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काश हर चीज़ गुलाबी हो जाती

काश हर चीज़ गुलाबी हो जाती फिर अन्य रंगों का क्या होता इंद्रधनुष में सात रंगी न होता आसमां नीला न होता और फूल,फल सब बहुरंगी न होते पत्तों का रंग हरा न होता न ही धरती अंतरिक्ष से काली दिखती न ही अंधेरे का कोई सम्राज्य होता। काश हर चीज़ गुलाबी हो जाती गोरी…

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पेंशन का अधूरा वादा: भारत के बुज़ुर्गों के लिए सामाजिक सुरक्षा की लड़ाई

भारत आज जनसंख्यिकीय संक्रमण के उस मोड़ पर खड़ा है, जहाँ युवाओं की अधिकता के पीछे छिपी एक चुप्पी है — बुज़ुर्गों की बढ़ती आबादी, जिनके पास न आय का स्रोत है, न सामाजिक सुरक्षा का भरोसा। जिस देश में “बुजुर्गों को आशीर्वाद का भंडार” माना जाता है, वहाँ उनकी वृद्धावस्था की सबसे बड़ी सच्चाई…

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कुंडलियां – अजय कुमार पाण्डेय

बूंद नीर की थी गिरी, भर आए दो नैन मन है कैसा बावला, क्यों होता बेचैन क्यों होता बेचैन, हृदय में पीड़ा होती अधरों पर मुस्कान, नैनों में अश्रु मोती हिय पर्वत को लांघ, लहर थी उठी पीर की दो पलकों के बीच, टिकी थी बूंद नीर की। बिन मौसम बारिश हुई, बादल गरजे खूब…

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कालजयी रचनाकार बंकिमचन्द्र चटर्जी-राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम्’ के प्रणेता

*(26 जून जन्मदिवस के बहाने)* पहले कलकत्ता में कवियों कलाकारों का भी अपना एक दौर था, जो अपने इस समाज में निस्संदेह सबसे ऊपर और लोकवरेण्य माना जाता था। कलकत्ता का बंगाली समाज आज भी अपने मुकुट के रूप में इसी वर्ग को धारण करता है। बंगाल के लोग अपनी अस्मिता की पहचान आधारभूत तौर…

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हरियाणा सरकार के बाबा बंदा सिंह बहादुर की स्मृति में स्मारक निर्माण की दिशा में बढ़ते कदम

मृत्यु एक अटल सत्य है, लेकिन ऐसे कम ही होते हैं जो शोषितों के अधिकारों और न्याय के लिए संघर्षपूर्ण जीवन जीते हुए किसी भी बलिदान के लिए तैयार हो जाते हैं। ऐसे ही एक योद्धा लक्ष्मण दास/माधोदास (बाबा बंदा सिंह बहादुर) का जन्म 27 अक्टूबर 1670 को राजौरी (जम्मू-कश्मीर) में राम देव के घर…

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मैं भी एक इंसान हूँ, बस पुरुष हूँ

माँ,कभी एक पल को ठहरकर सोचना,तेरा बेटा भी एक इंसान है…हाँ, वो बेटा जिसे तूने बचपन में गिरने से पहले पकड़ लिया था,पर अब जब वो टूट रहा है… तो कोई नहीं देखता। आजकल ज़माना बदल गया है,अब हर पुरुष या तो अपराधी है या अपराधी घोषित कर दिया गया है।समाज में एक ऐसा तबका…

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भारतीय संयुक्त परिवारों की पृष्ठभूमि है  : विजय गर्ग

भारतीय संयुक्त परिवारों की पृष्ठभूमि उस मानवीय संवेदना से जुड़ती है, जिसमें सारे संसार को अपना परिवार माना जाता है। हजारों वर्षों से भारतीय परिवारों की पहचान धन, पद, संपत्ति से नहीं रही है, बल्कि उनमें निहित मूल्यों, विश्वासों, नियमों और संकल्पनाओं से रही है। यहां तक कि राजतंत्र में भी परिवारों का महत्त्व उसी…

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क्या हो गया है इन औरतों को?

“जब कोई महिला अपराध में शामिल होती है, तो समाज उसकी परवरिश, चरित्र और कोमलता पर सवाल उठाता है, जबकि पुरुष अपराधियों को अक्सर सहानुभूति या ‘दबंगई’ का जामा पहनाया जाता है।  अपराध का कोई लिंग नहीं होता और स्त्री भी इंसान है — जिसमें अच्छाई-बुराई, स्वतंत्रता और जिम्मेदारी, सब कुछ समाहित है। समाज को…

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शोषक भी हम – शोषण भी हमारा, फिर न्याय के लिए भटकना कैसा..!

पंकज सीबी मिश्रा  / राजनीतिक विश्लेषक़ एवं पत्रकार जौनपुर यूपी  स्टार्टअप से बात शुरू हुई औऱ जज के घर करोड़ों के अधजले नोट मिले, मुद्रा लोन को बढ़ावा दिया जाना था औऱ अडानी को अरबों का लोन मिला, स्वरोजगार की बात चली औऱ सरकारी नौकरियों को कम कर दिया गया। रोजगार देने वाले 70% से…

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सोनम-राजा रघुवंशी की कथा ने हिला दिया समाज

राजनीतिक सफरनामा कुशलेन्द्र श्रीवास्तव सोनम और राजा रघुवशी की कहानी ने आम लोगों को चिन्तित कर दिया है । लगातार घट रही ऐसी घटनाओं से समाज का चिन्तित होना जायज भी है । ऐसा भी अनुमान लगाया जा सकता है कि बहुत सारी ऐसी घटनायें भी होतीहोगीं जो समाज के सामने नहीं आ पा रहीं…

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