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पितृदिवस पर कनाडा से “मनस्विनी” समूह के सभी सदस्यों के सहयोग से स्वरचित पंक्तियां

न मेरी आंख ही फड़कीन ही हिचकियाँ आईंमगर फिर भी यें लगता हैंकि कोई याद करता हैं….वो ओर कोई नहीं मेरे पापा…पापा की दुलारी,थोड़ी बिगड़ी, थोड़ी प्यारीसुबह जल्दी जगाते हैं पापा,नौ बजे रात मैं बत्ती बुझाते हैसदैव याद में आतेमेरे प्यारे पापाउनकी दिलचस्प बातेंज्ञान से भरी नसीहतेंउनकी किताबों का भंडारअनुशासन में छिपा प्यारमेरे प्यारे पापापापा…

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गुरु महिमा

हे गुरुदेव! प्रथम वंदन आपको साक्षात दण्डवत प्रणाम , बिना गुरु के ज्ञान अधूरा , फिर -फिर  गोता खाय, गुरु मंत्र को आत्मसात कर , भव सागर पार कर जाय। गुरुदेव मानव को नवजीवन देते , गुरुदेव मानव का तिमिर मिटाते, गुरुदेव मानव को प्रकाशवान बनाते , गुरुदेव हृदय में ज्ञान दीप जलाते, गुरुदेव ही…

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हर धड़कन हो आरती वँदन

कविता मल्होत्रा (संरक्षक – स्तंभकार, उत्कर्ष मेल) मीरा सा अरमान बनें, सब नई उम्मीदों का आसमान बनें विषपन करके भी सोचें यही, हर साँस का इस्तेमाल कैसे हो ✍️ लगभग दो वर्ष पूरे होने को आए, लॉकडाऊन का शाब्दिक अनुवाद नई सदी को परिभाषित करने लगा है।लेकिन तमाम महकमों की तालाबंदी के बावजूद भी अँतर…

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“समर्पण से मिलती है राह।”

समर्पण का अर्थ है “समस्त अर्पण” उस सर्वशक्तिमान के समक्ष जिसने हमें बनाया है। किसी निर्धारित उद्देश्य से हर प्राणी को पृथ्वी पर भेजा है। जब आप समर्पण भाव से जीवन को बिताते हैं तो सभी मुसीबतों से अपना नाता तोड लेते हैं। जो जैसा है उसे वैसा ही स्वीकार कर लेते हैं। ईश्वर के…

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दिल के ज़ख़्म…..

ज़ख़्म अल्फ़ाज़ों के थेदवा करते भी कैसेख्वाबो आंखों ने देखे थेमुक़्क़मल होते भी कैसे सब ख़त्म हो रहा थामेरी आँखों के सामनेतदबीर कुछ होती तोफ़ना होते भी कैसे फ़ासले न होते तोज़ुदा होते भी कैसेमल्लिका ए दिल थीदग़ा देते भी कैसे तड़प दिल कीअब रुकती नही हैबिते हुये पलों कीकहानी बनेगी कैसे…. आरिफ़ असासदिल्ली

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एक दिन सब यहीं छूट जाएगा

यह दुनिया तो है एक सराय यहां कभी कोई आए तो कभी कोई जाए फिर भी लगी है सबको पैसों की हाय हाय यह पैसा भी एक दिन रूठ जाएगा एक दिन सब यहीं छूट जाएगा। चार दिन की चांदनी, फिर अंधेरी रात सुख दुख तो है एक आनी जानी बात हैवानियत के मोहरों की…

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अंतिम प्रताड़ना

आंचल ने बी.ए. की परीक्षा दी थी। आंचल के माता पिता (रमा व चेतराम )ने उसका विवाह एक छोटे शहर में अमल नाम के लड़के से कर दिया। एक कंपनी में नौकरी करता था।आंचल के ससुराल वालों को मायके के लोगों का आना-जाना बिल्कुल पसंद नहीं था।आंचल कोई भी काम करती थी उसे तायने ही…

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जब कभी

जब कभी महफिल भी रुलाने लगे। तन्हा-तन्हा पल जब सताने लगे।। हमको आवाज देना मगर दिल से तुम। चाहे इसके लिए अब जमाने लगे।। रिश्ते हर रोज बनते हैं मिटते यहां। दिल लगाना यहां बस फसाने लगे।। ग़मों से अगर बात हो अपनी कभी। इन्तहां में भी हम मुस्कुराने लगे।। रंग भरते हैं ख्वाबों में…

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पिता

हो मजदूर हो फेरीवाला हो रिक्शेवाला हो ठेलेवाला हो कारीगर हो दुकानदार हो ऑफिस कर्मी हो नेता हो अभिनेता हो टाटा, बिरला,अम्बानी हो गरीब या मध्यम या अमीर या करोड़पति पिता तो पिता ही होता है सिर्फ बच्चों की मुस्कान के लिये हर मौसम की मार- हो चिलचिलाती धूप, लू, तेज़ बरसात, आंधी, तूफान या…

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जा रहा है कोरोना

जा रहा है कोरोना लेकर कितनों की जान कितनों की बर्बादी ,कितनों का ईमान इतिहास गवाही देगा, उनकी तबाही की गूंजती है जिनके रोने की आवाज खुलने लगे हैं बाजार होने लगी है चहल पहल सुनाई देने लगी गानो की आवाज,पर गूंजती है उनके रोने की आवाज छिन गई है जिनके घरों में रोटियां बुझ…

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