडत जी हुआ करते थे च्चा। कसम से आजकल लाल  और नीले सलाम वालों को ब्राह्मण भारत छोड़ो, बामन बीएचयू छोड़ो करते देखता हूं तो बहुत दया आती है। मैं जानता हूं एक न एक दिन देश के गमले में भी सहिष्णुता नामक टमाटर उगेंगे। देश का हर नागरिक 15 लाख के पैकेज पर संतोष करेगा और कहेगा, यही हमारे पंद्रह लाख हैं। पर दोस्त ! उस समय उसका मुंह देखने लायक होता है ज़ब कोई पंडत विष्णु तिवारी निर्दोष होकर भी बत्तीस साल झूठे एससीएसटी में सजा काट आता है । यही लोकतंत्र की माया है। खैर! आप सब के बोनसाई गमलों में टमाटर फलते फूलते रहें, इसी आशीर्वाद के साथ पत्रकार पंकज सीबी मिश्रा का, लाल और नीला सलाम ।

             किसी नें फेसबुक पर एक्सपीरियंस शेयर करते हुए लिखा कि पिछले दिनों उसने यूट्यूब से पौधारोपण को लेकर एक तकनीक सीखा । यूट्यूबर कृषि वैज्ञानिक बनकर गुलाब लगाने का तरीका बता व्यूज जूटा रहा था । मेहनती रविश टाईप यूट्यूबर नें बताया कि गुलाब की एक छह इंच की टहनी काट लीजिए, एक तरफ एक इंच तक उसका छिलका निकाल दीजिए। फिर बिना छिलके वाले हिस्से को एक टमाटर में घुसा कर टमाटर को मिट्टी में दबा दीजिए। टमाटर सड़ेगा और खाद बन कर पौधे को आवश्यक पोषक तत्व दे देगा। कुछ दिनों में टहनी में कोंपल फूटने लगेगी और लगभग महीने भर में आपको गुलाब का पौधा मिल जाएगा।  बता दूं मित्रों कि छत पर कुछ गमलों में पौधे हमने भी लगाए हैं। उस कृषि वैज्ञानिक की सलाह मुझे भी रुची, लगा कि इस तरह से पौधा बनाना आसान हो जाएगा। एक दिन मेरी बगिया में भी पौधों की संख्या वैसे ही बढ़ने लगेगी जैसे देश में भजप्पा के विधायक बढ़ रहे हैं, तो भइया ! एक्सपेरिमेंट हुआ और जबरदस्त हुआ। गुलाब की डंडी रोपी गई, आशाओं को नित्य जल दिया गया। उम्मीदों का सेंसेक्स रोज उछाल मारता, जज्बातों की जीडीपी रोज बढ़ रही थी। जैसे ब्राह्मणवाद के यथाशीघ्र समापन के लिए हम दिन में बाइस बाइस घंटे तक प्रगति रिपोर्ट निहारने का काम करते है वैसे गमला निहारा गया। पर भाई साहब! हर उद्योग का फल वैसा ही मिले जैसा हम चाहते हैं, यह संभव नहीं। कभी कभी वैराग्य में घर छोड़ने वाले युवक को सत्ता संभालनी पड़ती है, तो कभी कभी सत्ता के लिए दशकों तक देश की खाक छानने वाले युवक को अंत में वैरागी होना पड़ता है। समझ जाइएगा या नाम बताएं हम? तो महीने दिन बाद की स्थिति यह थी कि गुलाब की डंडी सूख गई थी, और टमाटर का एक हष्ट पुष्ट पौधा तैयार था। बात वही है, मेरी उम्मीदों का कांग्रेसीकरण हो गया था। खैर… कुछ दिनों पूर्व  एक मित्र ने एक दिन मुझसे प्रेम को लेकर कुछ पूछा था। मैंने तब भी यही कहा था और अब भी यही कहता हूं, मेरे भाग्य में गुलाब नहीं हैं। मैंने जब भी गुलाब की आशा में कदम बढ़ाया है, तब तब मेरे हिस्से में टमाटर आए हैं। पर कोई बात नहीं, मैंने अभी भी उम्मीद नहीं छोड़ी है। राहुल जी भी उम्मीद कहां छोड़ पा रहे हैं। मित्रों, गुलाब के लिए तप कर के टमाटर पाने वाला मैं अकेला नहीं हूं, इस संसार में अधिकांश लोग ऐसे ही हैं। गुलाब की इच्छा किसे नहीं है, कौन उसे देख कर मुग्ध नहीं होता, कौन उसकी ओर हाथ नहीं बढ़ाता। पर सबको एक दिन टमाटर से ही संतोष करना पड़ता है। यही विधि का विधान है। आप स्वयं सोचिए तो, क्या आपने दर्जनों बार राजनीति में गुलाब की ओर कदम  बढ़ाया , मिला क्या ? आज यदि 4 से 5 करोड़ देशवासी भारत छोड़कर विदेशों में बस गए हैं तो उसके पीछे आरक्षण के कारण कम हुए रोजगार के अवसर भी प्रमुख हैं । तमाम राजनैतिक दल वोटों के लिए आरक्षण को खत्म करने पर कभी बात नहीं करेंगे । उल्टे जाति जनगणना कराकर हालत और पेचीदा बनाएंगे । जाहिर है भविष्य में भी देश से प्रतिभा पलायन होता रहेगा । यह कदाचित सुखद नहीं है । भारत को युवा प्रतिभाओं की बेतहाशा जरूरत है । आरक्षण कब तक रहेगा कोई तो सीमा बताइए ?

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