राजनीतिक सफरनामा : कुशलेन्द्र श्रीवास्तव
इजराल-अमेरिका और ईरान का युद्ध अब विभीषिका बनता जा रहा है । लगभग एक माह से चल रहे इस युद्ध ने अब सम्पूर्ण विश्व पटल को सहमा दिया है । युद्ध क्यों हो रहा है इसे कोई सम ही नहीं पा रहा है पर इसके दुष्पिरिणामों से जनसमुदाय परेशान अवश्य है । सबसे बड़ा संकट तो तेल को लेकर हे जिसे ईरान ने रोक रखा है । अब तो सभी समझ गए हैं कि ईरान के पास एक रास्ता है ‘‘हार्मुज स्टैट’’ जिससे ही निकल कर जहाज अपने गंतव्य तक पहुंचते हैं । इस रास्ते को ईरान ने बंद कर रखा है, केवल वे ही जहाज आ जा रहे हैं जिन्हें ईरान आने देना चाहता है । ईरान का यह एक ऐसा हथियार है जिसने उसे जंग में अघोषित विजय दिला रखी है । अमेरिका और इजरायल ने जब ईरान पर हमला किया था तब लग रहा था कि यह युद्ध बस कुछ ही दिनों में सिमट जाएगा पर ईरान ने तो पहले से ही इसकी तैयारी कर रा थी तो युद्ध अब भी चल ही रहा है और आगे भी चलते रहने की संभावना है । ईरान की मुख्य ीछरशिप जिसमें अयातुल्ला खामेनई भी शामिल है उनके मारे जाने के बाद भी ईरान का मजबूत प्रदर्शन इस बता का संकेत तो हे ही उनकी रणनीति केवल बड़े लीडर तब नहीं सिमटी थी और वे लम्बे समय तक युद्ध करने की तैयारी पहले ही कर चुके थे । अमेरिका के इरादों से ईरान पहले से ही वाकिफ था ।ईरान के पास परमाणु हथियार हैं या वह बना सकता है कि संभवानाओं को लेकर अमेरिका पहले से ही ईरान पर दादागिरी करता आ रहा था तो ईरान को तो हर परिस्थिसतियों के लिए तैयार रहना था सो वह तैयार था भी । अमंरिका का इतिहास ऐसा रहा भी है, उसने ईराक को भी इसी बहाने से अपने कब्जे में ले रखा है और हाल ही के दिनों में उसने वेनुजएला पर भी ऐसे ही कब्जा किया है, यहां तक कि राष्ट्रपति ट्रंप ने तो अपने आपको वेनेजुएला का राष्ट्रपति ही घोषित कर रखा है । वहां के राष्ट्रपति को रातों रात कैद कर अमेंरिका की जेल में डाल दिया है औ जो कार्यवाहिक राष्ट्रपति हैं उनको धमका रखा है । वेनुजएला की यह पूरी लड़ाई तेल को लेकर है, वेनेजुएला में विशाल तेल भंडार हैं और वो विश्व के कई देशो को तेल बेचता रहा है । ईरान की स्थिति भी ऐसी ही है । ईरान की पूरी अर्थव्यवस्था का आधार ही वहां के तेल भंडार हैं जिस पर अमेरिका का नजरें वर्षों से लगी हुई हैं । गत वर्ष उसने इजरायल के साथ मिलकर ईरान पर हमला भी किया था और इस बात की घोषणा की थी कि अमेरिका ने ईरान के परमाणु केन्द्रां को नष्ट कर दिया है हालांकि तब युद्ध लमबा नहीं चला था और शांति समर्झाता हो गया था । इजरायल फिलिपींस, लेबनान सहित अन्य देशों पर पिछले एक वर्ष से हमले कर रहा है, उसकी नजर ईरान पर भी लगी हुई थी और ऐसा माना जाता है कि अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप को युद्ध के जाल में फंसाने में उसकी मुख्य भूमिका रही है । राष्ट्रपति ट्रंप सुर्खियों में बने रहते हैं और सुर्खियों में बने रहने के लिए वे कुछ भी बयान भी देते रहते हैं । टैरिफ लगाकर या बढ़ाकर उन्होने विश्व के कई देशो को परेशान भी करके रखा है । ईरान पर हमला करना उनकी सोची समझी साजिश ही माना जा रहा है । उन्हें अंदाजा नहीं था कि ईरान ऐसी तैयारी कर के रखेगा कि यह युद्ध महिनों चले पर अब जब युद्ध लम्बा खिंच रहा है तो उलझनें तो सभी की बढ़ रही हैं, युद्ध करने वाले देशों की भी और युद्ध को चुपचाप देखते रहने वाले देशों की भी । राष्ट्रपति ट्रंप को र्हामुज का अंदाजा नहीं रहा होगा सो वे इस में फंसे दिखाई देने लगे । हार्मुज ने तेल संकट पैदा कर दिया है और विश्व के कई देशा तेल संकट से संघर्ष करते दिखाई देने लगे हें । विश्व के ज्यादातर देशों में तेल को लेकर वहां की जनता परेशान होने लगी है । विश्व के देशों की यह स्थिति ईरान के लिए वरदान साबित हो रही है । जब जनता परेशान होती है तो युद्ध का परिणाम सामने आता है । भारत में भले ही तेल संकट न हो पर लोगों में तेल संकट की संभावनाओं को लेकर हड़बड़ी तो है ही । वाहनों में पेट्रोल हो और रयोई में गैस हो इस मानसिकता ने आम नागरिकों को परेशान कर रखा है । एलपीजी गैस सिलेण्डर के लिए और वाहनों में पेट्रोल-डीजल के लिए लम्बी-लम्बी कतारें लगी देखी जाने लगीं । पेट्रोल पंपों पर और गैस ऐजेन्सियों पर नियमित स्टाक तो था पर जब भीड़ बढ़ी और गैर जरूरी डिमांड बढ़ी तो एलपीजी से लेकर पेट्रोल-डीजल तक की कमी हो गई और इस कमी ने ही सबसे ज्यादा भयावह स्थिति निर्मित की । अफवाहों का बाजार गर्म हुआ तो लोग एलपीजी से लेकर पेट्रोल-डीजल लेने के लिण् मारामारी पर उतर आए । सरकार दम के साथ कह रही है कि फिलहाल इनका कोई संकट नहीं हे पर लोग सरकार की बात को मान ही नहीं रहे हैं तो अपना सारा कामधाम छोड़कर वे एलपीजी से लेकर पेट्रोल-डीजल लेने के लिए लाइनों में लगे हैं । सरकार यह मान रही है कि ऐसा सब विपक्ष द्वारा फैलाए जा रही अफवाहासें के कारण हो रहा है पर कुछ सरकारी घोषणाएं भी इसकी जिम्मेदार हैं । मसलन सरकार ने सिलेण्डर बुक करने की समय सीमा उसी समय बर्ढ़ा जब अफवाह चल रही थी तो आम लोगों को लगा कि संभवत गैस की किल्लत के कारण यह समय सीमा बढ़ाई गई । गैस बुक होने में दिक्कत आने लगी तो भी लोगों में घबराहट बढ़ी । अमूमन यही स्थिति पेट्रोल-डीजल को लेकर भी हुई । आम आदमी अब सोशल मीडिया से जुड़ा है और सोशल मीडिया कह बातों को पढ़ता है औी उसे सच भी मानता है तो सोशल मीडिया ने ईरान युद्ध और तेल के संकट को लिखा जो आम व्यक्ति तक पहुंचा और लोगों में हड़बड़ाहट फैल गई । भारत में ही नहीं पाकिस्तान सहित अन्य देशों में तो स्थिति और भी ज्यादा भयावह है, वहां की सरकारें पहले से तैयार नहीं थीं तो स्थिति को खतरनाक होना ही था तो होती जा रही है । वहां तो एलपीजी से लेकर पेट्रोल-डीजल के दाम भी बढ़ा दिए गए हैं पर भारत फिलहाल इससे अछूता है । भारत ने एक्साइज डयूटी कम कर दी जिससे एलपीजी से लेकर पेट्रोल-डीजल देने वाली कंपनियों को कम से कम नुकसान हो और इसका असर जनता पर न पड़े । भारत के पास विकल्प अधिक हैं और तैयारी पूरी है । युद्ध यदि और लम्बा खिचेगा तो कई देशों में हाहाकार मचेगा, जो वहां की सरकारों के लिए कठिन समय का संकेत होगा । एक युद्ध जैसा ही माहौल पश्चिम बंगाल में भी बना हुआ है, वहां विधानसभा के चुनाव होना हैं । पश्चिम बंगाल में होने वाला कोई भी चुनाव केवल चुनाव न होकर संघर्ष का मैदान बन जाता है । भाजपा पिछले पन्द्रह सालों से पश्चिम बंगाल की राजनीति में अपने पैर जमाने की कोशिश कर रही है । इसके लिए उन्होने केलाश विजय वर्गीय को तो वहां स्थाई रूप से पहुचा रखा था पर जब सफलता नहीं मिली तो फिर इसकी जबाबदारी स्थानीय नेताओं को ही सौंप दी गई है । इस बार का चुनाव स्थानीय नेताओं के भरोसे पर ही लड़ा जा रहा है । शुभेन्द्र अधिकारी जो कभी ममता बनर्जी के खास हुआ करते थे अब वे भाजपा के भावी मुख्यमंत्री के रूप में उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं यूं तो पश्चिम बंगाल में जो भाजपा है उसमें ज्यादातर बड़े नेता ममता बनर्जी की पार्टी से ही निकले हैं वे ममता बनर्जी की कायशैली से परिचित हैं । हांलाकि ममता बनर्जी की वहां के मतदाताओं में गहरी पैठ है यही कराण है कि भाजपा पूरी मेहनत करने के बाद भी पश्चिम बंगाल में अपनी बेहतर उपसि्िति दर्ज नहीं करा पाई है । इतना अवश्य हुआ है कि भाजपा ने दो सीटों से अपनी यात्रा प्रारंभ की और 77 सीटों तक पहुंच गई । इस कारण से ही उसे उम्मीद है कि वो इस बार बहुमत तक पहुंच सकती है । इस बार एअइएमएम भी चुनावी मैदान में है उसने भसी हुमायं कबीर की र्न नवेली पार्टी के साथ गठबंधन किया हुआ है । यह हुमायं कबीर भी ममता बनर्जी की पार्टी से ही विधायक रहे हैं और बाबरी मस्जिद बनाने की घोषणा के बाद उन्हें ममता बनर्जी ने अपनी पार्टी से निकाल दिया था । बाबरी मस्जिद बनाने की घोषणा के बाद उन्हें मुस्लिम समाज का जो समर्थन मिला उसे गदगद हुमायं कबीर ने नपई पार्टी बना ली और अब एआइएमएमाआई के साथ गठबंधन कर मुस्लिम वोटों पर पजरें डपल लीं तो मूलतः ममता बनर्जी की ही वोटें तानी जाती हैं । निश्चत रूप से यह गठबंधन भी ममता बनर्जी की जीत में अवरोध ही खड़ा करेगा । पश्चिम बंगाल में एसआइआर भी भाजपा के सपोर्ट में जा रहा है क्यों कि करीब एक करोड़ मतदाताओं के नाम वहां से कटे हैं । करीब 55 लाख वोटर अब भी प्रतीक्षा सूची में है कि वो वास्तव में वोटर हैं कि नहीं । माना यह जा रहा है कि ये सभी मतदाता ममता बनर्जी के ही मतदाता थे याने ममता बनर्जी को इतना नुकसान तो हो ही रहा है इसके कारण ही ममता बनर्जी ने एसआइआर पर सवाल उठाए और कोर्ट तक पैरवी करने पहुंच गई । इसका विशेष लाभ उनको हुआ नहीं पर फिर भी उनका संघर्ष तो अभी भी चल ही रहा है ।
युद्ध के विनाश से सहमा विश्व
