महात्मा गांधी मूलतः एक जननेता थे—ऐसे नेता, जिन्होंने लोकतांत्रिक और क्रांतिकारी राजनीति को अमल में उतारकर दिखाया। उनका राजनीतिक जीवन किसी एक विचारधारा या सीमित दायरे में क़ैद नहीं था, बल्कि उसमें समग्रता, परस्पर-संबद्धता और रणनीतिक सूझ-बूझ साफ़ दिखाई देती है। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस उनके लिए केवल एक राजनीतिक संस्था नहीं, बल्कि क़ौम और वतन को गढ़ने का सबसे अहम ज़रिया थी।
गांधी जीवन और विचार में किसी तरह की ख़ाना-बंदी के ख़िलाफ़ थे। उनके लिए सोच (Thought), नैतिकता, राजनीति और समाज—सब एक-दूसरे से जुड़ी हुई हक़ीक़तें थीं। इसी परिप्रेक्ष्य में गांधी के राष्ट्रवाद, उनके भारत-बोध और साझी राष्ट्रीय चेतना को समझना ज़रूरी हो जाता है।
गांधी का राष्ट्रवाद और ‘भारत का विचार’
अगर गांधी के जीवन पर सरसरी नज़र भी डाली जाए, तो यह बात वाज़ेह हो जाती है कि उनके जीवन का मरकज़ भारत और भारत की अवाम थी। लंदन में छात्र जीवन के दौरान भी उनकी भारतीय पहचान—उनकी तहज़ीब, संस्कार और सादगी—बरकरार रही।
1893 में दक्षिण अफ़्रीका में उनका सार्वजनिक जीवन शुरू हुआ, जहाँ उन्होंने भारतीय मज़दूरों, व्यापारियों और कामगारों के हुक़ूक़ के लिए संघर्ष किया। 1915 में भारत लौटने के बाद उन्होंने पूरी तरह से ख़ुद को कौमी संघर्ष के हवाले कर दिया।
अकसर गांधी को संत, नैतिक उपदेशक या महामानव के रूप में याद किया जाता है, लेकिन उन्हें एक कट्टर राष्ट्रवादी के रूप में कम ही पहचाना जाता है, जबकि सच्चाई यह है कि उनका पूरा राजनीतिक जीवन भारतीय राष्ट्रवाद की रूह से सराबोर था।
गांधी का राष्ट्रवाद कोई संकीर्ण या बहिष्कारी राष्ट्रवाद नहीं था। उनका ‘भारत का विचार’ ऐतिहासिक समझ, आर्थिक तर्क और इंसानियत-पसंद विवेक पर आधारित था। वे भारतीय राष्ट्र के निर्माण की ऐतिहासिक प्रक्रिया, उसकी चुनौतियों और उसमें बाधक शक्तियों से पूरी तरह वाक़िफ़ थे।
गांधी और प्रारंभिक राष्ट्रवादी परंपरा
यह समझना बेहद ज़रूरी है कि गांधी के विचार हवा में पैदा नहीं हुए थे। वे दादाभाई नौरोजी, महादेव गोविंद रानाडे और आर.सी. दत्त जैसे प्रारंभिक राष्ट्रवादियों की परंपरा से गहराई से जुड़े थे। इन चिंतकों ने ब्रिटिश उपनिवेशवाद की आर्थिक लूट, इस्तिस्मार और भारतीय समाज पर उसके विनाशकारी असर की वैज्ञानिक आलोचना की थी।
इतिहासकार बिपन चंद्र के अनुसार, ये शुरुआती भारतीय राष्ट्रवादी दुनिया के पहले ऐसे चिंतक थे जिन्होंने उपनिवेशवाद की आर्थिक आलोचना पेश की। गांधी ने न केवल उनके तर्कों को अपनाया, बल्कि उन्हें जन-आंदोलन की शक्ल दी।
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और राष्ट्र-निर्माण
गांधी के लिए भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस केवल एक राजनीतिक संगठन नहीं थी, बल्कि वह भारत की साझी राष्ट्रीय पहचान की वाहक थी। अपनी प्रसिद्ध पुस्तक हिंद स्वराज (1909) में गांधी ने कांग्रेस की खुलकर तारीफ़ की और कहा कि स्वराज की ख़्वाहिश को जन्म देने में कांग्रेस की ऐतिहासिक भूमिका रही है।
वे कांग्रेस-विरोधियों से साफ़ लफ़्ज़ों में कहते हैं कि अगर दादाभाई नौरोजी जैसे नेताओं ने ज़मीन तैयार न की होती, तो स्वराज की बात करना भी मुमकिन न होता। गांधी धैर्य और राजनीतिक समझ पर ज़ोर देते हुए कहते हैं कि कोई भी कौमी इमारत एक दिन में तामीर नहीं होती।
उनके अनुसार, कांग्रेस ने भारत के अलग-अलग इलाक़ों के लोगों को जोड़कर क़ौमी एहसास पैदा किया। कांग्रेस को नकारना न सिर्फ़ नाशुक्री होगी, बल्कि राष्ट्र-निर्माण की रफ़्तार को भी धीमा कर देगा।
एकता, विविधता और धर्मनिरपेक्षता
गांधी भारत की सांस्कृतिक विविधता को उसकी ताक़त मानते थे। वे ‘एक धर्म, एक भाषा, एक संस्कृति’ जैसे नारे को ख़तरनाक समझते थे। हिंद स्वराज में वे साफ़ कहते हैं कि भारत एक राष्ट्र इसलिए है क्योंकि उसमें समायोजन और आत्मसात करने की क़ाबिलियत है।
वे हिंदू सांप्रदायिकता के ख़िलाफ़ सख़्त चेतावनी देते हुए कहते हैं कि अगर कोई यह माने कि भारत सिर्फ़ हिंदुओं का देश है, तो वह ख़्वाबों की दुनिया में जी रहा है। हिंदू, मुसलमान, पारसी और ईसाई—सब इस मुल्क के बराबर के नागरिक हैं और उन्हें इत्तेहाद के साथ रहना होगा।
रचनात्मक कार्यक्रम और राष्ट्रीय चेतना
गांधी केवल विचारक नहीं, बल्कि अमल के आदमी थे। उन्होंने रचनात्मक कार्यक्रमों—जैसे अखिल भारतीय चरखा संघ और ग्राम उद्योग संघ—को राजनीतिक रणनीति के रूप में इस्तेमाल किया। उनके लिए ये कार्यक्रम ‘अप्रत्यक्ष राजनीति’ का साधन थे।
गांधी मानते थे कि इन्हीं कार्यक्रमों के ज़रिये आम जनता में साझी राष्ट्रीय चेतना पैदा की जा सकती है। राजनीति को वे केवल सत्ता की लड़ाई नहीं, बल्कि समाज के नैतिक पुनर्निर्माण का ज़रिया मानते थे।
निष्कर्ष
महात्मा गांधी का ‘भारत का विचार’ समावेशी, मानवतावादी और लोकतांत्रिक था। उनका राष्ट्रवाद नफ़रत या बहिष्कार पर नहीं, बल्कि इंसाफ़, बराबरी, आपसी सम्मान और साझे संघर्ष पर टिका था। आज, जब समाज में फिर से विभाजनकारी चेतनाएँ सिर उठा रही हैं, गांधी की साझा राष्ट्रीय चेतना पहले से कहीं ज़्यादा प्रासंगिक हो जाती है।
मनजीत सिंह
सहायक प्रोफेसर उर्दू
कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय कुरुक्षेत्र
