Latest Updates

साँस हर दिल की थमी-थमी है सहमा-सहमा सा हर आदमी है

कविता मल्होत्रा (स्थायी स्तंभकार-उत्कर्ष मेल, कवियित्री एवं समाजसेवी) आज से तीन महीने पहले कब किसी ने सोचा था कि सरपट भागती जीवन की रफ़्तार अचानक यूँ थम जाएगी कि अगले पल साँस लेने से पहले भी सोचना पड़ेगा और साँस छोड़ने की दशा भी अकल्पनीय हो जाएगी। सच है! परिवर्तन ही संसार का शाश्वत नियम…

Read More

चलो आज कुछ कह लेती हूं

मैं भी अपने अंतर्मन से कुछ बातें चुन लेती हूँ चलो आज कुछ कह लेती हूं। मैं वही हूं जिस मिट्टी ने नूतन आकार लिया है मैं वही हूं जिसके अपनों ने सहर्ष स्वीकार किया है मैं अपने अंतस की गर्मी को आज हवा देती हूं चलो आज कुछ कह लेती हूं। तोड़ने आए थे…

Read More

सच बोलना सख्त मना है

यह रोशनी जिसे तुम अंधेरे के खिलाफ  ‘जागृति’ कह रहे हो वक्त के पिछडेपन को दूर करने की रीत है          भीतर का अंधेरा           अभी डरा रहा है            रह-रहकर उजाले मे            उभरती परछाइयां …            खुली हुई लाशे बन जाती हैं            गाती गांधी का गीत हैं            देखो,            सूरज  का…

Read More

आपस्तम्ब

हे श्रमवीर तुम्हारे कुदाल ने कंटकाकीर्ण मग सुगम किया । एक पैर पर थाम लिये जैसे अम्बर कर्मयोगी सूरज भी देख तुम्हे पिघल गया । ● लज्जित हैं कर्मवंचक अवसरवादी लोलुप तुम्हे देखकर; प्रतिमान तुम्हे मानते जिजीविषक स्वाभिमानी देखते तुम्हे मुड़मुड़कर।। ● तुम्हे देख स्मरण हो आती कृष्ण की कनिष्ठा पर धारित गोवर्धन पर्वत की…

Read More

आंधियों में चिराग जलना…

प्रवीण बहल (विकलांग रत्न) किसने देखा है आंधियों में चिराग जलनाअंधेरों में चराग जलना तो सब ने देखाकौन जला सका आंधियों में चिरागमैं वह इंसान हूं– जो आंधियों में चिराग जलाता हैइन चिरागों में मैंने अपने दिल का खून डाला हैकई बार यह चिराग टिमटिमाते रहे–पर कभी बुझ न सके–मैं दिल से आंधियों में चिराग…

Read More

आओ अपने सपनों को एक नया आयाम दें।

आओ अपने सपनों को एक नया आयाम दें। उजले रंग दें इक नई पहचान दें। बदल रही है दुनिया बड़ी तेजी से तुम भी ऐसे बदलो कि सब अच्छा कहें। आओ अपने सपनों को======= अच्छे संस्कारों से शुद्ध करलें आत्मा को ईश्वर पर एकाग्रता से ध्यान दें। आप जब होंगे पवित्र और प्यार होगा दिल…

Read More

विरोध के स्वर

सुनो, विरोध के नवोदित स्वरयह तो कीचड़ उछालना हैअसुरों की प्रवृत्तितुम तो मनुष्य हो नासंक्रमण से बचोशब्दों को पहचानोविरोध विरोध हैकीचड़ कीचड़ है!सुनो, चीरहरण मत करोभरी सभा में सभ्यता कापरनिंदा से पहलेअपने गिरेबान में झाँकोजिस पंथ की आड़ में खड़े होवह धृतराष्ट्र है औरों के लिएतुम तो कर्णधार हो नादुर्योधन मत बनो!सुनो, निकलो वातानुकूलित बैठक…

Read More

पुस्तक समीक्षा मंज़र गवाह हैं

समीक्षक : मुकेश पोपली दुनिया में अनेक तरह के मंज़र हम देखा करते हैं।  कुछ मंज़र ऐसे होते हैं जो हम कभी भी दुबारा नहीं देखना चाहते।  कुछ ऐसे भी होते हैं जिन्हें हम बार-बार देखना चाहते हैं।  हमारे जीवन में बहुत बार ऐसा भी होता है कि हम विभिन्न परिस्थितियों से गुजरते हुए कुछ…

Read More

विडम्बना

नहीं सुनना था वो सुनते रहे हैं। हम अपना सर सदा धुनते रहे हैं।। जो पिस्सू की तरह खूँ चूसते हैं। उन्हें ही आजतक चुनते रहे हैं।। मकां बन जाए, रोटी भी मिलेगी। जन्म से बात यह, सुनते रहे हैं।। हमारे जीते जी पूरे न होंगे। हम ऐसे ख़्वाब क्यों बुनते रहे हैं।। हमें तो…

Read More

यथा सत्य

चाहे जो हो सदी है प्रमाणित यही, आस्तीनों में ही साँप पलते रहे। खून भी दूध भी सब पिया है मगर, फिर भी वो तो जहर ही उगलते रहे।। मंथरा थी कुटिल, कैकेई कोमल हृदय, फिर भरा है जहर, कैकेई बस में हुई। राम को वन, भरत को सिंहासन मिले, वो अयोध्या की ही राजमाता…

Read More