कविता और कहानी
कितनी कड़वी हैं सच्चाइयाँ
कितनी कड़वी हैं सच्चाइयाँ गिर रहीं नीचे ऊँचाइयाँ कोयलों के बाइक कंठस्वर चढ़ी नीलाम अमराइयाँ बद हुये मौसमों के चलन हुयीं गुमराह पुरवाइयाँ दिन ढले घर में अहसास के स्यापा करती हैं तनहाइयाँ आदमी कद में बकमतर हुआ बढ़ गयीं उसकी परछाइयाँ गिरना तय है जिधर जायेंगे उधर खंदक इधर खाइयाँ होश आयेगा ‘महरूम’ जब…
आजादी का अमृत महोत्सव : डॉक्टर राहुल
आओ हम मनाएं आजादी का अमृत महोत्सव! राष्ट्रोत्थान का लेकर नया संकल्प करें नवभारत का नवनिर्माण फहराएं तिरंगा… दिखाएं विश्व को जब मन में हो दृढ़ इच्छा-शक्ति सतत् आगे बढ़ने का अटल विश्वास तब परिस्थितियों की समाधि में चुप नहीं बैठता है मनोभावों का बीज फूट पड़ता है पाषाणों को तोड़कर पीपल के कत्थई कोपल…
ग़ज़ल : वो कभी मिलते नहीं हैं
वो कभी मिलते नहीं हैं पर हमें भूले नहीं हैं छू हमें महसूस भी कर देख हम सपने नहीं हैं कल इमारत भी बनेंगे हम फ़क़त नक़्शे नहीं हैं इब्तिदा हमसे हुई थी और हम पहले नहीं हैं क्या कहा है आपने जो हम अभी समझे नहीं हैं विज्ञान व्रत
सूरज की मौत,
सुस्त हो रहा सूरज आने वाली है प्रलय उत्तरी ध्रुव पर फटते ज्वाला पृथ्वी बनेगी आग का प्याला समुद्र में आयेगा तूफान पानी में डूबेगी दुनिया चारो ओर होगा समुद्र बर्फ गलने की बढ रही रफ्तार सालों में गल जायेगें उत्तरी-दक्षिणी ध्रुव आने वाली है जल प्रलय। ख़तरे में है दुनियां होगा विनाश,महा विनाश…
कविता- कलुषित विचार
कलुषित विचारों का हो यदि माली कैसे बगिया महकेगी कैसे कोई नन्ही चिड़िया चहकेगी? भावों की अशुद्धियां अंतर्मन पर अधिकार किये कैसे दिव्य देशना बसेगी आखिर कैसे बगिया महकेगी? खाद पानी नहीं है केवल बिन मौसम बरसात कभी जब तक संयमित ना हो माली आखिर कैसे बगिया महकेगी? बातों से नहीं सीचीं जाती जड़ें गहराई…
आजादी का 75वीं वर्षगाँठ हिंद माननेवाला है,
.डॉक्टर सुधीर सिंह [शेखपुरा , बिहार] आजादी का 75वीं वर्षगाँठ हिंद माननेवाला है, किंतु तू-तू, मैं-मैं से संसद कभी न आजाद रहा। बहस के लिएआवंटित संसद का बहुमूल्य वक्त, राजनीति के दांवपेंच में बेवजह ही फंसा रहा। हिंदुस्तान के अवाम की मेहनत की कमाई को, लोग गुलछर्रा उड़ाने में ज्यादा मनमानी न करें। कोई न…
आज़ादी का दिन ( लघु कथा )
सुबह लक्ष्मी काम पर जल्दी आ गई थी। वह बड़ी शीघ्रता से काम निपटा कर जाना चाहती थी। आज स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर उसके विकलांग पुत्र राहुल को जिलाध्यक्ष महोदय की ओर से उत्कृष्टता का पुरस्कार मिलने वाला था। इस वर्ष उसने राष्ट्रीय स्तर की निबंध प्रतियोगिता में प्रथम स्थान पाकर जिले का…
जीवन के वृक्ष को जीवन्त रखना है,
जीवन के वृक्ष को जीवन्त रखना है, प्रेम के पानी से उसे सींचते रहना है। उसको सुखाता है नकारात्मक सोच, शुभ सोच से सदा हराभरा रखना है। अहंकार की ऊष्मा विष के समान है, जो जीवन को विषाक्त कर देता है। जो सीख लिया है दंभ को दुत्कारना, मजेदार जीवन का वह मजा लेता है।…
देवेन्द्र के दोहे
देवेन्द्र कुमार पाठक अपने तीरथ धाम हैं,खेत और खलिहान। अनिल,अनल,जल,भूमि,नभ; हैं प्रत्यक्ष भगवान।। श्रम ही अपना धरम-व्रत,घोर तपस्या घाम। ओला-पाला,बारिशें,बाढ़ हमारे नाम।। इल्ली,गंधी, गेरुआ,कांसा, गाजर घास। आवारा गोवंश ने, किया फसल को नाश।। माघ-पूस की रात में जब चलता हिमवात। फसल सींचते खेत की,हाड़ा-गोड जुड़ात।। सरहद पर बेटा सजग,अन्न उगाते बाप। उनकी सेवा,त्याग का,कोई मोल…
पथ के हो राही
पथ के हो राही तुम हो पथिक थक के न हारो थोड़ा भी तनिक थोड़ा धीरज धर बढ़ते जाना एक दूजे का मनोबल बढ़ाना, आएंगी बाधाएं हजार साहस को तुम बनाना आधार, टेड़ी मेड़ी होगी डगर चलते जाना तुम हो निडर, आएगी जो भी है रुकावट वो तो होगी बस क्षणिक… पथ के हो राही…
