कविता और कहानी
बन्द करो ‘करोना’ का रोना
बन्द करो #करोना का रोना बनो सनातन कुछ ना होना तन- मन- जीवन हिन्दू हो तो सदा स्वस्थ कोई रोग ना होना करना है तो करो नमस्ते शेक हैंड मत “#करोना” खाना में शाकाहार करो , मांसाहार मत ” #करोना” रोज करो तुलसी का सेवन , धूम्रपान मत ” #करोना” नीम गिलोय का घूंट भरो…
मेरे ज़रूरी काम
जिस रास्ते जाना नहीं हर राही से उस रास्ते के बारे में पूछता जाता हूँ। मैं अपनी अहमियत ऐसे ही बढ़ाता हूँ। जिस घर का स्थापत्य पसंद नहीं उस घर के दरवाज़े की घंटी बजाता हूँ। मैं अपनी अहमियत ऐसे ही बढ़ाता हूँ। कभी जो मैं करता हूं वह बेहतरीन है वही कोई और करे…
हृदय के मोती
डॉ उषा किरण (पूर्वी चंपारण, बिहार ) निशा नहाती ज्योत्सना में, मुग्ध सी कुछ हो रही है। उद्वेलित होते अंतर में , नूतन सी कुछ बो रही है। कुछ कोलाहल हो रहे हैं, दूर अंबर के प्रांगण में। आज फिर लहरा उठा है, कल्पतरु मन के आँगन में। हास…
दुनियादारी
जो खुद से ही अंजान है उसे क्या दुनियादारी समझाई जाए, एहसान जितनों के हैं हम पर चलो उनसे ही यारी निभाई जाए। होगा कभी यूं भी कि वह खुद से दोस्ती कर लेगें बड़े कठिन हैं रास्ते इस मंजिल के चलो खुद को भी समझाया जाए। टूटते, जुड़ते, बिखरते हैं जो शख्स चिंगारियों को…
हो रँग यही अब फागुन का
कविता मल्होत्रा (स्तंभकार-उत्कर्ष मेल) वसँत ऋतु ने अब के बरस ये कैसी दस्तक दी है, चारों तरफ रक्त-रँजित फाग का मँज़र है। कहाँ गया वो मौसम जब हर पखवाड़ा वृँदावन की पावनता से महकता था। आखिर एैसा क्या हो गया कि आज सर्वोत्तम योनि पाकर भी मानव अपनी ही चाल भूल गया है। क्यूँ चाहिए…
दिल्लीे का दर्द आइए मिलकर बाँट लें
डॉक्टर सुधीर सिंह दिल्ली का दर्द आइए मिलकर बाँट लें,शांति के लिए वहां सब सत्प्रयास करें.दंगों का दर्द फिर कभी नहीं उभरे यहां,प्रत्येक हिंदुस्तानीआज दृढ़-संकल्प लें.सनेेह-सहयोग,सद्भावना और क्ष्रद्धा से;अमन-चैन, शांति का प्रादुर्भाव होता है.भाईचारे का भावआमलोगों में आने से,घर-बाहर सर्वत्र प्रेमपुष्प खिल जाता है.प्रेम और प्रेरणा में दिव्य शक्ति होती है,भेदभाव वह कभी अंकुरने नहीं…
रँग भेद (एक कथालेख)
गाँ।व की पगडंडी-उस पर चलती हुई मैं।दूर एक पतली सी नदी बहती है जो पथरीली जमीन से होती हुई एक मैदान में पहुँचती है ।जलधारा कभी बहुत पतली हो जाती है और वर्षा का सहारा ले कभी कुछ चौड़ी और छोटी छोटी तरंगों से युक्त भी।अचानक ही इच्छा हुई उस नदी को देखने की।बच्चों को…
विश्व रेडियो दिवस पर विशेष
यशपाल सिंह रेडियो दिवस के इस अवसर पर जब मैं पिछले 50-55 साल का रेडियो का इतिहास याद करता हूं तो बचपन से लेकर आज तक रेडियो के कई दौर याद आते हैं । गांव की चौपाल में रखा एक बड़ा सा रेडियो, हाथ हाथ में घूमता ट्रांजिस्टर, विविध भारती और बिनाका गीतमाला, अमीन सयानी,…
आलोकित रहे हिंदुस्तान
सलामत रहे सारा जहान। दिलों में बचा रहे ईमान। आसमां के सितारों की तरह, आलोकित रहे हिंदुस्तान।। छल बल से नहीं चलता देश, कुटिल रावण-सा धरो न वेष। कुछ गुंडों के कोलाहल से, कभी बदलता नहीं परिवेश। नभ में कितने मेघ घने हों, परंतु सूर्य निकलता ही है। सत्य पर कई परदे डालो, लेकिन सत्य…
