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विरोध की आड़ में, ये कहाँ आ गए हम……!

पंकज सीबी मिश्रा / राजनीतिक विश्लेषक एवं पत्रकार जौनपुर यूपी

अजाक्स के एक पदादिकारी और एमपी सरकार के अधीन एक आईएएस प्रमोटेड अधिकारी का बयान वायरल हुआ था, जिसमें ब्राह्मणत्व के मानसिक विरोध में यह कहा गया  कि जबतक ब्राह्मण उसके बेटे को अपनी बेटी दान नहीं करते तब तक आरक्षण बना रहेगा। यह पूरी तरह से इडियायाटिक बात है। यह ठीक वैसा है जैसे कोई युवा नेता  यें ना कहें कि राहुल गाँधी को जब तक पीएम ना बना दें हम कुंवारे ही रहेंगे। उधर सोशल मिडिया पर कई युवक कह रहें थे  कि जबतक अधिकारी महोदय मेरा विवाह अपनी बेटी से न करा दें, तबतक मैं धोती पहनना नहीं छोडूंगा। अरे भाई, आरक्षण हटाने के लिए ब्राह्मण ही  कुछ भी क्यों करेगा ? पिछड़े क्यों नहीं करेंगे और बेटी मेरी इक्षा मेरी मै उसका विवाह जहाँ मन हो करु, क्या बाबा साहब वाला संविधान ऐसी जगहों पर विश्राम करता है क्या ? बिहार में पहले तेजू भईया उड़नबाज बने, निपट लिए उससे पहले स्वामी प्रसाद उड़नबाज बने निबट लिए । पर अब नीतीश जी ने जातिगत जनगणना के बाद रिजर्वेशन बढ़ा दिया, कहाँ ब्राह्मण उनके विरुद्ध हो गए ? आपने आरक्षण को बढ़ाते बढ़ाते पचहत्तर प्रतिशत कर लिया, कल को सौ कर लीजिये। ब्राह्मण या कोई सवर्ण इसके विरुद्ध नहीं बोलता है। केवल अपनी राय रखता है, छिटपुट लोग कानाफुंसी करते है और बात खत्म।

                   पिछले पच्चीस पचास वर्षों में आरक्षण के विरुद्ध कहीं कोई जनसभा हुई , कोई रैली या कोई प्रदर्शन हुआ हो, ऐसा मुझे याद नहीं आता। दिल्ली की सड़कों पर रोज ही लोग सड़को पर बैठते देखे गए कभी कोई आरक्षण के लिए बैठा क्या कभी..? अन्य फ़ालतू  बातों के लिए धरना प्रदर्शन होते हैं, लेकिन आरक्षण के विरुद्ध कभी कोई नहीं उतरा। यदि फेसबुक की अनावश्यक खींचतान को छोड़ दिया जाय तो सवर्णों का आरक्षण विरोध धरातल पर कहीं नहीं दिखता फिर अजाक्स को आपत्ति क्यों.!  वैसे भी, मैं अब मानने लगा हूँ कि रिजर्वेशन का विरोध अब सवर्णों का मुद्दा ही नहीं रहा। अगले  पाँच से दस साल के भीतर यह ओबीसी का विषय होगा। परीक्षाओं में ओबीसी का कटऑफ अब सामान्य श्रेणी के लगभग बराबर ही रहने लगा है। आरक्षण वाली व्यवस्था अब सवर्णों से अधिक उन्हें चुभती है, बस वे अभी बोल नहीं रहे हैं। ब्राह्मणों नें  रिजर्वेशन कोटा को मनमानी मान उसे स्वीकार कर लिया है और अब नौकरियों से इतर विकल्पों की ओर बढ़ भी गए हैं।  दरअसल उस अधिकारी के मन में ब्राह्मणों के लिए इतनी घृणा भरी है कि वह थोड़ी सी भाषा बदल कर उनकी बेटियों को सरेआम गाली दे रहा था। विरोध कि आड़ में यें कहाँ आ गए हम..! फिर भी आप देखेंगे कि रोज ही कोई न कोई पब्लिसिटी का भूखा नेता या चमचा आरक्षण के बहाने ब्राह्मणों को धमकी देता रहता है। इन धमकियों या गलीबाजी के पीछे आरक्षण हटने का भय बिल्कुल भी नहीं होता, क्योंकि वे भी जानते हैं कि ब्राह्मणों को आरक्षण से कोई विशेष दिक्कत नहीं रही। वे घृणा के कारण ऐसा करते हैं। यह घृणा क्यों और कैसे जन्मी है, यह बड़ा नहीं  विषय है क्यूंकि उन्हें त्वरित नेता बनना है, पार्टी प्रवक्ता बनना है। और यह तभी संभव है ज़ब ब्राह्मण या सवर्णो को गाली दिया जाए। मैंने सुना कि अधिकारी महोदय अपनी उस घिनौनी बात के लिए माफी मांग लिए । पर क्या केवल माफी मांग लेने से बात खत्म हो जाती है ? यदि यही बयान उसने किसी दूसरी जाति की लड़कियों के लिए किसी भाजपा नेता नें  दिया होता तो उसे संविधान से माफी मिल जाती ? शायद नहीं…मुझे समझ नहीं आता कि इतने उच्च पद पर पहुँचने के बाद भी इनकी कुंठा समाप्त क्यों नहीं होती…!

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