कविता और कहानी
‘प्रवासी मजदूर और बरसात का कहर’-
आज सारे संसार के सामने कोरोना महामारी का प्रकोप पांव पसार खडा़ है, मानव को झंकजोर कर रख दिया है.एक दूसरे की संवेदना शून्य सी जान पडती है. विश्व की सभ्यता, संस्कृति और सामाजिक ढांचे में अचानक बदलाव आया है, इन सब का शिकार मजदूर वर्ग हुआ है. भारत में प्रवासी मजदूरों के साथ एक…
सदियों तक पीड़ा सहकर …..
सदियों तक पीड़ा सहकर हमने ये दौलत पाई है घना उजाला दिखता बाहर , भीतर तो तन्हाई है । अंतस् में कई प्रश्न गूंजते , क्या ये पीर पराई है रूखे- सूखे रिश्ते ढोना,ये भी तो इक सच्चाई है सदियों तक पीड़ा सहकर हमने ये दौलत पाई है । तन पूरा ,मन रहा अधूरा, कितनी…
मेरा गांव बदल रहा है,
अम्बरीश श्रीवास्तव मेरा गांव बदल रहा है, सोया हुआ रक्त उबल रहा है। पहले मिलजुल कर रहते थे, अब एक दूसरे को निगल रहा है ।। सुना था मकान कच्चे है पर रिश्ते पक्के होते थे गांव में । बच्चे बूढे, हारे थके श्रमिक किसान सब खुश थे छाव में ।। आज छांव छितर गई…
हिमगिरि कहता गर्वित होकर
डॉक्टर राहुल हिमगिरि कहता गर्वित होकर हम भी यहाँ खड़े हैं तुम सा कोई नहीं बहादुर जो भी बड़े-बड़े हैं। अगर सहेलिया चीन से अपनी तुमने अब की हार अत्याचार करेगा तुम पर वह फिर बारम्बार। चूर-चूर हो जाये उसके अपने सारे ख़्वाब इसलिए देना है उसको अब मुहँतोड़ जवाब। चालबाज है धूर्त कमीना करता…
