कविता और कहानी
मन-मन्दिर में
तब बचपन में घर के आँगन में बने मन्दिर में, मन्दिर के सामने रखे तुलसी के बिरवे को जल चढ़ाते हुए तुम्हारा ख्याल आता था ‘ मोहन ‘ तुम्हारा हँसना मुरली बजाना यमुना-तट पर गोपियों को रिझाना रिसियाना, अकुलाना और बुलाना कितना मधुमय लगता था तुम्ही मेरे कृष्णा हो, राधेय हो ज्ञेय-अज्ञेय हो, तुम्हीं…
हालात की सौग़ात : आरती परीख
बिमल खिड़की के पास बैठा बाहर झाँक रहा था। हवा धीरे-धीरे परदों से खेल रही थी। आसमान पर बिखरे बादल धूप को ढक रहे थे, जैसे कोई अनकही चुप्पी घर पर फैल गई हो। लेकिन बिमल का मन इस चुप्पी से ज़्यादा भारी था— कल रात से भीतर उमड़ा तूफ़ान अब भी थमा नहीं था।…
स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं,
डॉक्टर सुधीर सिंह , शेखपुरा, बिहार पूर्व प्राचार्य एवं सेवानिवृत विभागाध्यक्ष (भौतिकी) मां भारती पूरी करें सबों की मनोकामनाएं।सबका जीवन यहां स्वस्थ-सुखी-समृद्ध रहे,समर्पित भाव से सब राष्ट्रहित में लग जाएं। प्रगति के पथ पर बढ़ते रहने का संकल्प लें,बाधाओं को कुचल कर अपना लक्ष्य पा लें।दृढ़-आत्मविश्वास के साथ प्रयास करते हुए,भारत को विश्व गुरु बनाने…
लघुकथा: “चार बजे की माँ”
(लेखिका: डॉ. प्रियंका सौरभ) सुबह के चार बजे थे। बाहर अभी भी अंधेरा पसरा था, मगर प्रियंका की नींद खुल चुकी थी। अलार्म बजने से पहले ही उसकी आँखें खुल गई थीं — जैसे उसकी जिम्मेदारियाँ अलार्म से भी पहले जाग जाती हों। बिस्तर छोड़ते ही ठंडी ज़मीन पर पैर रखते हुए एक ही ख्याल…
ग़ज़ल : आशुतोष द्विवेदी
हारी, थकी, उदास निगाहें जाग रहीं, ज़ख्म सो गए मगर कराहें जाग रहीं। अब वे रातें सपनों जैसी लगती हैं, हमें सुलाकर गोरी बाहें जाग रहीं। चिंता करते-करते चिता हो गए हम, राख में अब भी बिखरी चाहें जाग रहीं। बेदम होकर झपकी लेते पाँवों में कब से उलझी-उलझी राहें जाग रहीं। कबके उजड़े उम्मीदों…
चौड़ाई और गहराई : आरती परीख
लघुकथा डॉक्टर ने कहा — “आपके पास बस छह महीने हैं।” रवि थोड़े दर्द के साथ, पर हल्के से मुस्कुराकर बोला — “छह महीने…? काफी हैं, जीने के लिए….” घर लौटते ही उसने अपनी टू-डू लिस्ट जला दी — वो लिस्ट; जिसमें प्रमोशन, नया घर, कार और सामाजिक प्रतिष्ठा दर्ज़ थी। अब वो हर सुबह…
पौरुष पीड़ा, .…
*हाॅं मैं भी इंसान हूॅं* हॉं मैं पुरुष हूॅं मान हूॅं मुझे भीसम्मान हे। पौरूष का मुझमें भी निज अभिमान हे ! कठोरबल पराक्रमशक्ति साहस परिपूर्ण । अहंकार है मुझ में गर्व अपनी में आन हूॅं । कठिन हूॅं जटिल हूॅं मान भर ये शान है। करता मैं निजता में भी पूरा अभिमान हूॅं…
सावन का भोर
(ग़ज़ल) सावन का ऐसा!भोर होते देखा। घनों काआपसीशोर होते देखा। ब्रह्माण्ड की थी ऐसी जगमगाहट। धरा को सुंदरऔर गोर होते देखा। सावन का ऐसा।।।।। पवन के झोंके हिलाए वटों को। बारिश का पानी जोर होते देखा। सावन का ऐसा।।।।। फूली चमेली है घर पर जो मेरे। उसकोभी मौजे विभोर होते देखा। सावन…
काश हर चीज़ गुलाबी हो जाती
काश हर चीज़ गुलाबी हो जाती फिर अन्य रंगों का क्या होता इंद्रधनुष में सात रंगी न होता आसमां नीला न होता और फूल,फल सब बहुरंगी न होते पत्तों का रंग हरा न होता न ही धरती अंतरिक्ष से काली दिखती न ही अंधेरे का कोई सम्राज्य होता। काश हर चीज़ गुलाबी हो जाती गोरी…
