कविता और कहानी
आंधियों में चिराग जलना…
प्रवीण बहल (विकलांग रत्न) किसने देखा है आंधियों में चिराग जलनाअंधेरों में चराग जलना तो सब ने देखाकौन जला सका आंधियों में चिरागमैं वह इंसान हूं– जो आंधियों में चिराग जलाता हैइन चिरागों में मैंने अपने दिल का खून डाला हैकई बार यह चिराग टिमटिमाते रहे–पर कभी बुझ न सके–मैं दिल से आंधियों में चिराग…
आओ अपने सपनों को एक नया आयाम दें।
आओ अपने सपनों को एक नया आयाम दें। उजले रंग दें इक नई पहचान दें। बदल रही है दुनिया बड़ी तेजी से तुम भी ऐसे बदलो कि सब अच्छा कहें। आओ अपने सपनों को======= अच्छे संस्कारों से शुद्ध करलें आत्मा को ईश्वर पर एकाग्रता से ध्यान दें। आप जब होंगे पवित्र और प्यार होगा दिल…
विरोध के स्वर
सुनो, विरोध के नवोदित स्वरयह तो कीचड़ उछालना हैअसुरों की प्रवृत्तितुम तो मनुष्य हो नासंक्रमण से बचोशब्दों को पहचानोविरोध विरोध हैकीचड़ कीचड़ है!सुनो, चीरहरण मत करोभरी सभा में सभ्यता कापरनिंदा से पहलेअपने गिरेबान में झाँकोजिस पंथ की आड़ में खड़े होवह धृतराष्ट्र है औरों के लिएतुम तो कर्णधार हो नादुर्योधन मत बनो!सुनो, निकलो वातानुकूलित बैठक…
पुस्तक समीक्षा मंज़र गवाह हैं
समीक्षक : मुकेश पोपली दुनिया में अनेक तरह के मंज़र हम देखा करते हैं। कुछ मंज़र ऐसे होते हैं जो हम कभी भी दुबारा नहीं देखना चाहते। कुछ ऐसे भी होते हैं जिन्हें हम बार-बार देखना चाहते हैं। हमारे जीवन में बहुत बार ऐसा भी होता है कि हम विभिन्न परिस्थितियों से गुजरते हुए कुछ…
बच्चों तुम तक़दीर हो कल के हिंदुस्तान की : कविता मल्होत्रा
इस बार गर्मी की छुट्टियों से पहले ही स्कूल बँद हो गए, और बढ़ी हुई छुट्टियों के साथ ही बच्चों का नानी-दादी के घर पर जाना बँद हो गया, दोस्तों के साथ बाहर खेलना-कूदना सब बँद हो गया।असमँजस की स्थिति में सभी बच्चे व्याकुल होकर लॉकडाऊन के ख़त्म होने का इँतज़ार कर रहे हैं। पूछे…
मैं जानता हूं
मैं जानता हूंँ कि बड़े- बड़े चट्टान हो जाते हैं मिट्टी- धूल। जब मानुष अपनी आलस, अपनी नाकामी को जाता है भूल। मिल जाता है लक्ष्य उसे बन जाता जब है वो कलाम। जब नहीं भीत होता है काँटों से बन जाता है मिसाल का नाम।…
बातों ही बातों में (लघुकथा)
किस्तूरी आज बहुत चिढी़ हुई थी अपनी पडोसिन कमला से। उसकी सारी पोलपट्टी खोल दी। वो भी बाल्कनी से। मोहल्ले के सब लोगों ने भी सुन लिया होगा। जब से लाकडाउन में थोडी छूट मिली है, सभी अपने घर के बाहर कुर्सी डालकर चुगलियों का दबा पिटारा खोलने लगती हैं। जो उस समय वहाँ नहीं…
बलजीत सिंह ‘बेनाम’ की 2 ग़ज़ल व परिचय
ग़ज़ल 1 हम उसे देख कर गए खिल से आँख में ख़्वाब भी हैं झिलमिल से आपका ख़त मुझे मिला लेकिन हाथ मेरे गए थे कुछ छिल से ख़ुद को उसके हवाले करके मैं दोस्ती कर रहा हूँ क़ातिल से मौत क्या रास उनको आएगी ज़िंदगी से फिरे जो ग़ाफ़िल से दर्द उसका वहाँ भी…
