कविता और कहानी
।। हमारा तंत्र ।।
समाज में राजतंत्र के बाद प्रजातंत्र आया। लेकिन प्रजातंत्र के साथ साथ राजतंत्र भी उसी के समानांतर चलता रहा है। लेकिन समाज को यह दिखता नहीं केवल महसूस होता है।यह राजतंत्र राजाओं से भी क्रुर व्यवस्थाओं में पनपा है ,और पनप रहा है।इस राजतंत्र को आज गुंडातंत्र, आतंकवाद,आदि नामों से कहा जाने लगा है।…
“अपने पराए”
विपत्ति के समय ही मनुष्य के चरित्र की पहचान होती है। कौन अपना है और कौन पराया है, इसका पता मुसीबत में ही लगता है। इस घटना के जो मुख्य पात्र हैं वो आज नहीं हैं। परन्तु घटना से मिली एक सीख आज भी मुझे याद है। दादाजी के गुजर जाने के बाद की घटना…
आज मैं प्रश्नाकुल हूँ ………
आज प्रश्नाकुल हूँ मैं क्योंकि आँखों का आदिम स्वप्न रोता, प्यासे मन में विषाद दिखता जीवंत सत्य बस गरल बोता ! आज प्रश्नाकुल हूँ मैं क्योंकि वृथा दंभ की परिधि फैली अभीष्ट जो था , अपवाद क्यों है ? पक्षपात, वेदना, निशा दृष्टिगत शिराओं में रक्त का संचार ज्यों है ! आज प्रश्नाकुल हूँ मैं…
प्रेम का पनपना
अगर तुम महसूस कर सकते हो बारिस की बूंदों को अपने तन पर तो तुम महसूस कर सकते हो प्रेम को भी उन्हीं बूंदों की तरह प्रेम कोई बाहर की वस्तु नहीं है यह तुम्हारे भीतर ही पनपता है बशर्ते तुमने इसे पनपने दिया हो प्रेम के पनपने के लिए जरूरी है अनुकूल वातावरण का…
तुम कहाँ नही हो ?
चलो ढूढ़ कर, दिखाओ मेरे एहसासो में तुम कहाँ नही होकोई ऐसी जगह बताओ जहा तुम नही हो थक जाओगे मन की नगरी चलते चलतेमान लोगे हार जो पाओगे हर जगह खुद कोचलो ढूढ़ कर दिखाओ मेरे एहसासो में तुम कहाँ नही हो ऐसे हीं तो तुम तब हार गए थे जब कररहे थे मेरी…
पावन गुरु पूर्णिमा के शुभ अवसर पर
गुरु का ज्ञान ही आदमी का जीवन-पथ,सदा प्रकाशित व प्रशस्त करता रहता है.स्वयं से यहां जब हारने लगता है इंसान,शीघ्र पूज्य गुरुजी का आह्वान करता है. गम का अंधेरा हो या दुख का पहाड़ हो,गुरु की ज्ञान-ज्योति सब दूर कर देता है.गुरू के प्रति सिर्फ क्ष्रद्धाऔर समर्पण हो,ब्रह्मस्वरूप गुरुवर हाथ पकड़ चलाता है. अपनी गुरूभक्ति…
डेढ़ माह का जीवन
कुश्लेन्द्र श्रीवास्तव (वारिष्ट पत्रकार एवं साहित्यकार), गाडरवारा, मध्य प्रदेश अस्पताल के जनरल वार्ड में आई तब उसकी नजर वार्ड के नए पेशेन्ट पर पड़ी थी। बेड नम्बर 8 पर एक दस साल का बालक आँख बंद किए लेटा था पास में ही एक कम उम्र की महिला बैठी थी जिसके चेहरे पर उदासी थी। उसने…
“मूल्यों का अपहरण”
हमारे देश में भ्रष्टाचार का ही चलन है। जो भ्रष्ट नहीं है वो पिछड़ा हुआ है। परिवार, समाज और प्रांत सभी इसकी गिरफ्त में हैं। केवल नेता या अफसर ही नहीं, सामान्य नागरिक भी भ्रष्ट आचरण को अपना चुका है। मर्यादित आचरण से सभी अनभिज्ञ हैं। दुख की बात है कि परिचित होना भी नहीं…
