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सबको सन्मती दे भगवान : कुशलेन्द्र श्रीवास्तव


गैस की हाहाकार सच्ची में या केवल अफवाह ? अब इस प्रश्न का उत्तर खोजा जा रहा है । जिनको खोजना है वे खोज ही रहे हैं पर आम व्यक्ति परेशान है । रसोई गैस अब आम इंसान के लिए हवा-पानी की भांति ही जरूरी हो चुकी है । रोटी खाना है तो पकाओगे काहे में……पहले का दौर तो कब का खत्म हो चुका है जब गैस नहीं चूल्हें पर खाना बन जाया करता था । लकड़ियों के धुअे में परिवार के सपने आकार लेते थे और चूल्हे पर रोटी सेंकती महिलाओें के चेहरे पर झुझलाहट के नहीं स्नेह के भाव हुआ करते थे । अंगारे दहकते थे और रोटियां पकती रहती थीं, अब तो चूल्हा घरों में होता ही नहीं है । गैस आ गई तो चूल्हा उजड़ गया, फोटो में या कभी गांव के किसी एकाध घर मेें चूल्हा दिखाई दे जाता है । गैस की किल्लत तो इरान-इजरायल युद्ध के कारण पैदा हुई है और यह युद्ध विश्वपटल की सुर्खियां बना हुआ है । तेल से लेकर गैस तक सभी तो परेशान करने लगा है । विश्व का हर एक देश युद्ध की इस विभीषिका में अपने वर्तमान और भविष्य को अंधकारमय होता देख रहा है । युद्ध विनाशकारी होता है वो तो सही है पर युद्ध दो जून की रोटी पर भी संकट खड़ा कर अनेक देशों के सामने अनावश्यक संकट भी पैदा कर सकता हे, इस त्रासदी को अब विश्व के करोड़ों अरबों लोग महसूस भी करने लगे हैं । भारत में हाहाकार मचा है, विपक्ष को तो ऐसे ही मुद्दे चाहिए तो उनको मिल गया वे इसे हवा दे रहे हैं । लोग घबराकर गैस ऐजिन्सयों के सामने लाइन लगाए खड़े है, उनको हर हाल में गैस टंकी चाहिए, भले ही फिलहाल उनको उसकी जरूरत न हो पर भविष्य में हो सकती है की संभावना के चलते वे अनावश्यक की भीड़ का हिस्सा बन रहे हैं । इन लम्बी-लम्बी लाइनों की खबर देश के लगभग हर कोने में घबराहट पैदा कर रही है । इसके पहले ऐसी ही अफवाह पेट्रोल-डीजल को लेकर भी फैली थी, लोग पेट्रोल पंपों पर लाइन लगाकर खडत्रे हो गए थे, कुप्पों में पेट्रोल-डीजल भरवा रहे थे । एक दो दिन की अफरातफरी के बाद लोगों को समझ में आ गया था कि फिलहाल पेट्रोल की कोई कमी नहीं है और न ही इनके दाम बढ़ रहे हैं, तो क्या ऐसा ही गैस टंकी के मामलों में भी हो रहा है, लोग केवल अफवाह के चलते गैस टंकियों के लिए लम्बी-लम्बी लाइनें लगा रहे हैं । कम से कम सरकार को तो यही मानना है, सरकार बार-बार कह रही है कि पेट्रोल-डहजल से लेकर रसोई गैस तक का पर्याप्त स्टाक है, पर लोग मान नहीं रहे हैं, इसके पीछे भी कारण है एक तो कई जगहों पर गैस के लिए नम्बर ही नहीं लग रहा है और दूसरा जिनका नम्बर लग कर डिलेवरी की इनवाइस लग चुका हे उनको भी टंकी नहीं मिल रही है, कमर्शियल गैस टंकी पर रोक लगा दी गई हैइ इससे रेस्टारेन्टों के संचालन में भी दिक्कत होने लगी है बल्कि कुछ रेस्टारेन्टों ने ‘‘बंद है’’ का बोर्ड भी लगा दिया है । आम व्यक्ति अपने हिसाब से पूरा गणित बैठा लेता है कि जब कमर्शियल गैस अंकी मिलना बंद हो गई है तो एक दिन घरेलू गैस अंकी भी मिलना बंद हो जागी, इस कालपनिक प्रश्न में उलझकर वह गरमता धूप में लम्बी लाइनों में लगा हुआ है । इरान-इजरायल और अमेरिका का यह युद्ध विश्व मेें नए युद्ध की गरमाहट दे रहा है, यूक्रेन और रूस का युद्ध तो अभी चल ही रहा है, यी नश् युद्ध प्रारंभ हो गया है, वैसे तो इजरायल फिलस्तीन के साथ युद्ध कर ही रहा है उसमें यह एनया देश और जुड़ गया । युद्ध भले ही अभी प्रारंभ हु हो पर इसकी सुगबुगाहट तो महिनों पहले से ही दिखाई देने लगी थी, पिछले साल भी कुछ दिनों तक इरान और इजरायल का युद्ध चला भी था, बाद में सीजफायर हो गया था तब भी यह ही माना जा रहा था कि यह सीजफायर केवल आगामी युद्ध की तैयारियों के लिए ही है और वो सच भी साबित हुई । इरान तैयार था और इजरायल अमेरिका के कांधे पर बंदूक रखकर युद्ध करने को उत्सुक था । उसका दांव सफल रहा, उसने अनावश्यक अमेरिका को अपना सहयोगी बनाया और इरान को युद्ध में झौंक दिया । युद्ध के पहले ही दन इरान के सबसे बड़े नेता खोमेनई को मार दिया गया और भी इरान के बड़े नेता और अधिकारी मारे गए, पर युद्ध खत्म नहीं हुआ, युद्ध तासे अभी भी चल रहा है और कब तक चलेगा कोई नहीं जानता, अब तो अमेरिका भी नहीं जानता की युद्ध कब खत्म होगा, इरान ‘‘मरता, क्या न करता’’ के पैटर्न पर युद्ध लड़ रहा है, उसके पास खोने को ज्यादा कुछ नहीं बचा है और वो यह भी जानता है कि वह ज्यादा दिन युद्ध को नहीं झेल सकता इसलिए वह पूरी दमखम के साथ लड़ रहा है विश्व के कई देश सहमें हुए हैं । एक युद्ध मे लोकतंत्र के नाम पर भारत में भी लड़ा जा रहा है, पक्ष और विपक्ष का । विपक्ष को लगता है कि उसका काम लड़ते रहना ही है तो वो हर जायज और नाजायज मुद्दे पर भी लड़ता दिखाई दे रहा है इसमें कई बार लोकतांत्रिक व्यवस्था भी प्रभावित हो रही है इसका उदाहरण है पश्चिम बंगाल जहां चुनाव होना है और सत्ता में ममता बनर्जी बैठी हैं, उनको यह भ्रम है शायद की केन्द्र से की जाने वाली हर एक कार्यविधि उनके खिलाफ ही होती है इसलिए ही उन्होने राष्ट्रपति के पश्चिम बंगाल के दौरे को न केवल सहजता में लिया वरना प्रोटोकाल का भी पालन नहीं किया । लोकतंत्र व्यवस्था में राष्ट्रपति का पद गरिमा और संवैधानिक सर्वोच्चता का प्रतीक है, वह किसी दल का नहीं होकर लोकतत्र का प्रतिनिधित्व करता है इसलिए ही राष्ट्रपति के प्रोटोकाल की व्यवस्था की गई है । देश के कई राज्यों में विपक्षी दलों की सरकारेंंं हैं पर अभी तक किसी भी राज्य में राष्ट्रपति के आगमन और उनके प्रोटोकाल में काई खामी नहीं बरती गई पर पश्चिम बंगाल में ऐसा हो गया । पहले तो लगभग आखिरी समय में राष्ट्रपति के कार्यक्रम का स्थल बदल दिया गया फिर उनका स्वागत करने के लिए पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री को तो छोड़ो उनकी केबिनेट का एक मंत्री भी नहीं पहुंचा जाहिर है कि ऐसा किया जाना दुर्भाग्यपूर्ण ही माना जाएगा, इसके पहले भी वे प्रधानमंत्री मोदी जी के बाढ़ के निरीक्षण के बाद उनके द्वारा बुलाई गई समीक्षा बैठक में न तो वे स्वय ही पहुंची थीं और न ही उन्होने पश्चिम बंगाल के मुख्य सचिव को जाने दिया था । भारत सरकार ने इस पर कड़ा रूख अपनाया था और वहां के मुख्य सचिव को अपने पद से त्यागपत्र देने को मजबूर होना पड़ा था । राज्यपाल के साथ टकराहट के भी कई किस्से वहां के हैं । दरअसल इस बात को ध्यान में रखना जरूरी है कि राजनीतिक दलों की आपसी टकराहट अपनी जगह है पर संवैधानिक प्रोटोकाल अपनी जगह है । राज्यपाल भी राष्ट्रपति का प्रतिनिधित्व करते हैं और उनके लिए प्रोटोकाल का पालन किया जाना जरूरी है । ममता बनर्जी को केन्द्र सरकार की गतिविधयों से दिक्कत है, उनको लगता है कि केन्द्र सरकार जो उनकी राजनीतिक विरोधी पार्टी है वह उनके खिलाफ कार्य करती है और ये कार्य वह संवेधानिक पदों के माध्यम से भी कराती है इसके चलते ही वे प्रोटोकाल को तोड़ देती हैं । ममता बनर्जी तीन बार की मुख्यमंत्री हैं और चौथी बार के चुनाव के लिए तैयारी कर रही हैं, वे अकेली नेता हैं और यह मानकर चलती हैं कि वो अपने ही बल पर पश्चिम बंगाल में अपनी पार्टी को बहुमत दिलाती हैं । वर्षों तक वामपंथी सरकार वहां सत्ता में रही है, उसको हटाकर वे मुख्यमंत्री बनीं, उनके सामने कोई अन्य विपक्षी दल नहीं रहा, पर भाजपा ने बार-बार असफल होते रहने के बाद भी न केवल अपनी पार्टी का वहां विस्तार किया बल्कि पिछले विधानसळा चुनाव में दूसरी बड़ी पार्टी बनकर भी अपने बढ़ते वजूद को साबित किया । अब जब फिर वहां चुनाव होने वाले हैं तो भाजपा को और बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद है इसके चलते ही मता बनर्जी शंका-कुशंका का शिकार होती जा रही हैं । भाजपा ने पश्चिम बंगाल में हिन्दुओं को इकट्ठा करने और ममता बनर्जी की पार्टी में सेध लगाने का काम किया तब ही तो भाजपा को वहां मजबूती मिली । चुनाव में वो अपनी सफलता की उम्मीद बांधे है और ममता बनर्जी भाजपा के साम, दाम दंड, भेद की नीति को भेदने की कोशिश कर रहीं हैं इसी कारण से ही उनको लगा कि राष्ट्रपति जी का पश्चिम बंगाल में आदिवासी सम्मेलन में आना केवल संयांग नहीं बल्कि भाजपा की रणनीति का ही हिस्सा है, तो वे बौखला गई । उनकी बौखलाहट ने राष्ट्रपति जैसे संवैधानिक पद की मर्यादा को नुकसान पहुंचाया । हिन्दुओं और सनातनियों के लिए शंकराचार्य का पद भी ऐसा ही मूल्यवान होता है, आदिश्ंकाराचार्य जी ने चार पीठों में श्ांकराचार्य पद बनाए और उन पर पदासीन होने के लिए आचार संहिता भी बनाई इसके पालन के बाद ही कोई शंकराचार्य बन सकता है जो हिन्दु धर्मावलंबियों के लिए देवस्वरूप् में माने जाते हैं, उन शंकराचार्य के साथ जो व्यवहार प्रयागराज मेला प्राधिकरण द्वारा किया गया वह भी गरिमा के खिलाफ था, उनसे उनके शंकराचाय्र होने का प्रमाण मांगना भी अपमान की श्रेणी में माना जाना चाहिए था, ऐसा नहीं हुआ बल्कि यह लड़ाई और बढ़ी तो उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज करा दी गई । निश्चित ही इसे सनातन धर्म के अपमान के रूप में देखा जाना चाहिए था पर संभवतः ऐसा नहीं हुआ । भारत मेंं साधु-सन्यासियों की संख्या बहुत अधिक है, कुंभं के मेले में जब वे आते हैं तो केवल वे ही वे दिखाई देते हैं और उनका आशीर्वाद पाने के लिए सनातनी छटपटाते दिखाई देते हैं, उनकी खामोशी भी उचित नहीं मानी जा सकती । उत्तरप्रदेश में योगी जी की सरकार है जो हिन्दुओं की रक्षा का दावा करती है पर हिन्दुधर्म के प्रमुख के साथ होने वाली ऐसी घटनाओं को अनदेखा करती है । शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद जी महाराज गाय को सम्मान दिलाने के लिए अपनी यात्रा पर हैं, ऐसा सोचा जा रहा था कि गाय को माता का दर्जा देने वाला हिन्दु समाज और भाजपा उनका खुला समर्थन करेगी, क्योंकि उनके नेता इसको लेकर बयानबाजी करते रहे हैं पर धरातल पर काम नहीं कर पाए तो जो धरातल पर काम करना चाह रहा है उसका समर्थन किया जाएगा, पर ऐसा होता दिखाई नहीं दे रहा है । बहरहाल उनकी यात्रा तो प्रारंभ हो गई है और सत्ता के लिए संघर्ष कर रहे अखिलेश यादव सहित अन्य विपक्षी दलों के नेता उनकी चरण वंदना कर उनको समर्थन देने आगे आ चुके हैं, भाजपा में इसमें पिछड़ती दिखाई दे रही है, वैसे भाजपा ने केशवप्रसाद मौर्य के माध्यम से अपनी गल्ती को कम करने का प्रयास किया पर वो इतना सफल नहीं रहा । शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंदमहाराज जिस ढंग स अपना आक्रोश व्यक्त करते हुए यात्रा पर निकले हैं वह उत्तरप्रदेश सरकार के लिए कठिनाई भी पैदा कर सकता है । 

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