पंकज सीबी मिश्रा, राजनीतिक विश्लेषक एवं पत्रकार जौनपुर यूपी

हममें से जितने भी लोग नब्बे के दशक में सरकारी या निजी स्कूलों में पढ़े हैं उनको याद होगा सुबह के समय असेंबली की शुरुआत प्रार्थना से और राष्ट्गान से होता था और समापन पीटी से होती थी और अंत में सभी शिक्षकों का चरण स्पर्श अभिवादन करके ही घर के लिए प्रस्थान होता था। हालांकि बचपन में संविधान की कोई समझ ना थी परंतु यह ज्ञान था कि स्कूल में सभी धर्म के बच्चे हैं फिर भी प्रार्थना एक ही करवाते थे क्यूंकि तब गाँधी जी के आदर्श प्रासंगिक थे और कांसेप्ट था ईश्वर अल्ला तेरो नाम सबको सनमति दें भगवान , किसी और धर्म की प्रार्थना क्यों नहीं कराई जाती थी ? क्यूंकि तब धार्मिक कट्टरता शून्य थी, अनपढ़ पांच हजार साल के प्यासे बिना पानी वाले जीवों की कोई उत्पत्ति नही थी, नवबौद्ध नाम की कोई प्रजाति नहीं थी, भाजपा में ओबीसी नेतृत्व नहीं था और सबका भाईचारा एक नंबर का था । अचानक मायावती अखिलेश अमित शाह जैसे जातिवादी नेता राजनीति के पटल पर आए । मन में सवाल तब तक रहा जब तक अन्य जाति के लोगो ने सिविल सर्विस की तैयारी शुरू नहीं की। जैसे ही कक्षा में संविधान का मौलिक अधिकार का चैप्टर शुरू हुआ तुरंत शिक्षक से पूछा कि क्या स्कूलों में धार्मिक प्रार्थना स्वीकार्य है ? तब कांग्रेस सत्ता में थी उन्होंने मुस्कुरा कर संविधान का अर्टिकल 28 समझाया जो कि इस प्रकार है पूरी तरह से राज्य निधि से संचालित किसी भी शैक्षणिक संस्थान में कोई धार्मिक शिक्षा प्रदान नहीं की जाएगी। और अगर किसी गैर सरकारी स्कूल में धार्मिक प्रार्थना कराई जाए तो बिना परिजनों की अनुमति के किसी बच्चे को प्रार्थना में शामिल नहीं किया जा सकता। सुनकर अचंभित से ज्यादा बुरा नही लगा क्योंकि अनैश्वरवादी होने के बावजूद उस समय राजनीती कुछ न कर सका। हालांकि अब जो लिख रहा हूँ वो स्कूल के लेवल पर नहीं बल्कि देश के लेवल का मसला है। भारतीय लोगों की संवैधानिक शुचितावादी सोच केवल कोरा पाखंड है। चारों ओर नकली जातिवादी वंदन और कीर्तन चल रहे है, शादी ब्याह के मंडपो में संविधान पढ़ा जा रहा और मस्जिदों में भारत का बच्चा-बच्चा श्री राम से गुंज रहा है, लोग आपदा में अवसर जैसे वाक्य इस्तेमाल करते हैं अपनों के बीच, युद्ध में मौतें बंटी हुई हैं, बलात्कार संस्कृति के उन हिस्सों में जायज है जहां रसूखदारों की अहमियत कानून से बड़ी है। सनातन अखंड पाठ से फलता फूलता है और अब समाज अखंड पाखंड से फल फूल रहा। नवबौद्धइज्म के नाम पर इस देश ने मासूम बच्चियों और बुजुर्ग महिलाओं की अस्मिता को सबसे ज्यादा तार-तार किया गया है। इसके बावजूद हर दिन गर्व करने वालों और सनातन संस्कृति की दुहाई देने वालों की फौज बढ़ती जा रही है। मुक्तिबोध के शब्दों में यही बात आती है । मर गया देश, अरे जीवित रह गये तुम।
मेरे आंकलन के हिसाब से हमारे संविधान की प्रस्तावना में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि हम एक धर्मनिरपेक्ष राज्य हैं और अनुच्छेद 25-28 को अगर ‘एस आर बोम्मई बनाम भारत संघ, एआईआर 1994 एससी 1918’ के साथ पढ़ा जाता है तो यह तथ्य प्रबल रूप से पुष्ट हो जाती है कि “धर्म और राजनीति को एक साथ नहीं मिलाया जा सकता है। यदि राज्य धर्मनिरपेक्ष नीतियों या कार्रवाई के तरीकों का पालन नहीं करता है तो यह संवैधानिक आदेश के विपरीत कार्य करता है। राज्य के मामले में धर्म का कोई स्थान नहीं है। भारत में सभी व्यक्तियों को मौलिक अधिकार के रूप में धर्म की स्वतंत्रता की गारंटी दी गई है, लेकिन राज्य के दृष्टिकोण से, धर्म, आस्था और विश्वास सारहीन हैं। कभी-कभी यह तर्क दिया जाता है कि भारत में धर्मनिरपेक्षता की अवधारणा पश्चिम से आयातित की गई है। लेकिन यह बात गौर करने लायक है कि पश्चिम में चर्च और राज्य का सख्त अलगाव फोकस का केंद्रीय क्षेत्र है, जबकि भारत में शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व मुख्य फोकस है। भारत में राज्य और धर्म के बीच अलगाव की दीवार झरझरी है, यानी राज्य हर धर्म के भीतर प्रगतिशील आवाज़ों को बढ़ावा देने के लिए धर्म में हस्तक्षेप कर सकता है। उदाहरण के लिए, अस्पृश्यता का उन्मूलन (हिंदुओं के बीच) और तीन तलाक का उन्मूलन (मुसलमानों के बीच)। हालाँकि, धर्म को राज्य के मामलों में हस्तक्षेप करने से प्रतिबंधित किया गया है, धार्मिक आधार पर चुनावी समर्थन जुटाने की अनुमति नहीं दी गई है। कुछ लोग यह तर्क दे सकते हैं कि प्रधानमंत्री धर्म से हिंदू/सनातनी हैं इसलिए उन्हें ये अनुष्ठान करने का पूरा अधिकार है लेकिन – और यह एक बड़ी बात है – जब उन्होंने अयोध्या (भूमिपूजन), नए संसद भवन और प्रगति मैदान परिसर (कई अन्य आयोजनों के बीच) जैसे राष्ट्रीय महत्व की प्रतिष्ठित इमारतों का उद्घाटन जैसे कई स्थानों पर हिंदू अनुष्ठान किए और रक्षा मंत्री ने नींबू मिर्च से रफ़ाएल विमान की नज़र उतारी, तो कुछ लोगो को चुभी पर यह सनातन के दृष्टि से सही है, उन्होंने इसे ही चिह्नित किया कि उनकी उपस्थिति एक आम सनातनी नागरिक के रूप में है, बल्कि एक संवैधानिक पद पर बैठे एक निर्वाचित प्रतिनिधि के रूप में नही है और संविधान के अनुसार जिसे राज्य कहा जाता है वह उसका प्रतिनिधित्व वहां के सीएम करते हैं। ऐसा नहीं है कि पहले ऐसा कभी नहीं हुआ है, लेकिन जिस तरह से इन सभी प्रथा को वर्तमान विपक्ष ने परोक्ष एवं अपरोक्ष रूप से महिमामंडन करके नॉर्मलाइज़ कर दिया है और राज्य एवं धर्म के बीच की लकीर को धुंधली कर दी है वह एक बेहद बुरी नज़ीर बनेगा आगे आने वाली सरकारों के लिए। और तो और उनके अनुगामियों ने तो यह मानने से ही इनकार कर दिया है कि यह संविधान का खुलेआम उल्लंघन है क्यूंकी उनके हिसाब से यह संविधान अखंड भारत के उनके दिवास्वप्न की ओर ले जाएगा और भारत का गौरवशाली इतिहास अपने धार्मिक आयोजनों के लिए रहा है, साधु महात्मा और मुनियों के लिए रहा है । इससे स्पष्ट रूप से एक संप्रभु राष्ट्र के संविधान का उल्लंघन हो रहा है। क्या वह उन्हीं कानूनों और अदालतों के प्रति जवाबदेह होंगे जैसे हम नागरिक हैं ! हर उम्र के दोस्त होने चाहिए आपके पास। इससे यह समझ में आता है कि अलग-अलग पीढ़ियाँ दुनिया को कैसे देख रही हैं। आज एक मेरे छोटे दोस्त ने सवाल किया। पिछले साल उसने इंजीनियरिंग में एडमिशन लिया है। उसने पूछा, आख़िर रील देखने में बुराई क्या है? आप हमेशा इसके ख़िलाफ़ रहते हैं। मान लीजिए किसी के पास समय है, पैसिव इनकम है, नॉन ऑफिस गोइंग लोग हैं, बुजुर्ग भी हैं। अगर इससे डोपामिन रिलीज़ हो रहा है और खुशी मिल रही है तो लेने दीजिए। हर कोई डोपामिन के लिए कुछ न कुछ करता ही है। आप खुद लोगों से मिलते हैं, जिम जाते हैं, उससे आपका डोपामिन रिलीज़ होता है। मैंने कहा, वाह गुरु, सवाल तुम्हारा बिल्कुल ठीक है। लेकिन दुनिया केवल डोपामिन में ही नहीं है, सेरोटोनिन भी है दोस्त। मैंने उससे कहा, तुम जानते हो ‘हैप्पी’ यानी प्रसन्न और ‘आनंद’ में अंतर होता है। शायद इसी वजह से हमारे यहाँ भगवान को सच्चिदानंद कहा गया है। सत्, चित् और आनंद। यानी ऐसा सुख जो क्षणिक उत्तेजना नहीं बल्कि स्थिर अनुभव हो। यहीं से असली फर्क शुरू होता है। डोपामिन वह केमिकल है जो दिमाग को तुरंत मिलने वाले इनाम से जुड़ा है। कोई नई चीज़ दिखी, लाइक मिला, गेम जीते, नई रील दिखी, कुछ सेकंड की हंसी मिली, दिमाग कहता है अच्छा लगा, फिर करो। इसलिए डोपामिन का खेल हमेशा “नेक्स्ट” पर चलता है। एक रील खत्म, दूसरी शुरू। एक वीडियो खत्म, अगला शुरू। यह तंत्र दिमाग को उत्तेजना देता है, लेकिन उसे स्थिर नहीं करता।इसलिए डोपामिन आधारित खुशी अक्सर बेचैन होती है। थोड़ी देर बाद फिर वही खालीपन लौट आता है और दिमाग फिर कुछ नया ढूंढने लगता है। सेरोटोनिन का मामला थोड़ा अलग है। सेरोटोनिन उस संतोष से जुड़ा है जो धीरे-धीरे बनता है। सुबह की धूप में टहलना, किसी काम को पूरा करना, किसी के काम आना, पढ़ना, सीखना, शरीर को मेहनत देना, किसी रिश्ते में गहराई महसूस करना। यह चीजें तुरंत उत्तेजना नहीं देतीं, लेकिन मन को स्थिर करती हैं। अगर आसान भाषा में कहें तो डोपामिन “उत्तेजना” देता है, सेरोटोनिन “संतोष” देता है। रील्स का मसला यही है। वे पूरी तरह डोपामिन के तंत्र पर बनी हैं। हर कुछ सेकंड में नया दृश्य, नया मज़ाक, नया झटका। दिमाग को छोटे-छोटे इनाम मिलते रहते हैं। इससे समस्या यह नहीं है कि खुशी मिल रही है। समस्या यह है कि दिमाग धीरे-धीरे उसी तरह की तेज उत्तेजना का आदी हो जाता है। फिर वही दिमाग किताब के दस पन्ने पढ़ने में बेचैन हो जाता है। किसी गंभीर बातचीत में टिक नहीं पाता। एक घंटे का काम भारी लगने लगता है। हमेशा नयापन कहाँ मिलेगा ? यानी धीरे-धीरे हमारा ध्यान तंत्र बदल जाता है।अब ध्यान नहीं लगता है । मैंने उससे कहा, रील देखना अपराध नहीं है। लेकिन अगर दिमाग को केवल डोपामिन की ट्रेनिंग मिलती रहे और सेरोटोनिन वाली चीजें कम होती जाएं, तब जीवन में उत्तेजना तो बहुत होगी, पर संतोष कम होगा। शायद इसलिए हमारी परंपरा ने खुशी के लिए “आनंद” शब्द चुना। आनंद वह है जो उत्तेजना के बाद भी बचा रहता है। जो शोर के बाद भी भीतर शांत रहता है। जो खत्म होने के बाद भी मन में बना रहता है। और यही अंतर है, डोपामिन वाली खुशी और सेरोटोनिन वाले संतोष के बीच।
