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वही सच्चे मजदूर हैं

एक व्यक्ति

अपने गाँव से एक किलोमीटर दूर,

पहाड़ों की तलहटी में जाकर

बार-बार हथौड़ा उठाता है,

और पूरी ताकत से

पत्थर पर प्रहार करता है।

पत्थर को तोड़कर

छोटे-छोटे टुकड़ों में बाँटता है,

उन्हें वर्गाकार आकार देता,

दोनों हाथों से उलट-पलट

चौकोर शिला-खण्ड सजाता है—

तब जाकर मिलती है मजदूरी,

जिससे चलता है उसका घर।

उसे ही हम कहते हैं—

मजदूर।

पत्थर तोड़ते समय

जिसकी देह

पसीने के तालाब में डूब जाती है,

जो पानी से कम

पसीने से अधिक नहाता है।

हथौड़ा चलाते-चलाते

हथेलियों में पड़ जाते हैं छाले,

मिट जाती हैं वे रेखाएँ

जिन्हें लोग अपना भाग्य कहते हैं।

वह केवल और केवल

मेहनत को ही मानता है नसीब।

खून-पसीना बहाकर

कमाता है दो वक्त की रोटी।

माथे पर काले, घुँघराले बाल—

पर कंघी की फुरसत कहाँ!

आईना भी उसके नसीब में नहीं,

वह सूरत से अधिक

सीरत को देता है महत्व।

परमात्मा पर अटूट विश्वास,

झूठ से कोसों दूर—

आँखों में स्नेह की झलक,

हृदय में मानवता की अविरल नदी।

संतोष ही उसका आभूषण,

मन में असंतोष की लहर

कभी पनपती नहीं।

विपदा को सीने से लगाकर

आराम से सो जाता है।

बेदाग चरित्र, निष्कपट हृदय—

‘किंतु-परंतु’ जैसे शब्द

मन में स्थान नहीं पाते।

इरादे नेक,

भ्रष्टाचार से कोसों दूर—

वही है मजदूर।

पत्थर तोड़ते समय

तेज़-तेज़ साँस तो लेता है,

पर थककर हार नहीं मानता।

उसकी छाती फौलादी,

हथौड़े के एक प्रहार से

पत्थर का सीना चटक जाता है।

उसकी शक्ति देखकर

पहाड़ भी झुक जाते हैं,

हथौड़े की गूँज से

हवा भी रुख बदल लेती है।

ऐसे होते हैं मजदूर।

जब कभी अंगुली कट जाती है,

टप-टप कर रक्त गिरता है,

पर मरहम कहाँ!

मिट्टी का चूर्ण लगाकर

रोक लेता है लहू की धार।

मुख से पीड़ा का स्वर नहीं निकलता,

कदम काम से पीछे नहीं हटते—

पेट की अग्नि जो बुझानी है।

ईमानदारी उसका आभूषण,

परिश्रम उसका धर्म,

और कर्म ही उसकी पहचान—

वही सच्चे मजदूर हैं।

   स्वरचित –

तेज नारायण राय,

दुमका, झारखंड,

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