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रंग ना लगाया करो

रंग जितने हो बेशक लगाया करो। चाहे जितना मुझे तुम सताया करो।। रोज खेलो भले मुझसे होली मगर। सामने सबके रंग न लगाया करो।। इस होली में घर तेरे आऊँ प्रिये। गोरे गालों पे, रंग मैं लगाऊँ प्रिये।। चाहे लहंगा और चुनरी पहिनना पड़े। चाहे तेरी सखी मुझको बनना पड़े।। सब करूँगा सनम मैं तुम्हारे…

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उम्र का तकाज़ा है पर ज़िन्दा हैं अरमान अभी

“उम्र का तकाज़ा” है कि छोड़ दूँ तमाम सुखों की ख़्वाहिशें करना और साथ बढ़ती उम्र के बढ़ती ज़िम्मेदारियों के बोझ तले दब पिस कर फ़ना कर दूँ हस्ती अपनी किसी भी आम इंसान की मानिंद… लेकिन ऐसा होगा क्या? मुमकिन तो नहीं सब की मर्ज़ी हो जो वही मर्ज़ी हो मेरी भी कैसे ख़त्म…

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भगत सिंह

एक बार फिर पुकारा तुमको भगत सिंह फिर आ जाओ। मिली कहां है आजादी फिर से आजादी दिला जाओ।। पल-पल छलता सच यहाँ झूठ की खेती हरी-भरी। रंग केसरिया चुनर भारत मां को फिर से ओढ़ा जाओ।। एक बार फिर पुकारा तुमको भगत सिंह फिर आ जाओ हर राखी पर रोती बहना तुम जैसा कोई…

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बचाव

कोरोना वायरस को ना बनने दें अभिशाप, जागरूकता-स्वच्छता ही सर्वोपरी बचाव। साधारण मास्क और सैनिटाइजर से, इसके संक्रमण को रोकें, आत्मसात कर लें, विशेषज्ञों के दिए गए सुझाव। रहता नहीं हवा में ये, रहता ये सतह पे। जगह- जगह पहुँचे ये, वस्तु-जीव पे रह के। पड़े धातु पे तो बारह घण्टे, कपड़े पे नौ घण्टे,…

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बहिष्कार … कोरोना वापिस जाओ

सरताजों का ताज कोरोना फैले छूकर हाथ कोरोना छींक पे भी है इसका ज़ोर खांसी बन गई इसकी दोस्त जिसको ये (कोरोना) छू जाता है घर का वह हो जाता है दूर भागते देखके इसको दूर भगाओ कहते इसको नहीं नज़दीक अब जाना है (किसी भी जन के) नजदीकी चाहे रिश्ता उससे पास – पड़ोस…

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डर

अब तो मैं घर से निकलती नहीं फिर भी आदमियों से डरती हूँ मैं माँ रोज़ जब स्कूल जाती हूँ रिक्शे वाले की टच से डरती हूँ मैं माँ गेट पर गार्ड रोकें मुझे कभी सहम के बैग छाती से चिपकाती हूँ माँ कुछ खरीदने भेजती हो जब दुकानदार के हाथ पकड़ने से डरती हूँ…

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बन्द करो ‘करोना’ का रोना

बन्द करो #करोना का रोना बनो सनातन कुछ ना होना तन- मन- जीवन हिन्दू हो तो सदा स्वस्थ कोई रोग ना होना करना है तो करो नमस्ते शेक हैंड मत “#करोना” खाना में शाकाहार करो , मांसाहार मत ” #करोना” रोज करो तुलसी का सेवन , धूम्रपान मत ” #करोना” नीम गिलोय का घूंट भरो…

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मेरे ज़रूरी काम

जिस रास्ते जाना नहीं हर राही से उस रास्ते के बारे में पूछता जाता हूँ। मैं अपनी अहमियत ऐसे ही बढ़ाता हूँ। जिस घर का स्थापत्य पसंद नहीं उस घर के दरवाज़े की घंटी बजाता हूँ। मैं अपनी अहमियत ऐसे ही बढ़ाता हूँ। कभी जो मैं करता हूं वह बेहतरीन है वही कोई और करे…

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हृदय के मोती

डॉ उषा किरण (पूर्वी चंपारण, बिहार ) निशा नहाती ज्योत्सना में,        मुग्ध सी कुछ हो रही है।              उद्वेलित होते अंतर में ,               नूतन सी कुछ बो रही है। कुछ कोलाहल हो रहे हैं,       दूर अंबर के प्रांगण में।         आज फिर लहरा उठा है,           कल्पतरु मन के आँगन में। हास…

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दुनियादारी

जो खुद से ही अंजान है उसे क्या दुनियादारी समझाई जाए, एहसान जितनों के हैं हम पर चलो उनसे ही यारी निभाई जाए। होगा कभी यूं भी कि वह खुद से दोस्ती कर लेगें बड़े कठिन हैं रास्ते इस मंजिल के चलो खुद को भी समझाया जाए। टूटते, जुड़ते, बिखरते हैं जो शख्स चिंगारियों को…

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