पंकज सीबी मिश्रा / राजनीतिक विश्लेषक एवं पत्रकार जौनपुर यूपी
सदाचारी जीवन की समग्रता ही श्री कृष्ण है। इसलिए हमारे शास्त्रों ने भगवान श्री कृष्ण को सोलह कलाओं से परिपूर्ण बताया। श्री कृष्ण होना जितना कठिन है श्री कृष्ण को समझना उससे भी कहीं अधिक कठिन है। भगवान कृष्ण का जन्म मथुरा में हुआ था, लेकिन उनके माता-पिता, देवकी और वसुदेव को कंस से बचाने के लिए उन्हें गोकुल में यशोदा मैया और नंद बाबा के पास छोड़ दिया जो यह बताता है कि विपत्तिया परिस्थिति जन्य होती है।गोकुल में उन्होंने अपना बचपन बिताया, जो अनगिनत मनमोहक लीलाओं से भरा है जिसका अर्थ है जीवन में सचेतक कार्यों का निर्धारण बना रहने देना चाहिए। कृष्ण जन्माष्टमी पर कृष्ण की लीलाओ में:-
माखन की चोरी: कृष्ण को “माखनचोर” या “नवनीतचोर” के नाम से जाना जाता है क्योंकि उन्हें माखन (मक्खन) बहुत पसंद था। वे अक्सर गोपियों के घरों से माखन चुराते थे। माखन सहजता का प्रतिक है और सहजता की चोरी आपको सर्वप्रिय बनाता है।
मटका फोड़ने वाला कान्हा : वे अपने दोस्तों के साथ मिलकर मटकियाँ फोड़ते, माखन खाते और दूसरों को भी खिलाते थे। मटकी फोड़ने का अर्थ था मिट्टी के बर्तन का एक बार ही उपयोग करो।
शरारतें और शिकायतें: कृष्ण केवल माखन ही नहीं चुराते थे, बल्कि अन्य कई शरारतें भी करते थे। वे गोपियों के वस्त्र हरण कर गए, जिसका अर्थ था कभी वस्त्रहीन स्नान नहीं करना चाहिए।
पूतना वध: कृष्ण के बचपन की सबसे महत्वपूर्ण घटनाओं में से एक है राक्षसी पूतना का वध, कंस ने पूतना को कृष्ण को मारने के लिए भेजा था, लेकिन नन्हे कृष्ण ने उसे स्तनपान करते हुए ही मोक्ष प्रदान कर दिया। जिसका अर्थ था केवल सत्य सुलभ चीजे अपनाना घातक होता है।
शकटासुर और तृणावर्त वध: कृष्ण ने बचपन में ही कई अन्य राक्षसों का भी संहार किया, जैसे शकटासुर (जो एक गाड़ी का रूप धरकर आया था) और तृणावर्त (जो एक बवंडर के रूप में आया था)। ये घटनाएँ दर्शाती हैं कि प्राकृतिक आपदा आये तो बचाव एयर प्रतिकार दोनों के लिए समय का इंतजार ना करें।
मिट्टी खाने की लीला: एक बार कृष्ण ने मिट्टी खा ली थी, जिस पर यशोदा मैया ने उन्हें मुँह खोलने को कहा। जब कृष्ण ने अपना मुँह खोला, तो यशोदा मैया को उसमें ब्रह्मांड, ग्रह, तारे और सारे देवी-देवता दिखाई दिए। इस घटना ने यशोदा मैया को कृष्ण के ईश्वरत्व का एहसास कराया जबकि भगवान नें बताया की इस चर जगत में अचर केवल कृष्ण है।
रास लीला: हालांकि रास लीला का पूर्ण रूप कृष्ण के युवावस्था में देखने को मिला, बचपन में भी वे गोपियों के साथ छोटे-मोटे नृत्य करते और उन्हें अपनी बांसुरी से मोहित करते थे।
कृष्ण के बचपन की ये कहानियाँ न केवल मनोरंजन करती हैं, बल्कि प्रेम, विश्वास और भक्ति के गहरे संदेश भी देती हैं। ये लीलाएँ भारतीय संस्कृति और अध्यात्म का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।
युद्ध और प्रवचन : लड़ना भगवान श्रीकृष्ण के जीवन से सीखना चाहिए। मनुष्य सबका विरोध करता है लेकिन दो स्थानों पर यह विरोध करने का सामर्थ्य खो बैठता है। पहला जब विरोध अपनों का करना पड़े और दूसरा जब विरोध किसी सामर्थ्यवान, शक्तिवान का करना पड़े। भगवान श्रीकृष्ण का जीवन तो देखिये, उन्होंने अनीति के खिलाफ सबसे अधिक अपनों का और सर्व सामर्थ्यवानों का ही विरोध किया।
निष्पक्ष रहकर सत्य का पक्षपात एक श्रेष्ठ कला : श्रीकृष्ण द्वारा सदैव कुरीतियों और कुनीतियों का विरोध किया गया। सात वर्ष की आयु में इन्द्र को ही चुनौती दे डाली और उसके व्यर्थाभिमान को नष्ट किया। अपने ही कुल के लोग जब कुमार्ग पर चलने लगे तो श्रीकृष्ण द्वारा बिना किसी संकोच व मोह के उनका भी परित्याग कर दिया गया। अत: अन्याय, अत्याचार और अनीति का विरोध ही श्रीकृष्ण का सच्चा अनुसरण होगा।
गीता और योगेश्वर : श्री कृष्ण के ऊपर केवल एक पक्षीय चिंतन नहीं होना चाहिए। कुछ लोगों द्वारा उन योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण के केवल एक पक्ष को जन मानस के समक्ष रखकर उन्हें भ्रमित किया जाता है। श्री कृष्ण समग्र हैं तो उनके जीवन का मुल्यांकन भी समग्रता की दृष्टि से होना चाहिए, तब कहीं जाकर वो कुछ समझ में आ सकते हैं। कृष्ण विलासी हैं तो महान त्यागी भी हैं। कृष्ण शांति प्रिय हैं तो क्रांति प्रिय भी हैं। कृष्ण मृदु हैं तो वही कृष्ण कठोर भी हैं। कृष्ण मौन प्रिय हैं तो वाचाल भी बहुत हैं। कृष्ण रमण विहारी हैं तो अनासक्त योग के उपासक भी हैं। श्री कृष्ण में सब है और पूरा पूरा ही है। पूरा त्याग-पूरा विलास। पूरा ऐश्वर्य-पूरी लौकिकता। पूरी मैत्री – पूरा बैर। पूरी आत्मीयता – पूरी अनासक्ति। जिस प्रकार दीये द्वारा दिवाकर का मुल्यांकन नहीं हो सकता, उसी प्रकार तुच्छ बुद्धि से उस समग्र चेतना का मुल्यांकन भी नहीं हो सकता क्योंकि कृष्ण सोच में तो आ सकते हैं मगर समझ में नहीं। जिसे सोचकर ही कल्याण हो जाए उसे समझने की जिद का भी कोई अर्थ नहीं। जिसे सीमित शब्दों में परिभाषित किया जा सके वो कभी भी कृष्ण नहीं हो सकता, क्योंकि कृष्ण होने का अर्थ ही यह है कि जिसके लिए सारे शब्द कम पड़ जाएं व सारी उपमाएं छोटी। जिसकी महिमा जितनी गाई जाए उतनी ही कम लगती है। जो दूसरों के चित्त को अपनी ओर आकर्षित करे वो श्री कृष्ण है।
