पिता को नमन और वन्दन करता हूँ (कविता 5)
जिनके मन की भाव तरंगें आसमान को छू आती थी जिनके अनुशासन की छाहै मेरी सत्य दिशा दात्री थी। जिसने मेरी अगुली पकडी और मुझे चलना सिखलाया जिसने धरती पर लिख लिख वर्णो से परिचय करवाया।। जिसने मुझको जीवन देकर मानवता का पाठ पढ़ाया अन्तर्मन में ज्योति जलाकर अन्धकार से बाहर लाया ।। सत्य निष्ठ…
