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हो रँग यही अब फागुन का

कविता मल्होत्रा (स्तंभकार-उत्कर्ष मेल) वसँत ऋतु ने अब के बरस ये कैसी दस्तक दी है, चारों तरफ रक्त-रँजित फाग का मँज़र है। कहाँ गया वो मौसम जब हर पखवाड़ा वृँदावन की पावनता से महकता था। आखिर एैसा क्या हो गया कि आज सर्वोत्तम योनि पाकर भी मानव अपनी ही चाल भूल गया है। क्यूँ चाहिए…

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दिल्लीे का दर्द आइए मिलकर बाँट लें

डॉक्टर सुधीर सिंह दिल्ली का दर्द आइए मिलकर बाँट लें,शांति के लिए वहां  सब सत्प्रयास करें.दंगों का दर्द फिर कभी नहीं उभरे यहां,प्रत्येक हिंदुस्तानीआज दृढ़-संकल्प लें.सनेेह-सहयोग,सद्भावना और क्ष्रद्धा से;अमन-चैन, शांति का प्रादुर्भाव होता है.भाईचारे का भावआमलोगों में आने से,घर-बाहर सर्वत्र प्रेमपुष्प खिल जाता है.प्रेम और प्रेरणा में  दिव्य शक्ति होती है,भेदभाव वह कभी अंकुरने नहीं…

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रँग भेद (एक कथालेख)

गाँ।व की पगडंडी-उस पर चलती हुई मैं।दूर एक पतली सी नदी बहती है जो पथरीली जमीन से होती हुई एक मैदान में पहुँचती है ।जलधारा कभी बहुत पतली हो जाती है और वर्षा का सहारा ले कभी कुछ चौड़ी और छोटी छोटी तरंगों से युक्त भी।अचानक ही इच्छा हुई उस नदी को देखने की।बच्चों को…

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विश्व रेडियो दिवस पर विशेष

यशपाल सिंह रेडियो दिवस के इस अवसर पर जब मैं पिछले 50-55 साल का रेडियो का इतिहास याद करता हूं तो बचपन से लेकर आज तक रेडियो के कई दौर याद आते हैं । गांव की चौपाल में रखा एक बड़ा सा रेडियो, हाथ हाथ में घूमता ट्रांजिस्टर, विविध भारती और बिनाका गीतमाला, अमीन सयानी,…

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सुख

        घर के बाहर बारिश की झड़ी लगी हुई थी और अन्दर सीमा और रमेश चाय के साथ पकौड़े खाने का आनंद ले रहे थे । बारिश में ज्यादातर लोग चाय पकौड़े का आनंद लेते हैं। बातें करते करते सीमा को अपना बचपन याद आने लगा । कैसे वह बारिश में बाहर भाग जाती थी…

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आलोकित रहे हिंदुस्तान

सलामत   रहे  सारा जहान। दिलों   में  बचा  रहे  ईमान। आसमां के सितारों की तरह, आलोकित रहे  हिंदुस्तान।। छल बल से नहीं चलता देश, कुटिल रावण-सा धरो न वेष। कुछ  गुंडों के कोलाहल से, कभी बदलता नहीं परिवेश। नभ  में कितने मेघ  घने हों, परंतु  सूर्य  निकलता ही है। सत्य  पर कई  परदे  डालो, लेकिन सत्य…

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‘ना होते गर ये’

ना होते ग़र ये बहादुर सैनिक सीमा पर तैनात आराम से बैठकर घर में ना ले पाते हम चैन की साँस ना खाते ग़र ये वीर भारत माँ के अपने सीने पर गोली ना मना पाते हम निज घरों में अपनेपन की रंगोली ना होते ग़र ये भारत माँ के वीर जवान निज परिवार संग…

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ये पब्लिक है, सब जानती है

ये पब्लिक,ये जनता सब जानती है, जनता ही जनार्दन है,लोकतंत्र के महापर्व में जनता जनार्दन की भूमिका सर्वोपरि होती है। जनता जनार्दन ने भाजपा व कांग्रेस को उसकी औकात बता दी,पर दोनों पार्टियों के नेता हार के बावजूदअपनी अपनी डफली बजा रहे है,न जाने कैसे अभी से भूल गए करारी हार का सदमा!नैतिकता व शुचिता…

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जरूरी है (गजल)

शंकाओं का शमन जरूरी है। आतंकों का दमन जरूरी है। आगे बढ़कर करें इसे संभव। दुनिया भर में अमन जरूरी है। श्रम से सींचें सभी इसे मिलकर। अपना सुरभित चमन जरूरी है। दुष्टों को तो सबक सिखाना है। पूज्यों के प्रति नमन जरूरी है। कलियुग ने तो किए बहुत करतब। सतयुग का आगमन जरूरी है।

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सहयोग की भावना आध्यात्मिक वरदान है

डॉक्टर सुधीर सिंह एक-दूसरे की हिफाजत में सब सजग रहें,सहायता करने में हम  हमेशा ही आगे रहें.संकट से तब कोई  इंसान नहीं घबड़ायेगा,विपत्ति का सामना सब मिलकर करते रहें.सहयोग व्यक्ति  को  शक्ति प्रदान करता है,उत्साह व उमंग का सृजन  करता रहता है. व्यक्ति का व्यक्तित्व संवरता है सहयोग से,सद्भावना राष्ट्र को  सदा एकजुट रखता है.सहयोग…

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