Latest Updates

एसआईआर का घमासान : कुशलेन्द्र श्रीवास्तव

राजनीतिक सफरनामा

बिहार राज्य में एसआईआर को मिली अपार सफलता के बाद अब चुनाव आयोग ने देश के अन्य बारह राज्यों में एसआईआर सर्वे कराना शुरू कर दिया है । एसआईआर सर्वे को लेकर विपक्ष की त्यौरियां चढ़ी हुई हैं तो जाहिर है कि घमासान मचा हुआ है । दरअसल एसआईआर सर्वे को लेकर विपक्ष यह मान चुका है कि यह सर्वे केवल उसके मतदाताओं को मतदाता सूची से अलग करने के लिए हो रहा है बस इसी बात को लेकर वे सर्वे का विरोध कर रहे हैं । बिहार चुनाव में हुई पराजय का श्रेय भी वे इस सर्वे को दे रहे हैं और इस बात की संभावना व्यक्त कर रहे हैं कि आगामी राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनावों में भी उन्हें एसआईआर सर्वे के कारण पराजय मिल सकती है । इधर चुनाव आयोग तो मौन है, वह कम बोलता है और काम ज्यादा करने का प्रयास करता है पर उसके कम बोलने के कारण भी दिक्कत खड़ी हो रही है । कांग्रेस के नेता राहुल गांधी ने जिस तरह से मुख्य चुनाव आयुक्त से सीधे टकराव लिया है तो चुनाव आयोग का जबाव सुनना भी चाहते हैं पर वह मौन है । वैसे चुनाव आयोग तो पूर्व में ही एसआईआर सर्वें को संवैधानिक प्रकिया बता कर सर्वे करने के अपने अधिकार को रेखांकित कर ही चुका है । तो साफ है कि अब सर्वे तो होगा ही । वेसे आम मतदाता तो यह ही समझता है कि ऐसा सर्वे उन मतदाताओं को हटाने के लिए हो रहा है जो या तो दिवंगत हो चुके हें अथवा बाहर चले गए हैं । ऐसे मतदताओं के कारण ही मतदाता सूची लम्बी भी हो जाती है और मतदान प्रतिशत का आंकड़ा भी कम रह जाता है । बिहार चुनाव में मतदान प्रतिशत बढ़ा तो यह माना गया कि बिहार में सर्वे वाली शुद्ध-पवित्र मतदाता सूची थी जिसके कारण मतदान प्रतिशत बढ़ा हुआ दिखाई देने लगा यदि इसमें वो तो करी 70-75 लाख वोटर विभिन्न कारणों से हटाए गए थे यदि वे जुड़े रहते तो यह प्रतिशत कम ही प्रदर्शित होता । मतदाता सूची को साफ-सुथरी रखना तो जरूरी है तो चुनाव आयोग इसके लिए सर्वे करा रहा है । विपक्ष के आरोप उतने तार्किक समझ में नहीं आ रहे हैं क्यांकि शुद्ध मतदाता सूची से होने वाले चुनाव उनके लिए कैसे परेशानी का कारण बन सकते हैं ? पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री सबसे अधिक विरोध में है । पश्चिम बंगाल में कुछ ही महिनों के बाद चुनाव होना हैं और वहां यह माना जाता रहा है कि बंगलादेश से आए हुए बहुत सारे परिवार रह रहे हैं जो फिलहाल मतदाता सूची में शामिल हैं और ये वे मतदाता हैं जो ममता बनर्जी की पार्टी को वोट देते हैं । यदि एसआईआर सर्वे के बाद इनके नाम काट दिए गए तो टीएमसी को अपनी सत्ता बचाए रखने में कठिनाई होगी । बहरबहाल ऐसा तो केवल माना जाता है वास्तिवकता की कसौटी पर अब यह सामने आएगा । सर्वे के बाद यदि बहुत सारे नाम कट गए तो यह माना जा सकता है कि चर्चाएं सहीं थीं अन्यथा नहीं । ममता बनर्जी विरोध कर रहीं हैं, वे इसके खिलाफ आंदोलन भी कर रहीं हैं, पदयात्रा भी कर रहीं हैं पर इसके क्या मायने निकलेगें कोई नहीं बता सकता, क्योंकि चुनाव आयोग तो स्वतंत्र है और उसे देश के हर राज्य में अपनी इच्छानुसार कार्य करने की स्वतंत्रता है । वह कहीं भी किसी भी राज्य में किसी भी तरह से ‘‘चुनाव को निश्पक्ष बनाने’’ के नाम पर कार्य कर सकता है तो वो कर रहा है, इसमें राज्य सरकार कैसे रोक लगायेगी यह समझ के परे है । पश्चिम बंगाल में हो रहे एसआईआर सर्वे के कार्य से भाजपा सबसे अधिक प्रसन्न है । वह इसकी मांग करती रही है । अब जब सर्वे होने लगा है तो वह पूरी ताकत से इस कार्य में सहभागिता निभा भी रही है । वह चुन-चुन कर ऐसे संदिग्ध मतदाताओं को हटाने का प्रयास कर रही है । भाजपा के कार्यकर्ता और छोटे-बड़े नेता सभी एसआईआर सर्वे के काम में गंभीरता दिखा रहे हैं । वैसे तो पश्चिम बंगाल एसआईआर सर्वे को लेकर अब अखाड़ा बन चुका है । यह तो सुनिश्चत ही है कि वहां सर्वे होगा ही चुनाव आयोग अपना काम वहां के कर्मचारियों से करायेगी ही पर तय यह भी है कि ममता बनर्जी और उनकी पार्टी टीएमसी इसका विरोध करती रहेगीं भले ही इस विरोध के कोई मायने न निकलें । विरोध अकेला पश्चिम बंगाल में ही नहीं हो रहा है विरोध के स्वर उत्तर प्रदेश से लेकर मध्यप्रदेश सहित अन्य राज्यों में भी हो रहा है । कांग्रेस के साथ ही साथ लगभग सभी विपक्षी दल इसका विरोध कर रहे हैं और इस बात की शंका जाहिर कर रहे हैं कि एसआईआर सर्वे के बाद जानबूझकर बहुत सारे मतदाताओं के नाम काट दिए जायेगें । अब यह बात भी रखी जा रही है कि पीडीए के नाम काटने के लिए सर्वे कराया जा रहा है जो मूलतः विपक्ष का वोट बैंक है । विरोध इस बात को लेकर भी हो रहा है कि एसआईआर सर्वे को नियत समयबद्ध ढंग से क्यों किया जा रहा है । जिन राज्यों में अभी चुनाव को समय हे वहां इतनी जल्दबाजी क्यों की जा रही है । वैसे यह बात तो सभी जानना चाहेगें कि अचानक एसआईआर सर्वे को लेकर इतनी मारा-मारी क्यों की जा रही है । कम समय में काम निपटाने के जो निर्देश सर्वे से जुड़े कर्मचारियों को दिए जा रहे हैं वहां आपाधापी जैसा माहौल बना रहा है । काम करने वाले बीएलओ को भी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है और मतदाताआेंं को भी हड़बड़ाहट है । यदि इस सर्वे को पर्याप्त समय दिया जाए तो और बेहतर काम हो सकता है । देश में करीब दो दर्जन बीएलओ की हो चुकी मौतें भी अब विपक्ष के निशाने पर हें । बताया जाता है कि कई बीएलओ काम के दबाव को सहन नहीं कर पार रहे हैं तो वे आत्महत्या जैसा कदम उठा रहे हैं, वहीं अधिकारी उनको समय पर काम पूरा करने का दबाव भी बना रहे हैं और धमकी भी दे रहे हैं । कई बीएलओ पर एफआईआर दर्ज कराने की भी जानकारी है । सर्वे का काम करने वाले कर्मचारी या तो शिक्षक हैं या तृतीय श्रेणी के कर्मचारी जो अधिकाारयों की हर एक धमकी को गंभीरता से ले लेते हैं, वैसे भी चुनाव के काम में लापरवाही नहीं होनी चाहिए की मानसिकता उनकी बनी ही हुई है । एसआईआर सर्वे को लेकर जो आपाधापी मचाई गई है वह अनावश्यक ही समझ में आ रही है जो कर्मचारी इससे प्रताड़ित होकर असमय कालकवलित हो रहे हैं वे विपक्ष के लिए मुद्दा बनते जा रहे हैं । कुछ विपक्षी दल इस बात को लेकर ही विरोध कर रहे हैं कि सर्वे के लिए कम समय क्यों दिया जा रहा है । धरातीलय रूप से भी ऐसा सोचा जा सकता है कि हजार-बारह सौ मतदाताआेंं का सर्वे करने में निर्धारित किया गया समय कम है फिर इस बार तो 2003 की मतदाता सूची को आधार बनाया गया है तो इसमें कुछ ज्यादा ही समय लग रहा है । मतदाता को सूची में अपना नाम भी देखना है, फिर परिवार के सदस्यों के नाम भी मिलाना है और 2003 के बाद जो नया सदस्य परिवार में आया है उसका नाम भी दर्ज करना है ऐसे में समय लगना तो स्वाभिवक ही है तो क्या इसे पूरे काम को करने के लिए दो-तीन माह का समय नहीं दिया जा सकता था ? चुनाव आयोग को इस बारे में सोचना तो जरूर चाहिए क्योंकि अभी बिहार जैसी जल्दबाजी की कोई आवश्यकता नहीं है । बिहार में भी इस बात को लेकर विरोध होता रहा कि सर्वे के लिए कम समय दिया गया और वो समय वरसात का भी था तो बीएलओ को काम करने में दिक्कत भी आई ? इस बात से सबक लेकर चुनाव आयोग को अन्य राज्यों के सर्वे का समय बढ़ा दिना चाहिए था । काम के दबाव में जो लोग असमय कालकवलित हो रहे है ंकम से कम उनकी जान तो बच जाती । एक बीएलओ ने इस बात को लेकर आत्महत्या कर ली कि उसे उसकी ही शादी के लिए अवकाश नहीं दिया जा रहा था, उसने अपनी शादी के एक दिन पहले फांसी लगा ली ? इसे तो अन्याय की श्रेणी में माना जाना चाहिए और मानव अधिकार आयोग को भी एक्शन लेना चाहिए । हर एक शासकीय कर्मचारी सर्वे का काम अतिरिक्त काम के रूप में कर रहा है और अतिरिक्त काम में दबाव नहीं दिया जा सकता । प्रायोगिक रूप से बीएलओ को ऐसा आदेश दिया भी गया है कि वे अपने काम करने के अतिरिक्त यह काम करेगें पर काम इतना गहन है कि और समयबद्ध है कि वे अपना ओरीजनल काम कर ही नहीं कर सकते यदि वे ऐसा करेगें तो सर्वे का काम पिछड़ जाएगा । इस कारण से हर एक बीएलओ को दिन-रात इस सर्वे के काम में लगा रहना पड़ रहा है जो उनके मानसिक तनाव का कारण बन रहा है । इसमें इस बात पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए कि सर्वे के काम में ज्यादातर शिक्षक वर्ग ही लगा हुआ है, जो स्कूल न जाकर सर्वे का काम कर रहे हें । शिक्षक स्कूल नहीं जा पा रहे हैं तो विद्यार्थियों की पढ़ाई भी प्रभावित हो रही है । वार्शिक परीक्षा अब फरवरी से होने लगी है याने स्कूल के कार्य दिवस बा मुश्किल 40-45 दिन के ही बचे हैं ऐसे में कोर्स कैसे पूरा होगा और विद्यार्थी परीक्षा में कैसे पास हो पायेगें कि चिन्ता भी है । यदि यही काम कुछ समय देकर किया जाता तो सर्वे का काम करने वाले कर्मचारी आराम से अपने मूल काम को भी कर पाते और बाकी समय में इस अतिरिक्त काम को भी कर पाते । जो भी हो एसआईआर सर्वे का काम अवाधगति से गतिमान है और लगता है चुनाव आयोग अपने निर्धारित समय में सर्वे का काम पूरा करा ही लेगा पर इससे पैदा होने वाले प्रश्न अनुत्तरित ही रहेगें जो विपक्ष के लिए विरोध करने के कारण बनेगें । विपक्ष को भी मुद्दा चाहिए तो यह उनके पास मुद्दा है । अभी तो 1 दिसम्बर से लोकसभा का शीतकालीन सत्र प्रारंभ हो रहा है तब भी विपक्ष इसको लेकर हंगामा करेगा ही । विगत लोकसभा चुनाव के दौरान बिहार में एसआईआर सर्वे चल रहा था, विपक्ष इसको लेकर हंगामा करता रहा और इस बार बारह राज्यों में चल रहे सर्वे को लेकर हंगमा किया ही जाना है, याने लोकसभा हंगामे की भेंट चढ़ेगी । हांलाकि इससे सत्ता पक्ष ज्यादा चिन्तित दिखाई नहीं देता वह विपक्ष की अनुपस्थिति में ही अपने विधेयकों को पास करा लेता है और विपक्ष इन विधयेकों में अपनी बात रखने से वचित रह जाता है । सत्तारझ़ दल के पास लोकसभा और राज्यसभा दोनों में बहुमत है तो उसे अपने विधेयकों को पास कराने में कोई परेशानी होती भी नहीं है उसके लिए तो विपक्ष का वाकआउट ज्यादा सुविधा प्रदान करता दिखाई दे रहा है ।  पर आम जनता अब आगामी दिनों में हंगामा और बयानबाजी को देखेगी और सुनेगी । बारह राज्यों के बाद अन्य राज्यों में भी एसआईआर सर्वे होना है जिसकी तैयारी चुनाव आयोग कर ही रहा है । निश्चित ही आगामी लोकसभा चुनाव तक पूरे देश में एसआईआर सर्वे हो जाएगा ऐसी उम्मीद की जा सकती है और चुनाव आयोग और सत्ता पक्ष के अनुसार अर्वैध घुसपेठिए सहित बहुत सारे नाम मतदाता सूची से अलग हो जाएगें फिर जो बचेगा वो वास्तविक मतदाता ही होगें । लोकसभा चुनाव में वास्तविक मतदाता ही वोट डालेगें अब इसका फायदा किसको मिलेगा यह भविष्य के गर्त में है ।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *