कविता और कहानी
“मौसम खुशमिजाज है।”
बसंत यानि उल्लास। प्रेम और प्यार का आभास। ज़िन्दगी के लिए अति आवश्यक तत्व। गतिमान रहने के लिए एक आवश्यक बल। बसंत प्रतिवर्ष आता है। बीते वर्षों की कुछ यादें ताजा कर जाता है। फिर से मिठास भर जाता है। जीवन को महका जाता है। हर तरफ बिखरा हुआ रंग। रंग बिरंगे फूल खिले हुए।…
हर गली में एक निर्भया है
कितना मुश्किल है इस दुनिया में औरत हो पाना कदम कदम पे परखे जाना जाना अपने आप को पवित्र दिखाना। यह परख, यह परीक्षा जो कभी खत्म नहीं होती। क्यों एक बलात्कार में सिर्फ औरत ही है इज्जत खोती क्यों वजूद उसका इतना दबाया जाता है । लोग क्या कहेंगे कहकर चुप कराया जाता है…
प्रवासी दुनिया
समुंदर का नीलापन आकाश का नीलापन उड़ रहे क्रेन पक्षी एक नया रंग दे रहे प्रकृति को। सुंदरता दिन को दे रही सौंदर्यबोध रात में ले रहा समुंदर करवटे लहरों की। तारों का आँचल ओढ़े चंद्रमा की चाँदनी निहार रही समुंदर को क्रेन पक्षी सो रहे जाग रहा समुंदर। मानों कह रहा हो प्रवास की…
” दीपोत्सव”
रघु मिट्टी के खिलौने और बर्तन बनाने वाला एक कुम्हार था। उसके बनाए सामान की खूब बिक्री होती थी। हर साल दिवाली पर रघु दिए और खिलौने बनाता था। मिट्टी के दियों को जोड़कर अलग अलग दिखने वाले झूमर भी बनाता था। त्यौहार पास आता तो उसके पास बिल्कुल भी समय नहीं होता था। रात…
इमरती बड़ी चुलबुली… (बाल-कविता )
इमरती है बड़ी चुलबुली सोनपपड़ी अकड़ी अकड़ी कलाकंद दे रहा आनंद बरफी बिफरे करे फंद रसगुल्ला कर रहे हल्ला लड्डू ने झाड़ा है पल्ला मक्खनबड़ा रहते हैं मौन खीरमोहन की चली पौन जलेबी रस में डूबी पड़ी रबड़ी बात करे तगड़ी मोहनभोग लगे अच्छे गूँजी दे रही है गच्चे घर अंदर इनके हाँके हैं बाहर…
दिव्य दृष्टि के दीप जलाएँ
कविता मल्होत्रा बाल दिवस और दीपोत्सव, एक ही दिन आने वाले, आत्मा को आनँदित करते दोनों उत्सव, भारत के प्रत्येक नागरिक को, दोहरी भूमिका निभाने के लिए, सत्यम शिवम् सुँदरम की भावना के प्रति फिर एक बार आगाह कर रहे हैं। हमारे देश के मौजूदा हालातों, और बाज़ारू चकाचौंध के प्रति आकर्षित होता, मासूम बच्चों…
आखिर क्यों बदल रहे हैं मनोभाव और टूट रहे परिवार?
भौतिकवादी युग में एक-दूसरे की सुख-सुविधाओं की प्रतिस्पर्धा ने मन के रिश्तों को झुलसा दिया है. कच्चे से पक्के होते घरों की ऊँची दीवारों ने आपसी वार्तालाप को लुप्त कर दिया है. पत्थर होते हर आंगन में फ़ूट-कलह का नंगा नाच हो रहा है. आपसी मतभेदों ने गहरे मन भेद कर दिए है. बड़े-बुजुर्गों की…
ज़िन्दगी के रंग
ज़िन्दगी एक पहेली सी लगती है, दुखो की छाव एक सहेली सी लगती है । हम तो बैठे थे इक आशा की किरण थामे पर अब आशा करना एक नादानी सी लगती है । ज़ख्म जैसे भी हो हमेशा दर्द ही देते है , अब तो ख़ुशी महसूस करना भी , इक बात पुरानी लगती…
