हारी, थकी, उदास निगाहें जाग रहीं,
ज़ख्म सो गए मगर कराहें जाग रहीं।
अब वे रातें सपनों जैसी लगती हैं,
हमें सुलाकर गोरी बाहें जाग रहीं।
चिंता करते-करते चिता हो गए हम,
राख में अब भी बिखरी चाहें जाग रहीं।
बेदम होकर झपकी लेते पाँवों में
कब से उलझी-उलझी राहें जाग रहीं।
कबके उजड़े उम्मीदों के बिस्तर पर,
अब भी हैं कुछ ठंडी आहें जाग रहीं।
