कविता और कहानी
दादी का दर्द
हंसो दादी लगभग 70 वर्ष की थीं।वह अपने पोते के साथ शहर में एक छोटे से मकान में रहती थीं।जिसमें एक ही कमरा था।दादी के साथ उनका पोता निखिल रहता था। वह अपने बेटे बहू को खो चुकी थीं।दादी को कुछ पैसे पति की पेंशन से मिलते थे।दादी कीपैड मोबाइल चलाया करती थीं।निखिल की जिद…
हर बार जीतना जरूरी नहीं है
हर बार जीतना जरूरी नहीं है कभी-कभार हार भी जाया करो। सारी बाजियों में दिमाग का काम नहीं होता, कभी दिल भी लगाया करो।। और हमें यूँ टकटकी लगा कर ना देखते रहा करो। कभी-कभार अपनी पलकों को भी झपकाया करो।। दोस्त, तमाम उम्र किसी का साथ तुम ना दिया करो। नए पंछियों को खुद…
लघुकथा “माघी पूर्णिमा”
माघी पूर्णिमा था।युगल बाबू अपनी पत्नी के साथ गंगा नहाने की योजना को साकार करने घर से निकलने की तैयारी कर रहे थे।धार्मिकता से रोम-रोम में डूबी पत्नी बहुत खुश थी।अपना साड़ी कपड़ा एक झोले में रख याद कर पूजा का सभी सामान अन्य झोले में रख एक तांबा का लौटा खोजने लगी।तभी उनका प्यारा…
टूटती उम्मीदों की उम्मीद
इतनी वेदना इतनी बेबसी इतनी लाचारी के बाद थोड़ी सी जगने लगी थी देख कम होते तेज़ी से बढ़ रहे आँकड़े, अस्पताल की कम हुई मारामारी ऑक्सीजन की किल्लत से राहत मौत में भी कमी इस तरह टूटती उम्मीदों की उम्मीद लगी थी बंधने अब सुधर जाएंगे हालात पर मानो हालात ने फिर दी चोट…
अनुत्तरित प्रश्न
आज भारत ही नहीं पूरा विश्व ही इस कोरोना के चपेट में आया हुआ है। कितने घरों से तो पूरा परिवार ही साफ हो गया । कितने लोग ऐसे भी हैं जो मंहगी दवाइयाँ खरीदते खरीदते बर्बाद हो गये, किसी के जेवर बिके तो किसी के मकान और दुकान तक बिक गये वह भी कौड़ियों…
मुर्दों का मोहल्ला
हो गया हल्ला जब मिला मुर्दों का मोहल्ला खुले आसमान में गंगा की गोद में सोये हुए प्राणहीन आप के सगे संबंधी। कौन है? जिम्मेवार! जिन्हें छोड़ कर बालू की रेत में चले जा रहे अपना कर्म पूर्ण कर। बनाकर विविध पंथ, धर्म, पाखण्ड में पड़कर! अपनों को ही चील , कौओं के हवाले कर…
अभी कोरोना काल ही है।
विगत वर्ष कोकोरोना वर्ष कानाम देकर उससे सम्बन्धित सारे दस्तावेजों कोसहेजकर रखना चाह रहे थेकिआवश्यकता पड़ने परउसे उलट पुलट करउसकी भयावहता की कल्पना कर लेंऔर आगामी किसी प्रकार के वायरल प्रकोपों में उसका तुलनात्मकअध्ययन कर सकें, और वह इतिहास मे अंकित व्यथा गाथा हो जायकि अचानक कोरोना ने पुनःदुगुने चौगुने वेग से साँसें लेनी शुरु…
“ईश्वर सत्य है।”
समाज में भी बड़ी प्रतिष्ठा थी। परन्तु अचानक कम्पनी घाटे में चली गई। देखते ही देखते वो कर्ज में डूब गए। हवेली भी गिरवी रखी गई। आमदनी के सभी स्रोत बन्द और व्यवसाय ट्ठप्प हो गया। उद्दमी व्यक्ति थे, फिर से प्रयास करने लगे परन्तु बात बन नहीं रही थी। नौकरी भी तलाश की। मिली…
व्यंग्य :: कोरोना काल की शादी
कोरोना काल में मैं दावतों को तरस गया था।वैसे एक साल में लगभग बीस दावतों का आनंद ले लेता था । जिस दिन दावत होती थी, उस दिन मेरे चेहरे पर रौनक आ जाती थी । दिन भर व्यंजनों के सपनों में खोया रहता था। उस दिन मैं कुछ भी नही खाता था। शाम को…
