कविता और कहानी
मकर संक्रांति
मकरराशि में सूर्यदेव करते प्रवेश बढ़ती अवधि इस दिन से दिन के । जाड़े का प्रभाव दिन दिन घटता बढती जाती सूरज की है ऊर्जा। शिथिल शरीर पाता स्फूर्ति नव कस जाते मशीन में कल पुर्जा। काँप रहा ये जाड़ा अब खुद ही बीते समय इसका गिन गिन के। लोग मनाते पर्व बड़े ही विधि…
चांदनी मुस्कराई तुम्हारे लिए,
चांदनी मुस्कराई तुम्हारे लिए, वर्णमाला गुनगुनाई तुम्हारे लिए, तुम्हारे आगमन पर सखें, मेरे हृदय की बधाई तुम्हारे लिए। चांद बन तुम जियो, नेह की नूतन छुवन बन जियो, भावना से भरे इस हृदय में, तुम हमारे नयन में सुमन बन जियो। मेरे परिचय बन तुम जियो, मेरा मुकाम बन तुम जियो, जिंदगी अपनी पूरी सफल…
वासंतिक दोहे
छे ऋतुओं का अंजनी,अपने यहां विधान। रहता है दो माह तक,वसंत ऋतु का मान।। माह चैत-बैशाख में,खुशी लाता वसंत। शोभा बढ़ता धरा की, चारो तरफ अनंत।। ऋतुओं के अनुरूप ही,बदलता खान-पान। भंवरे और तितलियां,करती हैं गुणगान।। चारो ओर सज जाते,वन-उपवन,घर-द्वार। बहती रहती हर तरफ,मस्त फगुआ बयार।। आता फूल में पराग, औ बाग में बहार। सुहाते…
सिविल सेवा कविता
हर कोई देखे सिविल का ख्वाब बड़ी शानो-शौकत बड़ा है नाम बेहद चुनौतीभरा इसका सफर बहुत कठिन है इसका एक्जाम। कैसे बने हम आईएएस पीसीएस कैसे बने हम अफसर अधिकारी हर अभ्यर्थी की यही है चिन्ता कैसे करें हम सिविल की तैयारी। माजिद हुसैन की पढ़ो भूगोल लक्ष्मीकान्त की राजव्यवस्था बिपिन चंद्रा का पढ़ो इतिहास…
तुम्हारे आगमन से
इक तुम्हारे आगमन से खिली धरा, फैला उजास सृष्टि के कण कण में दिखता नित नया ही अब हुलास….. मन ने भँवर बांध तोड़े छोड़ बैठा हर प्रवास नव स्वप्न जीवित हो उठे दृष्टिगत है अब विभास….. प्रेम अनुभूति में भी है नवीन कल्पना का वास सब धुला व सजा है ज्यों आयोजन हो ख़ास…….
लो कर गए प्रवेश नए वर्ष में फिर हम.
लो कर गए प्रवेश नए वर्ष में फिर हम बस देखते रहे गुज़रते पलों को हम l जाता हुआ साल इतिहास लिख गया क्या पाया हमने खोया सब हिसाब लिख गया कुछ हसरतें थीं दिल में जो पूरी न हो सकीं कुछ पल खुशी के साथ मेरे नाम लिख गया लेकर नई आशाएं बढ़ें सबके…
दिल वालों की दिल्ली
गीतिका छंद विधाता मापनी- 1222 1222 1222 1222, समांत -आना, पदान्त-तुम कभी दिल्ली रुको तो बिन इसे देखे न जाना तुम। पुरानी अब नहीं यह आज देखो फिर बताना तुम ।1। यहाँ चारों तरफ हैं वन हरित उपवन हजारों में, प्रदूषणमुक्त दिल्ली के लिए पौधा लगाना तुम।2। यहाँ उपलब्ध हैं उत्कृष्ट पथ, बस, रेल सेवाएँ,…
नववर्ष आ गया…….
बागों में कूके कोयल, भौरें विचर रहे हैं।बागों पे आया यौवन,कविमन खिल गए हैं।हरियाली से धरा का,सौन्दर्य बढ़ता जाए।नववर्ष आ गया है , ऋतुराज मुस्कुराए ।कलियाँ चहकती हैं,खुशियों से चमन गाये।ख्वाहिशें नई जगी है ,इरादे बदल गये हैं, ।रेतों के भी परिन्दे , हरियाली में मुस्कुराए।मंजिलों के नए सपने , अब जन्म ले रहे हैं…
लौटें एक सार्वभौम संस्कृति की ओर —
यद्यपि यह एक सार्वभौमिक विषय है , किसी स्थानविशेष से ही सम्बद्ध नही। मानवता के नाम पर कलंक समझी जाने लायक यह समस्या पुरुषों की सबलता के आदिकालीन अहंकार से जुड़ी है। किन्तु आज भी सभ्यता के शिखर पर पहुँचने का दावा करनेवाला यह जगत महिलाओं के साथ इस प्रकार के व्यवहारों को अंजाम दे…
