कविता और कहानी
दिल के ज़ख़्म…..
ज़ख़्म अल्फ़ाज़ों के थेदवा करते भी कैसेख्वाबो आंखों ने देखे थेमुक़्क़मल होते भी कैसे सब ख़त्म हो रहा थामेरी आँखों के सामनेतदबीर कुछ होती तोफ़ना होते भी कैसे फ़ासले न होते तोज़ुदा होते भी कैसेमल्लिका ए दिल थीदग़ा देते भी कैसे तड़प दिल कीअब रुकती नही हैबिते हुये पलों कीकहानी बनेगी कैसे…. आरिफ़ असासदिल्ली
एक दिन सब यहीं छूट जाएगा
यह दुनिया तो है एक सराय यहां कभी कोई आए तो कभी कोई जाए फिर भी लगी है सबको पैसों की हाय हाय यह पैसा भी एक दिन रूठ जाएगा एक दिन सब यहीं छूट जाएगा। चार दिन की चांदनी, फिर अंधेरी रात सुख दुख तो है एक आनी जानी बात हैवानियत के मोहरों की…
अंतिम प्रताड़ना
आंचल ने बी.ए. की परीक्षा दी थी। आंचल के माता पिता (रमा व चेतराम )ने उसका विवाह एक छोटे शहर में अमल नाम के लड़के से कर दिया। एक कंपनी में नौकरी करता था।आंचल के ससुराल वालों को मायके के लोगों का आना-जाना बिल्कुल पसंद नहीं था।आंचल कोई भी काम करती थी उसे तायने ही…
जा रहा है कोरोना
जा रहा है कोरोना लेकर कितनों की जान कितनों की बर्बादी ,कितनों का ईमान इतिहास गवाही देगा, उनकी तबाही की गूंजती है जिनके रोने की आवाज खुलने लगे हैं बाजार होने लगी है चहल पहल सुनाई देने लगी गानो की आवाज,पर गूंजती है उनके रोने की आवाज छिन गई है जिनके घरों में रोटियां बुझ…
हर रूह प्रेम की प्यासी है
कविता मल्होत्रा (संरक्षक एवं स्तंभकार – उत्कर्ष मेल) उधार की मिली सब साँसें,हर धड़कन मुक्ति की अभिलाषी है अपनी संवेदनाओं को साग़र कर दें, हर रूह प्रेम की प्यासी है ✍️ अति हर चीज़ की बुरी होती है, बचपन से सुनते आए हैं।मानव जाति से किस तरह के गुनाहों की अति हुई है जिनके परिणाम…
छाया है पिता
बरगद की घनी छाया है पिता छाँव में उसके भूलता हर दर्द। पिता करता नहीं दिखावा कोई आँसू छिपाता अन्तर में अपने। तोड़ता पत्थर दोपहर में भी वो चाहता पूरे हों अपनों के सपने। बरगद की घनी छाया है पिता छाँव में उसके भूलता हर दर्द। भगवान का परम आशीर्वाद है पिता जीवन की इक…
ख़बर से बेख़बर
ग़मों का मारा बेचारा मासूम-सा ये जो दिल है। अरमानों की इसने फिर से सजाई महफ़िल है।। कुहासा-सा जिंदगी में आजकल बहुत है। दूर बादलों में गा रहा कोई प्यारी-सी ग़ज़ल है।। डर था जब समंदर की लहरों से इतना। फिर क्यूँ, बना लिया साहिल सहारे घर है।। पाँवों के छाले भी अब तो पूछते…
