नारी (कविता-7)
हम नारी आज की हो या कल की सब को साथ लेकर चलती हैं अपने सच्चे मन से बड़े जतन से खेल गुडिया का हो या हो प्रसाद की पुडिया मायेका हो या ससुराल सब कुछ साँझा करती हैं प्यार , दुलार या हो उपहार खुद अपने लिए छाटती नहीं काट -छाट से बचा रख लेती…
