Latest Updates

सभ्य असभ्य इसी धरती पर।

डॉक्टर चंद्रसेन भारती सभ्य असभ्य इसी धरती पर। देव धनुज रहते आऐ। रावण से सब घृना करते  राम नाम सुन हर्साऐ। धरती से ही सोना उपजे, कोयला खान नजर आए। मंथन से कोलाहल निकला, अमृत वही नजर आए। संस्कार मिलते हे घर से, गली गलियारे मिलें नहीं। कागा धन ना हरे किसी का, कोयल किसको…

Read More

    अग्नि नैया

कहानी (डोली शाह)        नीलिमा मेरी बचपन की बहुत अच्छी सहेली थी। आधा किलोमीटर की दूरी पर घर होने के कारण हमारा प्रायः एक बार मिलना हो ही जाता था । सौभाग्य से उसका विवाह भी मेरी ही कॉलोनी के  सीमेंट फैक्ट्री के मेनेजर से हो गया , जिससे दोनों की दोस्ती और भी घनिष्ठ…

Read More

बाल मजदूरी

माँ शारदे को सादर नमन बिषय:-बाल मजदूरी विधा:-काव्य सृजन तुम्हें गमगीन कर देंगे, गरीबों के ये आशियाने। थामकर दिल वहाँ जाना, मिलेंगे त्रस्त दीवाने।॥ ना होंगे पात्र भंडारण, अभावों से भरा जीवन। जरूरतें भी नहीं ज्यादा, ख्वाबों से विमुख मन॥ बडा़ परिवार एक कारण, अशिक्षा से भरा दामन। व्यस्त रहते भरण पोषण, दीनता इनका आभूषण॥…

Read More

एरोप्लेन और मैं

एरोप्लेन उड़ा मैं बैठी विंडो सीट बाहर देखा सागर चला मेरे साथ चलता गया साथ साथ फिर रुकने लगा थकने लगा चला  गया कहीं  पीछे। बस मेरा एरोप्लेन ही चलता गया। एरोप्लेन और मैं आज एरोप्लेन उड़ा मैं विंडो सीट बैठी। बाहर देखा मेरे साथ मेरा शहर चला। कुछ दूर चला । फिर रुकने लगा।…

Read More

रिश्तो में सामंजस्य

निहारिका की शादी खूब धूमधाम से हुई। वह बहुत खुश है। ससुराल में उसे खूब अच्छा लाड प्यार मिल रहा है। पग फेरे (गौने) की रस्म के लिए आज वह मायके आई हुई है। सुबह से ही चहक रही है। सभी को अपने ससुराल के किस्से बताने में लगी हुई है। शाम को उसके ससुराल…

Read More

अब नहीं रही

घुमंतु परिवार में भीख के रोजगार में, वह चलने से लाचार टांगें  अब नहीं रहीं। रीते घड़े की पहेलियां दाना खोजती उंगलियां,  वह पेट की पीड़ाएं अब नहीं रहीं। दिन में लकड़ी बीनना रात के लिए सहेजना,  वो आग तापती रातें  अब नहीं रहीं। कलुआ कई दिनों से आया नहीं शहर से,  वो बेटे को…

Read More

मतलब के यार

चंद्र प्रकाश जी अपने मित्र रमेश की पौत्री का रिश्ता करने के लिए भागम भाग कर रहे थे। लड़का उनकी जानकारी में था। दोनों पक्षों में उनकी उठ बैठ थी। रिश्ता करने के चक्कर में कई बार उन्हें यात्रा भी करनी पड़ी। अपने घर पर भी उनको बातें सुननी पड़ती थी कि बे फालतू के…

Read More

आप और मैं

काश! आप पॉजिटिव एनर्जी से ड्राइव होते। तो आप आप न होते। मैं मैं न होती। शायद आज आप और मैं हम होते। काश! आप न्यूट्रल  होते। तो आप आप न होते। मैं मैं न होती । शायद आज हम हमराज होते। काश! आप  अपनों की करतूतों पर पर्दा न डालते। बल्कि मेरी ढाल बनते…

Read More

मै नारी ही क्यों बनी ?

अपना जीवन देकर मैं, जीवन संगिनी तुम्हारी बनी हूँ अपना सब कुछ देकर तुम्हें, तुम्हारी अर्धांगिनी बनी हूँ तुम सभी को जैसे हो वैसे ही अपनाकर एक स्त्री बनी हूँ पुरे परिवार को भरपेट भोजन कराकर ही मै अन्नपूर्णा बनी हूँ मगर क्यों मुझे लगता है कि मेरा कोई अस्तित्व नहीं है मगर सच तो…

Read More

बाल बहार, (कविता) दिवाली की छुट्टियां

दीपावली त्यौहार का,अनुपम अपना ढंग।  बच्चे मनाते हैं खुशी से, घरवालों के संग॥  घरवालों के संग, मजा तब दुगुना हो जाता।  होते जब मित्रों संग, फुलझड़ी स्वयं चलाता॥  रहा इंतजार महीनों से, अवसर कब आयेगा।  दिया रावण दहन संदेश, मास अगले आयेगा॥  हम दिन गिन रहे थे रोज,माह कार्तिक का आया।  तब अमावस्या से पूर्व,…

Read More