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पौरुष पीड़ा,  .…

      *हाॅं मैं भी इंसान हूॅं*

हॉं मैं पुरुष हूॅं मान हूॅं मुझे भीसम्मान हे।

पौरूष का मुझमें भी निज अभिमान हे !

कठोरबल पराक्रमशक्ति साहस परिपूर्ण ।

अहंकार है मुझ में गर्व अपनी में आन हूॅं ।

कठिन हूॅं जटिल हूॅं मान भर ये शान है।

करता मैं निजता में भी पूरा अभिमान हूॅं

नहीं रोता नहीं दिखाता कभी किसी को।

मुझ में भरा ऐसा हरदम  स्वाभिमान है।

हां मैं भी पुरुष हूॅं और इंसान हूॅं…….

निर्मम हूॅं कभीकहीं भी ऑंसुओं को नहीं।

 दिखाता ऐसी ही मेरे लिए रखते सोच है।

संवेदनाओं की कमी है मुझमें बहुत-बहुत

ऐसा जाने क्यों ये सबको अपना लगता है।

पर  हूॅं नहीं मैं ऐसा, जैसा  में दिखाता हूॅं ।

जब बन बेटा मॉं के हृदय से भीलगता हूॅं।

तब मॉं मेरी प्यारी जीवनपहचान होती है।

मैं उसका वह मेरी हरदम भीजान होती है।

नहीं दूरी में उससे में  कभी भीसह पाता ।

बिलख -बिलख कर फिर दिल से रोता हूॅं।

उसके सुख दुःख से भी मेरा  अधिकार है ।

इस प्यार भरी ममता की छाॅंव में सोता हूॅं।

हां मैं पुरुष हूॅं हूऔर इंसान हूॅं..…….

ये सरल नहीं है मैं एक भाई बनता  हूॅं तो।

जिम्मेदारी सी होती है जबभी इसे निभाने।

 में मैं थोड़ा कठोर हृदय  फिर बन जाता हूॅं।

वह होती वह दूर तो कलेजा भीयूं फटता है।

जैसे मैं बड़ा होता जाता में यह भी सिखाया।

जाता है रोना नही ये तुम्हारी भी कमजोरी है।

ऑंसुओं को अब सबसे खुदसे भी छुपाता हूॅं।

नहीं किसी को कुछ बात भी मन से पाता हूॅं।

हां मैं भी पुरुष हूॅं इंसान हूॅं…..

स्कूल कॉलेज में कितना कुछ होता रहता है ।

दिल रोता आंसुओं से ना कुछभी कहता है ।

पहले मॉं से बोलकर हल्का भी होजाता था ।

अब मन ही मन दुःखी -दुःखी सामें रहता हूॅं।

अब दोस्त मिले तो उनके संगसंगही जीता हूॅं ।

हॅंसता हूॅं पर दुःख के भाव अब भीछुपाता हूॅं ।

धीरे-धीरे आदत सी पड़ने लगती है खुद कीये।

नाजुक दिल कैसे अब कठोर सा बन जाता है।

हां मैं भी पुरुष हूॅं इंसान हूॅं……..

कितना कुछ सहता हूं बस अब सब छुपाते।

जाता हूॅं मन की बात मन में हीरखकर देखो।

 खुद से खुदको कभी नहीं में मिला पाता हूॅं।

 मिले प्रेमिका जीवन खुशी से भर जाता हूॅं।

लगता  है जीवन में जैसे बहार सीआई हो।

जब वहां से तो जीवन हंसता गाता  रहता।

जब दूर जाए तो दिल फिर से रोता रहता ।

टूट जाता दिल पर कठोर फिर हो जाता हूॅं।

हां मैं भी पुरुष हूॅं हूं इंसान हूॅं……..

प्रीत बने पत्नी तो निखर सा अब में जाता हूॅं।

नहीं तो मां बाप के लिए एक यह समझौता।

कर पत्नी के अपनापन से सबभुला देता हूॅं।

उसके प्यार त्याग समर्पण के सामने खुद भी

 खुद को बेबस पाता हूॅं, पर नहीं मिले दोनो

 के मन तोमन  ही मन मैं तोबिखर जाता हूॅं ।

जब बनूं बाप तो जिम्मेदारी सी मन आती है

बच्ची बच्चों से मन में करुणा उपज आतीहै।

हां मैं भी पुरुष हूॅं इंसान हूॅं।

निभासकूं फर्ज इस से कठोर कर्म करता हूॅं ।

यदि ना निभा पाऊं तो पीड़ा मन में होती है।

जब जाते हैं मां-बाप तो  रो भी ना पाता हूॅं ।

ना कर पाऊं पूरी जिम्मेदारी तो भी रोता हूॅं।

 बेटी विदा होती करेजा सा फट सा जाता है

तभी भी मैं कठोर  हृदय फिर  कह लाता हूॅं।

जीवन के हर सुखदुःख मेये अनुभूति होती है

 ऐसा बनाया है मैं कठोरहृदय सा हो जाता हूॅं।

हां मैं भी पुरुष हूॅं इंसान हूॅं…..…

सबकुछ सह कर भी मैं चुप -चुप रह जाता हूॅं।

अपने ऊपर लगी ये तोहमत को सह जाता हूॅं।

जब मैं बाप बन जाता हूॅं  बाप की पीड़ा को ।

समझ जाता हूॅं कह नहीं पाता हूॅं कभी भी ये।

सही कहा है  ये जाके पैर ना फटी बीमाई तौ

का जाने फिर वह पीर पराई पीर पराई…. ‌।।

हां मैं भी पुरुष हूॅं इंसान हूॅं…… डॉक्टर अरुणा पाठक आभा   

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