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प्रेम की संपूर्णता–डॉ शिप्रा मिश्रा

            प्रेम में ऊब-डूब मत देना गुलाब जो मुरझा जाएँ किताबों में रखे सुषमा सौंदर्य मौलिकता सब भूल जाएँ देना इत्र में भीगे गुलाबी पत्र जिसे नोटबुक में पढ़ा जा सके नजरें बचाकर जब जहाँ जैसे जी चाहे रखा जा सके सहेजकर उन तमाम प्रेमी युगल के लिए जानते हैं जो प्रेम की मौन मूक…

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यह दिवाली : खुशियों वाली

ये जो इस बार 2025 की दिवाली है  बहुत ही खुशगवार और निराली है खूब मज़बूत हो आपसी प्यार और भरोसा  उसी से ज़िंदगी गुलज़ार और खुशहाली है  प्रदूषण और पटाखों का असहनीय शोर  करे है सांसों की डोर को कमज़ोर  टा – टा बाय बाय कहो उसको नो मोर  फ़िर, चिंता की दरकार ही…

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राजनीति का बदलता स्वरूप

-अनीता गौतम  (प्रवक्ता एवं साहित्यकार)  कैसा लोकतंत्र है यह कैसा प्रजातंत्र है,??  मेरी बात मानो यारों यह तो भीड तंत्र है। कि अधरों पे सिर्फ जहां जाति -धर्म का मंत्र है , खतरे में देखिए आज प्रजातंत्र है। कि  तानाशाही ने दबोच रखी गर्दन संविधान की, हम सब तमाशबीन हैं ,माफिया स्वतंत्र है।,,,,,,,,  ,,,,,,जी हां…

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महकता गुलाब

तुम्हारे कांटे भी तुमको बचा न पाएंगे, इतना मत महको लोग तोड़ के ले जाएंगे। प्यारी सूरत पै तुम्हारी न रहम खाएंगे, तुम्हारे अश्क किसी को नजर न आएंगे, तुम्हारा सीना छेद गूंथ लेंगे माला में, तुम्हारे घाव जरा भी नहीं सहलाएंगे। तुम्हारे दर्दे दिल को देव पर चढ़ायेंगे। इतना मत महको लोग तोड़ के…

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मन-मन्दिर में

तब बचपन में घर के आँगन में बने मन्दिर में, मन्दिर के सामने रखे तुलसी के बिरवे को जल चढ़ाते हुए तुम्हारा ख्याल आता था                      ‘  मोहन ‘ तुम्हारा हँसना मुरली बजाना यमुना-तट पर गोपियों को रिझाना रिसियाना, अकुलाना और बुलाना कितना मधुमय लगता था तुम्ही मेरे कृष्णा हो, राधेय हो ज्ञेय-अज्ञेय हो, तुम्हीं…

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हालात की सौग़ात : आरती परीख

बिमल खिड़की के पास बैठा बाहर झाँक रहा था। हवा धीरे-धीरे परदों से खेल रही थी। आसमान पर बिखरे बादल धूप को ढक रहे थे, जैसे कोई अनकही चुप्पी घर पर फैल गई हो। लेकिन बिमल का मन इस चुप्पी से ज़्यादा भारी था— कल रात से भीतर उमड़ा तूफ़ान अब भी थमा नहीं था।…

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स्वतंत्रता दिवस की  हार्दिक  शुभकामनाएं,

डॉक्टर सुधीर सिंह , शेखपुरा, बिहार पूर्व  प्राचार्य एवं सेवानिवृत विभागाध्यक्ष (भौतिकी) मां भारती पूरी करें सबों की मनोकामनाएं।सबका जीवन यहां स्वस्थ-सुखी-समृद्ध रहे,समर्पित भाव से सब  राष्ट्रहित में लग जाएं। प्रगति के पथ पर बढ़ते रहने का संकल्प लें,बाधाओं को कुचल कर अपना लक्ष्य पा लें।दृढ़-आत्मविश्वास के साथ प्रयास करते हुए,भारत को विश्व गुरु बनाने…

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लघुकथा: “चार बजे की माँ”

(लेखिका: डॉ. प्रियंका सौरभ) सुबह के चार बजे थे। बाहर अभी भी अंधेरा पसरा था, मगर प्रियंका की नींद खुल चुकी थी। अलार्म बजने से पहले ही उसकी आँखें खुल गई थीं — जैसे उसकी जिम्मेदारियाँ अलार्म से भी पहले जाग जाती हों। बिस्तर छोड़ते ही ठंडी ज़मीन पर पैर रखते हुए एक ही ख्याल…

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ग़ज़ल : आशुतोष द्विवेदी

हारी, थकी, उदास निगाहें जाग रहीं, ज़ख्म सो गए मगर कराहें जाग रहीं। अब वे रातें सपनों जैसी लगती हैं, हमें सुलाकर गोरी बाहें जाग रहीं। चिंता करते-करते चिता हो गए हम, राख में अब भी बिखरी चाहें जाग रहीं। बेदम होकर झपकी लेते पाँवों में कब से उलझी-उलझी राहें जाग रहीं। कबके उजड़े उम्मीदों…

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चौड़ाई और गहराई : आरती परीख

लघुकथा डॉक्टर ने कहा — “आपके पास बस छह महीने हैं।” रवि थोड़े दर्द के साथ, पर हल्के से मुस्कुराकर बोला — “छह महीने…? काफी हैं, जीने के लिए….” घर लौटते ही उसने अपनी टू-डू लिस्ट जला दी — वो लिस्ट; जिसमें प्रमोशन, नया घर, कार और सामाजिक प्रतिष्ठा दर्ज़ थी। अब वो हर सुबह…

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