कविता और कहानी
योग जीने का विज्ञान
योग नहीं साधारण नाम है, योग तो जीने का ज्ञान है। भौतिक अध्यात्मिक भाव, आत्मिक हो या मानसिक। योग एकता का संदेश है, चेतना को करता एक है। भावनाओं का संतुलन करे, तालमेल बनाए मदद करे। बाहरी हो चाहे आंतरिक, दोनों तरह से पहुंचाता लाभ। मांसपेशियां और नसों को, कहता सद्भाव में कार्य करो। दिमांग…
जीवन का आधार योग
योग: कर्मसु कौशलम् अर्थात कार्य में कुशलता ही योग है योग का अर्थ है जुड़ना जब हम किसी कार्य या विचार के साथ जुड़ जाते हैं तो वह योग कहलाता है योग हमारे तन और मन को जोड़ता है योगिक क्रियाएं ना केवल शारीरिक क्रियाओं को प्रभावित करती हैं अपितु मन पर भी सकारात्मक प्रभाव…
खुशी का गीत
गजेन्द्र अधाना जी = वन गए नाना जी। किस्मत ने खोल दिया देखो खजाना जी। खुशियों की मिली मिठास रे ओए बल्ले बल्ले। देखो पूरी हो गई आस रे ओए बल्ले बल्ले आप सब को मुबारक हो = स्वस्थ सुंदर बालक हो। बालक वो प्रति पालक हो = देश का अच्छा नायक हो…
खुशी का गीत
गजेन्द्र अधाना जी = वन गए नाना जी। किस्मत ने खोल दिया देखो खजाना जी। खुशियों की मिली मिठास रे ओए बल्ले बल्ले। देखो पूरी हो गई आस रे ओए बल्ले बल्ले आप सब को मुबारक हो = स्वस्थ सुंदर बालक हो। बालक वो प्रति पालक हो = देश का अच्छा नायक हो…
21जून अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस पर
23 सितंबर 2014 को संयुक्त राष्ट्र महासभा में श्री श्री रविशंकर जी के नेतृत्व में विश्व योग दिवस के रूप में, संयुक्त राष्ट्र और यूनेस्को द्वारा घोषित करने के लिए हस्ताक्षर किए गए। इसलिए श्री श्री रविशंकर जी को योग का संस्थापक कहा जाता है। 21 जून 2015 को भारत के प्रधानमंत्री श्री मोदी जी…
डॉक्टर सरोजिनी प्रीतम कहिन
आदर्श छात्र ने कहा-आचार्य महासमर के लिए आदर्श स्थिति कहो वे हंसकर बोले’- आखों पर पटटी-/ बुद्धि पर पर्दा और सेनापति – धृतराष्ट्र हो ठाठ धोबी के कुत्तों के न तो – घर –घाट फिर भी – अलग ही ठाठ नमक आमलेट खाने लगे … स्वाद बिगड़ गया पत्नी पर चिल्लाये … घर में नमक…
लघुकथा – कर्मठ : डोली शाह
बचपन में ही राहुल को मां छोडकर इस दुनिया से चली गयी तो पिता ने घर के साथ खेती-बाड़ी का काम संभाल कर मा की कमी को पूरा करते हुए उसकी परवरिश की । राहुल भी जब कुछ बडा हुआ तो वह भी पिता के हर कार्यों में हाथ बंटाता साथ मे पढने के लिए …
देवेन्द्र पाठक ‘महरूम’ की ग़ज़लें
एक धुँआते ही न रहो सुलगके जलो दहको जलाके ख़ाक करो हर सियासती छल को घुन गये बांस- बत्ते, धसक रहीं दीवारें वक़्त रहते बचा लो टूटते- ढहते घर को जो आहे- दीनो- बेकुसूर कहर बरपा दे बचा न पाओगे अपने ग़ुरूर के घर को लहू भाई का सगे भाई के लहू से ज़ुदा दे…
ख्वाबों में टहलती है
रह-रह के बुलाती है,तेरी याद अकेले में। इन पलकों की गलियों में , आवारा घूंमती है। ख्वाबों में टहलती है,तेरी याद अकेले में। पागल सी बनाती है, दीवानी बनाती है, मस्ताने गीत लिखती,तेरी याद अकेले में। जब आती है चुपके से, मुस्काती है धीरे से, सीने से लिपटती है,तेरी याद अकेले में। छूकर तुझे आती…
