इस जून में आपातकाल की 50वीं वर्षगांठ है। भारत के इतिहास में यह एक काला धब्बा है। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने जब मीडिया को चुप कराने के लिए हथौड़े की रणनीति का इस्तेमाल किया था। आपातकाल की घोषणा पर हस्ताक्षर होने से पहले ही, दिल्ली के अखबारों की बिजली आपूर्ति बंद कर दी गई थी। सेंसरशिप लागू कर दी गई थी और दिशा-निर्देश इतने सख्त थे कि विपक्षी नेताओं की सामूहिक गिरफ्तारी, सेंसरशिप और प्रकाशनों को बंद करने के बारे में एक पंक्ति भी नहीं लिखी जा सकती थी। जब कई समाचार-पत्र एवं पत्रिकाओं ने अपने संपादकीय कॉलम में पाठकों को पर्दे के पीछे की बदसूरत सच्चाई बताने के लिए एक खाली जगह दिखाई अथवा इसे काला कर के प्रकाशित किया, तो सेंसर ने फैसला सुनाया कि भविष्य में संपादकीय में कोई खाली जगह, काले धब्बे अथवा प्रसिद्ध हस्तियों के उद्धरण की अनुमति नहीं होगी।
संसद में सरकार की ओर से बयान और बोलने वाले सांसदों के नाम और संबद्धता के अलावा कुछ भी प्रकाशित नहीं किया जा सकता था। सूचना एवं प्रसारण मंत्री वी. सी. शुक्ला ने पत्रकारों पर कड़ी नजर रखने के लिए केंद्रीय सूचना सेवा में पुलिस को भी शामिल किया था। विदेशी संवाददाताओं से कहा गया कि या तो वे सरकार के मीडिया दिशा-निर्देशों का पालन करने के लिए एक दस्तावेज पर हस्ताक्षर करें या यहां से चले जाएँ। संपादकों के साथ हुई एक बैठक के बाद नेशनल हेराल्ड के संपादक चलपति राव ने इंदिरा के मीडिया सलाहकार शारदा प्रसाद से कहा कि “मैंने ब्रिटिश राज के चरम पर भी चाटुकारों का ऐसा प्रदर्शन, ऐसा दौर नहीं देखा था।”
आज भी अक्सर पूछा जाने वाला सवाल यह है कि क्या भारत में मीडिया पर आपातकाल की तरह दमन हो सकता है? 1975 और 1977 के बीच हुई खबरों पर पूरी तरह से रोक अब संभव नहीं है, क्योंकि सूचना प्रचार-प्रसार के स्रोत कई गुना बढ़ गए हैं। आपातकाल के दौरान, केवल एक सरकारी नियंत्रित टीवी चैनल, दूरदर्शन और मात्र कुछ सौ समाचार-पत्र थे।अब पचास साल बाद, प्रिंट मीडिया समाचार संचालन के विशाल स्पेक्ट्रम के साथ एक बहुत बड़ा दायरा है। आज 400 से अधिक निजी स्वामित्व वाले टीवी समाचार चैनल हैं और अखबारों की संख्या तो हजारों-हजार में है। इंटरनेट यूट्यूब, एक्स, फेसबुक, इंस्टाग्राम आदि पर ब्लॉगर्स और ब्लॉगर्स के संदेशों से भरा पड़ा है। व्हाट्सएप रूपी ब्रह्मांड सेल फोन वाले संदेश किसी भी व्यक्ति के लिए बहुतायत मात्रा में उपलब्ध है। आज, चाहे सरकार कितनी भी शक्तिशाली क्यों न हो और मीडिया सलाहकारों, प्रवक्ताओं और ट्रोल्स की संख्या कितनी भी हो, जो पुराने समय के सेंसर के मुकाबले ना के बराबर है। और यह भी एक बात है कि अगर तथ्य मेल नहीं खाते हों तो किसी भी स्टोरी को नियंत्रित नहीं किया जा सकता। आपातकाल के दौरान भी, खबरें मौखिक रूप से ही फैली थीं। लेकिन इससे सरकार समाचार के प्रचार-प्रसार को नियंत्रित करने के प्रयासों से पीछे नहीं हटीं हैं। हालांकि, इसके इस्तेमाल किए जाने वाले तरीके अधिक सूक्ष्म और परिष्कृत हैं, आपातकाल की भांति सीधे-सीधे नहीं।
पत्रकारिता पढ़ते अथवा कुछ अरसे तक पत्रकारिता करते हुए, मैंने एक लयबद्ध नियम देख अथवा उससे सीखा कि नेता जितना अधिक शक्तिशाली होगा, असहज तथ्यों को दबाने में वह उतना ही अधिक निर्दयी होगा। और जैसे-तैसे उसे रातों-रात बंद करवा दिया जाएगा, किसी अन्य व्यक्ति के द्वारा खरीद लिया जाएगा अथवा बेच दिया जाएगा। प्रभावित नेता के इर्द-गिर्द के लोगों द्वारा यह बात भी प्रमुखता से फैलाई जाएगी कि फलां-फलां दैनिक ने अपनी खोजी रिपोर्टिंग में अब सीमाएं पार कर ली है। वह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का नाजायज फायदा उठा रहा है। जब सरकार कमजोर होती हैं, खासकर जब वे अस्थिर गठबंधनों के ज़रिए चलती हैं, जैसा कि 1991 से प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव के शासनकाल से लेकर 2014 में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के शासनकाल तक का मामला था, तो मीडिया विशेष रूप से साहसी था। सौम्य स्वभाव वाले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह अक्सर पत्रकारों द्वारा खास तौर से निशाना बनाए जाते थे। जबकि उनमें से अधिकांश पत्रकार कांग्रेस के प्रथम परिवार को अपमानित करने से बचते थे। सभी शासकों के कार्यकाल में गोदी मीडिया रहा है, इसमें कोई दो राय नहीं है।
आज हमारे पास इंदिरा के बाद सबसे शक्तिशाली प्रधानमंत्री हैं। अगर रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स की वार्षिक सूची को गंभीरता से लिया जाए, तो भारत को विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक में 151वें स्थान पर रखा गया है, जो 2014 में 80वें स्थान से नीचे है। रेटिंग की अपारदर्शी पद्धति अत्यधिक संदिग्ध है। यह गुमनाम व्यक्तियों की व्यक्तिपरक राय पर आधारित है, जिनमें से कई को भाजपा के हिंदुत्व राष्ट्रवादी एजेंडे पर गहरा संदेह है। क्या युद्ध के बीच भी अपनी राय, समाचार आउटलेट और आलोचनात्मक आवाज़ों की बहुलता के साथ भारत वास्तव में कतर, रवांडा और कांगो जैसे देशों से नीचे रैंक कर सकता है? मीडिया स्वतंत्रता के सूचकांक का आकलन करने की मेरी अपनी पद्धति एवं सोच मुख्य रूप से तीन कारकों पर आधारित है। मीडिया को आर्थिक रूप से स्थिर होना चाहिए और सरकारी उदारता पर निर्भर नहीं होना चाहिए। यह व्यावसायिक हितों में हितधारक नहीं होना चाहिए जो सत्य के वाहक के रूप में इसकी भूमिका के साथ संघर्ष कर सकता है। (इसलिए यह परेशान करने वाला है कि भारत के दो सबसे अमीर व्यक्ति, मुकेश अंबानी और गौतम अडानी, मीडिया साम्राज्य का विस्तार कर रहे हैं।) चिल फैक्टर एक स्वतंत्र प्रेस के लिए एक और बाधा है। मीडिया कभी-कभी राज्य से प्रतिशोध के डर से खुद को सेंसर कर लेता है, जो पत्रकारों को गैर-लागू कानूनों के तहत गिरफ्तार करने के लिए जाना जाता है। स्वस्थ प्रेस के लिए तीसरा संकेतक मीडिया तक सरकार की पहुंच की डिग्री है। आज हम आपातकाल के दौरान की तुलना में मीडिया की स्वतंत्रता के मामले में बेहतर स्थिति में हो सकते हैं। लेकिन क्या यह पर्याप्त है? क्या हम टैगोर की अमर कविता, “जहां मन भय रहित है…” को पूरी तरह से प्रतिबिंबित करते हैं, रेखांकित करते हैं।
जहाँ मन भय मुक्त हो और सिर ऊँचा हो
जहाँ ज्ञान मुक्त हो जहाँ दुनिया संकीर्ण घरेलू दीवारों द्वारा
टुकड़ों में विभाजित नहीं की गई हो
जहाँ शब्द सत्य की गहराई से निकलते हों
जहाँ अथक प्रयास पूर्णता की ओर अपनी भुजाएं फैलाता है
जहाँ तर्क की स्पष्ट धारा मृत आदत के उदास रेगिस्तानी रेत में अपना रास्ता नहीं खोती हो
जहाँ मन को तुम्हारे द्वारा आगे बढ़ाया जाता हो
निरंतर व्यापक होते विचार और क्रिया की ओर
स्वतंत्रता के उस स्वर्ग की ओर, मेरे पिता, मेरे देश को जगाओ।
– डॉ. मनोज कुमार
लेखक – जिला सूचना एवं जनसंपर्क अधिकारी हैं।
