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मैं बदलूँ तो बदले समाज

आज मनुष्य का जीवन हर प्रकार से त्रस्त और असुरक्षित है।पेट भरने को भोजन नहीं है,कितनीही आशंकाओं के बीच जी रहे हैं और हर ओर सेमनुष्य का शोषण औरउत्पीड़न हो रहा है।ऐसीपरिस्थिति में आदमी के पास केवल एक ही विकल्प बचा है कि वह व्यवस्था को बदल डाले।आज लगभग पूरा विश्व ही कोरोना महामारी की चपेट…

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आज अयोध्या में भूमि पूजन है

डॉक्टर सुधीर सिंह आज अयोध्या में भूमि पूजन है,आइए!मिलकर खुशियां मनाएं.अवधनगरी की पवित्र माटी को,शुद्ध हृदय से हमसब नमन करें. नई दुलहन सीअयोध्या सजी है,दीपावली सा महोत्सव है सर्वत्र.संपू्र्ण भारत आज  झूम रहा है,जय क्ष्रीराम की गूँज सब जगह. यशस्वी प्रधान मंत्री के हाथों से,राम मंदिर का शिलान्यास होगा.दुनिया भर में रामराज का झंडा,एकदिन हिंदुस्तान…

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मित्रता दिवस पर सखी को समर्पित कविता

मंजू लता हे ! सखी फ़िर कब मिलेंगेयाद आती हैं तुम्हारीखोजती हैं आंखे तुम्हारी चंचलतातुम्हारे कोमल अधरों की मुस्कुराहट हे ! सखी फ़िर कब मिलेंगेखोजती हैं मेरी आंखे तुम्हारा भोलापनमेरा रूठना तुम्हारा मनानासाथ ही डेरी मिल्क गिफ्ट करना हे ! सखी फ़िर कब मिलेंगेयाद आती हैं क्लास की बातेएक दूसरे में खोकर खाली पीरियड मेंबाते…

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कच्चे धागों का पक्का बंधन रक्षाबंधन का त्योहार

डॉक्टर सुधीर सिंह कच्चे धागों का पक्का बंधन रक्षाबंधन का त्योहार,पूजा की थाली में राखी बहन का  है अनुपम प्यार. भाई-बहन के पवित्र प्रेम का प्रतीक यह पावन पर्व,वर्ष में एक बार आता है भाई-बहन का यह उत्सव. ससुराल में बस गई बहना करती  भैया का इंतजार,रेशम की डोरी में लिपटा है बहन काअनमोल प्यार….

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आओं स्वस्थ्य बनाए

सुनसान राहें पंछियों का कोलाहल दुबके इंसान घरों में मुंडेर पर बोलता कौआ अब मेहमान नही आता संकेत लग रहे हो जैसे मानों भ्रम जाल में हो फंसे। नही बंधे झूले सावन में पेड़ों पर उन्मुक्त जीवन बंधन हुआ अलग अलग हुए अनमने से विचार बाहर जाने से पहले टंगे मन में भय से विचार।…

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जीवन

एक जमाना बीता-सा लगने लगा है। यह समंदर रीता-सा लगने लगा है।। मुझको हर पल हारना लगाता अब अच्छा। यह जहां जीता-सा लगने लगा है।। हरपल देती अग्निपरीक्षा, सत्य की मैं। अब यह जीवन सीता-सा  लगने लगा है।। जो भी आया कुछ सिखाने के सबब से। हर कोई उपदेश गीता-सा  लगने लगा है।। टेढ़े-मेढ़े जिंदगी…

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गुरूकुल

श्रीमती कविता मल्होत्रा दोस्तों मित्रता दिवस की रस्म हम यूँ निभा लेते हैं निस्वार्थ प्रेम बनकर निस्वार्थता को मित्र बना लेते हैं अपने घरौंदों की जड़ें दिमाग़ में न बनाकर दिलों में बनाई जाएँ तो हर एक घर ही मंदिर हो जाए !! दिलों को अपनी ख्वाहिशों की सियासत नहीं बल्कि जीवन के परम उद्देश्य…

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हे राम !

हे राम! तुम आ जाओ ना । त्रेता से कलि है विषम बहुत, आकर मुक्त कराओ ना । बन्धन मे पड़ी लाखों सीताएँ , रावण से कहीं दुस्साहस वाले रावण । अब तो खड़े निज देश में , असंख्य राक्षस छिपे नर वेश में । हे राम ! तुम आ जाओ ना । पड़ने न…

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समंदर

बहुत दूर, वो जगह जहाँ तुम, बच सको चले जाना, अकेले ही ख्वाहिशों को कहीं दूर छोड़ देना जैसे स्कूलों में प्रवेश लेकर छोड़ देते हो तुम पढ़ाई को और ध्यान रहे तुम्हें इस बात का के सुबह की ओस की बूंदों की तरह सुकून दे सको किसी की आँख को ठंडक दे सको किसी…

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विधाता की सुंदर रचना

तुम आज इस तरह खामोश हो, युँ उदासी का लिबास चेहरे पर क्यों डाले जाती हो भावनाओं को आहत मत होने दो उन्हें सुलगाओ नया लक्ष्य दो विकट परिस्थितियाँ बहुत आएँगी पग -पग पर पांव डगमगाऐगे तुम मत ठहरना ध्येय अटल साधे रखना माना की तुम स्त्री हो, क्यों तुम्हारा स्त्री होना कभी -कभी समाज…

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