कविता और कहानी
हिंदी की जय हो
हिंदी शब्दों का सागर हिंद महासागर से नहीं है कम पर कहां समझ पाते सभी हम फर्राटेदार अंग्रेजी जो बोले तो इज्जत बहुत उनकी बढ़ जाती जैसे जीवन की सारी समस्याएं सुलझ जाती हिंदी है हमारी भाषाओं में प्यारी हिंदी की बिंदी से दुनिया है हारी कर बुलंद हिंदी को हिंदी दिवस मनाओ हिंदी दिवस…
जयहिंदी,जयहिंद’ के जयकारा को हम
डॉक्टर सुधीर सिंह जयहिंदी, जयहिंद के जयकारा को हम, मिलकर हिंद की सरजमीन पर उतारें। हिंदी थिरकेगी जनजीवन के अधरों पर, प्रत्येक भारतीय इसके लिए प्रयास करें। समाज और समुदाय के बीच राष्ट्रभाषा, मधुर रिश्तों की दृढ़-बुनियाद रखती है। एकजुटता,भाईचारा और राष्ट्रीयता का; अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत करती है। व्यक्ति,समाज और राष्ट्र का प्रगति-पथ; समृद्ध राष्ट्रभाषा…
खुदा से अर्ज ! – डॉक्टर सुधीर सिंह
हम ने खुदा से अर्ज की;ऐ रब ! सबों पर रहम कर| सब को दिखा वह रास्ता, जो हो मुहब्बत की डगर| हम को फरिश्ता मत बना; बंदा बना कुछ काम का, अवसाद और गम कम करें , हमदर्द बन इंसान का| दुनिया में दुख और दर्द है; एहसास हम इसका करें, न रहें कभी…
“राजनीति के बीज”
इंसान अपना मूल धर्म, इंसानियत खो रहा है। जातिवाद का जहर रगों में सरपट दौड़ रहा है।। खुलम-खुला व्याभिचार और सब कुछ तो हो रहा है। फिर भी, आजकल सुन रहा हूँ के “विकास” हो रहा है।। अब तो राष्ट्रवाद को विचारधारा की गर्म और तेज आंच पर पकाया जा रहा है। मीडिया ट्रायल में…
पनाह : उज्जवला साखलकर
ये ठहरी आखिर महानगरी मुम्बई की सड़क , जहाँ दिन हो या रात हर समय गाड़ियों और लोगों का महापुर जमा रहता है I हर कोई अपनी धुन में, बस जल्दी गंतव्य तक पहुँचने की होड़ I आज भी पूरी की पूरी सड़क कार, टैक्सी, बस और टू-व्हीलर से भरी हुई थी और इसमें सावित्री…
“आत्मा” : शुभांगी
कितना हल्का हल्का सा लग रहा है शरीर। अहा! जैसे सारे तनावों और विकारों को किसी ने जड़ से उखाड़ फेंका हो! ऐसा लगता है जैसे 30 -40 साल से नहीं सो पाई थी और आज इतनी गहरी नींद पूरी कर के उठी हूँ। सच बहुत फ्रेश लग रहा है। चलो अच्छा है जाने कब…
रक्षाबंधन….. : रितु गोयल
दीदी, आज मुझे थोडे रूपये दे देना और 2 दिन की छुट्टी भी! कल गांव जा रही हूं, रक्षाबंधन है ना परसों इसलिये।’ कमला ने बर्तन मांजते मांजते रीनू से कहा। ‘तू गांव जा रही है पर तूने तो खुद कहा था कि अब तो मर कर भी गांव नहीं जाऊंगी। पिछले साल रक्षाबंधन की…
घुटन (कहानी) – डॉक्टर सरला ‘सिनिग्धा’
मैम मैं भी बहुत लिखती थी । किसी भी घटना को कलमबद्ध कर लिया करती थी । कुछ कहानियाँ व कविताएँ भी लिखी थीं,पर मेरे घर में कुछ भी अपना व्यक्तिगत नहीं है । मतलब ?मैं कुछ अनजान सी छेड़ते हुए बीच में बोल पड़़ी । मतलब कोई किसी की भी डायरी…
अन्तर्द्वन्द्व—(कहानी) : आशा सहाय
सन्नाटा है चारो तरफ।मैं चीख रही हूँ।लगता है, दूर दूर तक मेरी चीख की आवाज पहुँच गयी होगी।पर, नहीं – कहींकोई आवाज नहीं।एक गहरे सन्नाटे की ध्वनिसे भरा पड़ा है सबकुछ।सन्नाटे की एक विचित्र सी गूँज मस्तिष्क को बौखलाहट से भर रही है।और अधिक जोर से चीखने का मन हो रहा है।पर,चीख जैसे मेरे अन्दर…
पूजा का शंख : अजय कुमार पाण्डेय
पूजा का शंख आज दीपावली के दिन लक्ष्मी पूजा की थाली सजाते हुए सविता ने शंख निकाला तो कुछ देर के लिए उसे हाथ में लेकर ठिठकी रह गई। इस शंख में उसे दो मासूम सी आंखें अपनी ओर ताकती दिखाई दीं। इन आंखों में एक करुणा थी, एक अपनापन था, एक शिकायत…
