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रेशमा

              रेशमा एक बहुत ही सीधी-सादी लड़की थी । जहां उसके साथ की लड़कियां फ़ैशन ,टीवी और मोबाइल में लगी रहती थी वहीं वह उम्र से पहले ही बड़ी हो चुकी थी। रेशमा का पिता शराबी था वह दर्जी का काम किया करता था परन्तु सारी की सारी कमाई अय्याशी और शराब पर लुटा दिया…

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नाटिका : “मिच्छामी दुक्कडम “

पात्र परिचय: 1 नव्या एक स्कूल गर्ल। उम्र 17 वर्ष2_ नीलू कॉलेज गर्ल उम्र 18 वर्ष3_झलक कॉलेज बॉय उम्र 20 वर्ष4_ मां उम्र 50 वर्ष5 पिता उम्र 54 वर्ष 6 नाना जी (बूढ़े आदमी साधु यानी भिक्षु वेश में) उम्र 75 वर्ष7_ नानी जी (बूढ़ी महिला साध्वी वेश में श्वेतांबरी सफेद साड़ी पहने हुए, मुंह…

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उम्मीदों का वृक्ष

उम्मीदों की चादर में कई सपने दफ्न हो गए। जिन वृक्षो से की थी छाया की उम्मीदे,वो छाया पतझड़ आने पर खुद ही कहीं गायब हो गयी।। जीवन के गुजरते पलो में अक्सर ऐसा हुआ। शुखे मुरझाये वृक्षो से भी कई बार ठंडी हवाओं का अनुभव हुआ , शायद गिर रहे थे जो पत्ते उन्होंने…

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उचित फीस

लॉक डाउन के समय में अपने बच्चों की पढ़ाई खराब होने का डर शर्मा जी को लगातार हो रहा था।फिर कुछ खबर आई कि बच्चों की पढ़ाई ऑनलाइन होगी।अब शर्मा जी को कुछ तस्सली हुई।उन्हें लगा शायद अब बच्चों का 1 साल खराब होने से बच जाएगा।ऑनलाइन पढ़ाई शुरू होने के कुछ दिनों बाद ही…

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सच्चा है एक प्यार तुम्हारा

सच्चा है एक प्यार तुम्हारा। बाकी तो सब यहाँ  झूठ हैं।। फैला हिय दीपक उजियारा। बाकी तो सब भृम रूप हैं।। इत उत ढूंढे कण कण में। पल्लवित तेरा ही स्वरूप है।। मूढ़ मन को समझ न आये। गूढ़ तेरा हर मन रूप हैं।। नैनो में दर्शन की चाह । तू नैनो में ही समाया…

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सफलता की दौड़ में बुनियादी शिक्षा का पतन

डॉ विजय गर्ग  आज का समय प्रतिस्पर्धा का समय है। हर विद्यार्थी, हर अभिभावक और हर संस्थान एक ही लक्ष्य की ओर भाग रहा है—सफलता। लेकिन इस अंधी दौड़ में एक महत्वपूर्ण प्रश्न धीरे-धीरे पीछे छूटता जा रहा है: क्या हम वास्तव में शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं, या केवल परीक्षा पास करने की कला…

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यम द्वितीया का पौराणिक महत्व

 भारत त्योहारों का देश है। हिंदू धर्म में सभी त्योहारों का कोई ना कोई पौराणिक महत्व होता है ।सभी त्योहार किसी न किसी घटना से संबंधित होते हैं। कभी -कभी घटनाएं परंपराएं बन जाती है। सतयुग से कलयुग तक  हिंदू धर्म में कई परंपराएं आज भी ज्यों कि त्यों चली आ रही हैं।  आज भी…

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कभी मौन भी : पूनम पाठक

कभी मौन भी हो सकता है बेअसरभले स्वर अनोखा भाषा अलगमौन रहकर भी देखा है कभीक्योंकि इसकी प्रज्ञा प्रखरआंखों की भी जुबां होती हैफिर भी मौनी पर होता प्रहारकब तक मौन रह सकता है कोईभला आधुनिक दुनिया मेंपल-पल सहता रहे कष्टमहसूस ना हो किसी को तनिकआखिर कब तक ऐसा करे कोईमौन रहने पर दिल टूटता…

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एक खुली चिट्ठी प्रधानमंत्री मोदी के नाम

आदरणीय महामना मान्यवर मोदी जी आपको इस वर्ष के पहले दिन से ही मन की बात एक आम नागरिक के तौर पर कहना चाह रहा था।कुछ अच्छा होने की आशा कीइंतजार करते करते थक कर आज लिख रहा हूं!बहुत ही अच्छा लगा था,जब आप पहली बार प्रधानमंत्री के रूप में शपथ लेनेसे पहले लोकतन्त्र के…

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कितनी कड़वी हैं सच्चाइयाँ

कितनी कड़वी हैं सच्चाइयाँ गिर रहीं नीचे ऊँचाइयाँ कोयलों के बाइक कंठस्वर चढ़ी नीलाम अमराइयाँ  बद हुये मौसमों के चलन हुयीं गुमराह पुरवाइयाँ  दिन ढले घर में अहसास के स्यापा करती हैं तनहाइयाँ आदमी कद में बकमतर हुआ बढ़ गयीं उसकी परछाइयाँ गिरना तय है जिधर जायेंगे उधर खंदक इधर खाइयाँ होश आयेगा ‘महरूम’ जब…

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