कविता और कहानी
अ से ज्ञ अलंकृत अनुप्रास
अरुणोदय लालिमा अम्बर पथ सोहेअवनि अंशुमय अंर्तमन मोहे | आभूषित आभामंडल आकाशदीप राशि मेंआध्यात्मिक मन आनंदित आलोकित काशी में | इन्दु रश्मिमयी धरा पुलकित इन्दिवर मन मोहेईश पूजन चली सखियां इंगुर श्रृंगार सोहे | उषाकाल लालिमा भरी क्षितिपथ धरणी उमंगउदित भानु उत्पल खिला उद्यान पुष्प बहुरंग | ऋत्विक ऋजु मनिषी श्रेष्ठ सर्वदाऋषि तप भूमि तट…
शीर्षक-लघु व्यंग झूले के संग
कुछ दिन पहले तीज पार्टी में एक एक सखी ने स्टिकर डाला था जिसमें झूला झूलते हुए आनंद लेते हुए मुझे वह दिन याद आ गए बचपन के दिन जब मैं स्कूल में झूला पंगे डाल डाल कर झूलती थी । हमारा स्कूल में एक झूला विशालकाय था जिसमें तीन तीन झूले थे .लंच के…
जीवन : डॉ.सरला सिंह ‘स्निग्धा’
तेजी से पटरियों के बीचों-बीच दौड़ती हुई एक लड़की, ट्रेन के किनारे-किनारे पटरियों पर पड़े पानी के खाली बोतल उठा-उठा कर अपने बोरे में भर रही थी। कई बार वह गिर पड़ती, फिर से उठती संँभलती और फिर आगे बढ़ जाती। उसकी उम्र भी बमुश्किल कोई सात-आठ साल की रही होगी। नाम मिनी और…
वृद्धाश्रम नहीं, सम्मानाश्रम चाहिए
लेखक : विजय गर्ग समाज की पहचान इस बात से होती है कि वह अपने बुज़ुर्गों के साथ कैसा व्यवहार करता है। आज जब जीवन की गति तेज़ हो गई है, रिश्तों में व्यावहारिकता ने भावनाओं की जगह ले ली है, तब हमारे सामने एक दर्दनाक सच्चाई उभरकर आई है — वृद्धाश्रमों की बढ़ती संख्या।…
‘चालीस रुपये’
“सीमा आज स्कू्ल नहीं गयी ?” “नहीं चाची ,आज काम करते देर हो गयी।” सीमा ने कुछ सकुचाते हुए बंगालिन चाची को जवाब दिया । बंगालिन चाची सारे बच्चों के लिए उनका यही नाम था। वे एक लम्बी सांँवली-सी महिला थीं लेकिन उनका चेहरा अनायास आकर्षित करता हुआ था। धर्म से…
प्रेम की संपूर्णता–डॉ शिप्रा मिश्रा
प्रेम में ऊब-डूब मत देना गुलाब जो मुरझा जाएँ किताबों में रखे सुषमा सौंदर्य मौलिकता सब भूल जाएँ देना इत्र में भीगे गुलाबी पत्र जिसे नोटबुक में पढ़ा जा सके नजरें बचाकर जब जहाँ जैसे जी चाहे रखा जा सके सहेजकर उन तमाम प्रेमी युगल के लिए जानते हैं जो प्रेम की मौन मूक…
यह दिवाली : खुशियों वाली
ये जो इस बार 2025 की दिवाली है बहुत ही खुशगवार और निराली है खूब मज़बूत हो आपसी प्यार और भरोसा उसी से ज़िंदगी गुलज़ार और खुशहाली है प्रदूषण और पटाखों का असहनीय शोर करे है सांसों की डोर को कमज़ोर टा – टा बाय बाय कहो उसको नो मोर फ़िर, चिंता की दरकार ही…
राजनीति का बदलता स्वरूप
-अनीता गौतम (प्रवक्ता एवं साहित्यकार) कैसा लोकतंत्र है यह कैसा प्रजातंत्र है,?? मेरी बात मानो यारों यह तो भीड तंत्र है। कि अधरों पे सिर्फ जहां जाति -धर्म का मंत्र है , खतरे में देखिए आज प्रजातंत्र है। कि तानाशाही ने दबोच रखी गर्दन संविधान की, हम सब तमाशबीन हैं ,माफिया स्वतंत्र है।,,,,,,,, ,,,,,,जी हां…
महकता गुलाब
तुम्हारे कांटे भी तुमको बचा न पाएंगे, इतना मत महको लोग तोड़ के ले जाएंगे। प्यारी सूरत पै तुम्हारी न रहम खाएंगे, तुम्हारे अश्क किसी को नजर न आएंगे, तुम्हारा सीना छेद गूंथ लेंगे माला में, तुम्हारे घाव जरा भी नहीं सहलाएंगे। तुम्हारे दर्दे दिल को देव पर चढ़ायेंगे। इतना मत महको लोग तोड़ के…
